शादीशुदा और कुंवारे दोनों देख सकते हैं यह फिल्म
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शादी के साइफ इफेक्ट फिल्म की खूबसूरती यह है कि यह कुंवारे और शादीशुदा दोनों ही तरह के दर्शकों को रास आएगी।
प्यार, शादी और सिनेमा मन के लड्डू हैं। जिसे जो करना है करके ही मानता है। पछतावा तब होता है जब साइड इफेक्ट्स सामने आते हैं। अतः जो फरहान अख्तर के फैन हैं, जिन्हें विद्या बालन अच्छी लगती हैं।
जिनके दिमाग में ‘प्यार के साइड इफेक्ट्स’ (2006) की यादें जिंदा है, वह किसी से बिना कुछ कहे-सुने यह फिल्म देख आएं। निर्देशक साकेत चौधरी प्यार के बाद शादीशुदा जिंदगी का भी दूसरा पहलू इस सीक्वल में लाए हैं। जो नादान इन पहलुओं से अनजान हैं, उन्हें पर्याप्त ज्ञान प्राप्त होगा।
फिल्म की कहानी पति के नजरिये से है, जो अपनी शादी को कामयाब बनाना चाहता है। नतीजा यह कि पत्नी की हां में हां मिलाता है। पत्नी की गलती होने पर भी खुद माफी मांगता है। यद्यपि वह इस निष्कर्ष पर पहुंचा है कि एक ‘फूल’ ही शादी को फूलप्रूफ बनाने की सोच सकता है क्योंकि शादी से ज्यादा खतरनाक होते हैं शादी के साइड इफेक्ट्स।
फिल्म महानगर की भागदौड़ भरी जिंदगी में कामकाजी पति-पत्नी द्वारा रोमांस को जिंदा बचाए रखने की कोशिश से शुरू होती है और जल्द ही प्रेग्नेंसी तक पहुंच जाती है। पत्नी के मन में उमड़ी ममता से चकित और फिलहाल पिता न बनने की इच्छा रखने वाला पति कहता है, ‘दूसरों के बच्चों और पप्पीज के साथ खेलना तो सबको अच्छा लगता है।’ इंटरवेल से पहले कॉमिक परिस्थितियां कुछ गुदगुदाती हैं।
खास तौर पर महिलाओं को इस हिस्से में ज्यादा मजा आता है। फिल्म का दूसरा हिस्सा दांपत्य जीवन में तनाव और पति के द्वारा घर से दूर रहने के बहाने ढूंढने पर केंद्रित है। यहीं पर कहानी में कुछ और पात्र आते हैं, जैसे एक नौजवान पड़ोसी और बच्ची को संभालने के लिए रखी गई ‘आंटी’। हर पारिवारिक फिल्म की तरह यहां अंत में सब ठीक हो जाता है।
फिल्म बताती है कि पुरुषों को शादीशुदा जिंदगी में खुशियां बनाए रखने के लिए छोटे-छोटे झूठ बोलने पड़ते हैं। इन झूठ से वह खुद को खुश रखने की कोशिश करता है ताकि घर में खुशियां बनी रह सकें। ‘केयरफ्री सिंगल लाइफ’ के चक्कर में सीधे-सादे जीवन की खुशियों से खेलने वाले पति की भूमिका फरहान अख्तर ने निभाई है। ऐक्टिंग के मामले में वह ‘मिल्खा सिंह’ के दर्जे से नीचे हैं।
जबकि पत्नी और मां की भूमिका में विद्या बालन खरी लगती हैं। उनके किरदार के ‘शेड्स’ खूबसूरती से बदलते हैं। विद्या की ऐक्टिंग और बॉडी लैंग्वेज सटीक हैं। फिल्म का संगीत बहुत आकर्षक नहीं है। साकेत की इस फिल्म में ‘प्यार के साइड इफेक्ट्स’ जैसी तेजी और ड्रामा नहीं है। अगर फिल्म के नाम से मन में लड्डू फूटा है और आपको प्यार के बाद शादी में भी भरोसा है तो इसे देख सकते हैं।