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रांझणाः इस रोमांस में हैं कई सारे ट्विस्ट

Wed, 26 Jun 2013 04:25 PM IST
रोहित मिश्र
रोहित मिश्र Updated Wed, 26 Jun 2013 04:25 PM IST
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film review of raanjhnaa

'रांझणा' पूरी तरह से रोमांटिक फिल्म होती तो बेहतर होता। भले ही उस पर यह आरोप लगता कि उसने कई ऐसे मोड़ और क्लाइमेक्स चुने जिसे दर्शक दर्जनों फिल्मों में पहले भी देख चुके हैं। 'रांझणा' के साथ समस्या यह है कि इंटरवल तक हम सबको अपने साथ लेकर चल रही यह फिल्म इंटरवल के ठीक बाद कुछ अलग करने के चक्कर में बहक जाती है।

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इस फिल्म का इंटलैक्चुअल मिजाज दर्शकों की उन संवेदनाओं, जिज्ञासाओं और चिंताओं का गला घोंट देता है जिनके दिमाग में सिर्फ फिल्म के दो पात्र जोया और कुंदन घूम रहे होते हैं। दर्शक बिल्कुल नहीं चाहते कि इंटरवल के बाद इनकी मोहब्बत के किसी और रंग को दिखाने के बजाय उन्हें जेएनयू में काले कुर्ते पहनकर नाटक कर रहे कुछ छात्रों की भविष्य की योजनाएं दिखाई जाएं।
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दर्शक नहीं चाहते कि उनको यह बताया जाए कि 60 साल में जितनी भी सरकारें आयी हैं उन्होंने देश को सिर्फ लूटा है। साथ ही वह भी नहीं चाह रहे होते हैं कि मोहब्बत में अभी तक हारा हुआ हीरो नेतागिरी करने लगे और लोकप्रिय हो जाए।
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लेकिन अफसोस फिल्म ऐसा ही करती है। 'रांझणा' का सेकेंड पार्ट देखकर पंकज कपूर की फिल्म 'मौसम' याद आती है। 'मौसम' की ही तरह यह फिल्म तब तक अपने बीच की लगती है, जब तक यह बनारस में होती है। इंटरवल के बाद फिल्म उन चुटकुलों और जुमलों को भी मिस करती है जो इंटरवल के पहले तक फिल्म की पहचान बने होते हैं।

कुंदन और जोया की मोहब्बत


यह कहानी कुंदन (धनुष) और जोया (सोनम कपूर) की है। जिस तरह एक औसत छात्र बिना अपनी प्रतिभा और योग्यता समझे साल दर साल यूपीएससी की परीक्षाएं दे-देकर फेल हो रहा होता है, कुछ वैसा ही हश्र इस फिल्म में कुंदन की मोहब्बत का होता है। वह जोया से लगभग एकतरफा प्यार कर होता है। नौंवी में पढ़ रही जोया का चक्कर एक हिंदू लड़के से है यह सुनकर उसके पिता उसे अलीगढ़ भेज देते हैं। वहां से जोया दिल्ली के जेएनयू पहुंच जाती है।

जब नौ साल के बाद जोया फिर बनारस आती है तो वह देखती है कि कुंदन अभी भी उस मोहब्बत को लेकर सीरियस है। जबकि जोया उसे बचकानी हरकत मानकर भुला चुकी है। बातों ही बातों में जोया उसे बताती है कि वह जेएनयू के एक लड़के अकरम (अभय देओल) से प्यार करती है। शादी के ठीक कुछ घंटे पहले यह पता चलता है कि अकरम मुसलमान नहीं हिंदू है। कुंदन ही यह खुलासा करता है। जोया की शादी टूट जाती है।

जोया अपनी हाथ की नस काटकर और अकरम जोया के घरवालों से मार खाकर अस्पताल में भर्ती होते हैं। कुंदन इस सबके पीछे खुद को दोषी मानता है। अपने चेहरे पर जोया द्वारा थूके जाने के बाद अब वह 'हम दिल दे चुके सनम' फिल्म के पैटर्न पर जोया को अकरम से मिलवाने के लिए उसके घर पंजाब ले जाता है। घर पहुंचने पर पता चलता है कि अकरम की मौत हो चुकी है। इसके आगे कहानी हम आपको नहीं बताएंगे। हां इतना जरूर बताएंगे कि जैसा आप सोच रहे हैं फिल्म का क्लाइमेक्स वैसा नही है।

रोल में फिट लगे हैं धनुष


कुंदन का किरदार निभा रहे घनुष का चरित्र पूरी फिल्म में अंडरप्ले होता है। शायद यही अंडरप्ले होना धनुष को दर्शकों की निगाह में हीरो बना देता है। धनुष के संवादों की हिंदी डबिंग ठीक-ठाक हो गयी है। अभिनय तो वे कर ही लेते हैं। पूरी फिल्म में बेचारे आशिक की भूमिका उन्होंने अच्छी तरह से निभायी है।

रोमांस और कॉमेडी दृश्यों में अच्छे लगने वाले धनुष वहां पर बनावटी लगने लगते हैं जहां वह जेएनयू कैंपस में सबको चाय पिलाकर दिल जीत रहे होते हैं। यह फिल्म सोनम कपूर के लिए एक बड़ा मौका थी। 'आयशा' फिल्म की तरह सोनम कपूर इस फिल्म में भी सुंदर तो बहुत दिखी हैं लेकिन जज्बाती दृश्यों में उनकी कलई खुल जाती है।

गेस्ट रोल में अभय देओल ने अपनी छवि के अनुरूप ही काम किया है। कुंदन को एकतरफा प्रेम करने वाली लड़की की भूमिका में स्वरा भास्कर और दोस्त के रूप में मोहम्मद जीशान अयूब अच्छे लगे हैं। जीशान इससे बड़ी भूमिका पाने की काबलियत रखते हैं। नाट्यकर्मी अरविंद गौड़ ने इस फिल्म से अपने फिल्मी अभिनय की पारी शुरू की है।

निर्देशन ने भी की है प्रगति

आनंद एल राय की तुलना यदि उनकी पिछली फिल्म 'तनु वेड्स मनु' से करें तो इस फिल्म का कैनवास भव्य है। एक निर्देशक के रूप में आनंद इस फिल्म में प्रगति करते तो दिखते हैं लेकिन यह प्रगति उनके निर्देशक साथियों के बीच की प्रगति ज्यादा दिखती है।

दर्शकों के लिहाज से 'तनु वेड्स मनु' ज्यादा सीधी और मनोरंजक फिल्म थी। इस फिल्म का इंटरटेनमेंट फैक्टर इंटरवल के बाद लगातार कम होता जाता है। तब हम सिर्फ यह देखते हैं कि निर्देशक किस मुद्दे को कितने बड़े तरीके से सोच सकता है। 'तनु वेड्स मनु' की तरह इस फिल्म में भी चुटीले डायलॉग और दृश्य हैं।


खूबसूरत हैं गाने


गाने इस फिल्म की खूबसूरती हैं। खूबसूरती इस बात में भी कि कोई भी गाना फिल्म की कहानी को नहीं रोकता है। पिया मिलेंगे, रांझणा हुआ, बनारसिया गाने सुनने में बेहद खूबसूरत लगते हैं। इरशाद कामिल ने हर सिचुएशन के लिए गाना लिखा है। एआर रहमान ने लिरिक्स और सिचुएशन के हिसाब से शानदार म्यूजिक तैयार किया है।

क्यों देखें

एक ऐसी फिल्म देखने के लिए जो मोहब्बत के तौर-तरीकों को एक अलग अंदाज से पेश करती है। साथ ही बनारस की मस्ती और कुछ अच्छे गानों के लिए भी।

क्यों न देखें

यदि आप इस फिल्म को एक बेहद रोमांटिक फिल्म मानकर जा रहे हों।

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