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बड़ी बिंदास है 'क्वीन', हनीमून भी अकेले
रवि बुले/अमर उजाला मुंबई
Updated Fri, 07 Mar 2014 01:36 PM IST
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'क्वीन' एक्ट्रेस बहुत बिदांस है। वह अपनी 'पहली नाइट' के इंतजार में है। लेकिन हनीमून कहीं और होता है।
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इंसान क्या सोचता है और क्या हो जाता है। शादी के सपनों में खोई राजौरी की रानी (कंगना रनौत) सोचती है, ‘परसों मेरी फर्स्ट नाइट है। हे वैष्णोदेवी... अगर सब कुछ ठीक हो गया तो विजय के साथ आउंगी।’ ...और होता क्या है?
लंदन रिटर्न विजय (राजकुमार राव) ऐन मौके पर शादी से इंकार कर देता है! रानी पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ता है। लेकिन वह अनोखा फैसला लेती है। अकेले हनीमून पर जाने का! पेरिस... उसने जहां हनीमून मनाने का सपना देख रखा था।
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‘क्वीन’ एक सफर है। यह इसलिए कीमती है कि एक जिंदगी को बदल देता है। यकीन मानिए कि ‘क्वीन’ छोटे शहरों की आत्मविश्वास के अभाव की शिकार कई लड़कियों का जीवन सकारात्मक ढंग से बदल सकती है। यह आपको सिनेमा की ताकत का एहसास दिलाती है।
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प्रतिष्ठित सिने-कंपनियों और नामी निर्देशकों की घटिया फिल्में जो निराशा पैदा करती हैं ‘क्वीन’ आपको उससे उबारती है। विश्वास दिलाती है कि नए लोगों के हाथों में जो बागडोर है, वह हिंदी सिनेमा को सही दिशा में ले जा रही है।
‘क्वीन’ की सादगी और सरलता सीधे जिंदगी से आई है। यह आपके आस-पास के लोगों के दुख, दर्द, खुशियों और चालाकियों की कहानी है। ऐसा नहीं कि ‘क्वीन’ में मंगेतर से धोखा खाई लड़की रातोंरात बागी हो जाती है। सदमे से उबर कर वह जिस तरह आंखें खोल कर आस-पास देखती है, आत्मविश्वास हासिल करती है वह बताता है कि बाहर की कठिनाइयां भीतर के हौसले से कभी ज्यादा बड़ी नहीं हो सकती।
कंगना रनौत ने साबित किया है कि वह किसी रेस में नहीं हैं। वास्तव में सबसे अलग और सबसे आगे हैं। उन्होंने रानी की भूमिका में अपनी सारी समकालीन अभिनेत्रियों को पीछे छोड़ दिया है। कंगना का यह काम ‘बैंचमार्क’ है। फिल्म का वह दृश्य जिसमें रानी एक क्लब में शराब पीकर बहक जाती हैं, बार-बार देखा जा सकता है।
‘अमर अकबर एंथोनी’ के अमिताभ बच्चन ने आईने के सामने शराबी का जो कॉमिक सीन किया था, कंगना उसकी याद दिलाती हैं। सिनेमा के ऐसे यादगार दृश्यों में उन्होंने खुद को दर्ज करा लिया है। कंगना के पल-पल बदलते रूप को देख कर आप चकित होते हैं। लेकिन इस बदलाव में भी उनका सीधापन गुम नहीं होता।
वह पेरिस और एम्सटर्डम में भी राजौरी की बनी रहती हैं! निर्देशक विकास बहल (चिल्लर पार्टी) ने हमें हमारे समय का एक बेहतरीन सिनेमा दिया है। जिसे किसी हाल में छोड़ना नहीं चाहिए। फिल्म अपने दूसरे हिस्से में जरूर ‘इंग्लिश विंग्लिश’ की याद दिलाती है, लेकिन अंत में असर छोड़ जाती है।