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पोस्टर फटा, क्या निकला हीरो?
रवि बुले/अमर उजाला मुंबई
Updated Mon, 30 Sep 2013 04:39 PM IST
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जब मां ने ऑटोरिक्शा चलाकर, अपने बेटे को पढ़ाया-लिखाया हो और उसे ईमानदार पुलिसवाला बनाने का सपना देखा हो तो बेटे को बड़ा होकर क्या बनना चाहिए?
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निश्चित रूप से बेटे का फर्ज तो यही है कि वह पुलिसवाला बने। लेकिन वह अपने उस सपने का क्या करे जो उसे बार बार फिल्मों में हीरो बनने की ओर खींचता है।
गुंडों से घिरी लड़की को बचाने के लिए पोस्टर फाड़ कर पर्दे पर एंट्री करने वाले विश्वास राव (शाहिद कपूर) की मुश्किल यही है। मां की सुने या मन की? फिल्म इस द्वंद्व के साथ शुरू होती और आगे बढ़ती है।
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हीरो मां से झूठ बोलता है कि मुंबई में वह पुलिसवाला बन गया है, जबकि वह फिल्म में ऐक्टिंग कर रहा होता है। एक दिन मां को सच पता लग जाता है और सदमे में वह बेहोश हो जाती है।
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निर्देशक राजकुमार संतोषी की इस फिल्म में बदमाशों का एक गैंग भी है जो मुंबई को दहलाना चाहता है। विश्वास राव इस गैंग का काम तमाम करता है। मां के सपने को पूरा करता है। इस फिल्म के साथ राजकुमार संतोषी ने एक बार फिर बताया है कि कॉमेडी फिल्मों का उनका अपना अंदाज है।
जो ‘ग्रैंड मस्ती’ के जमाने में भी एकदम साफ-सुथरा और पारिवारिक है। जो लोग पिछले हफ्ते मारे संकोच या संस्कारों के एडल्ट कॉमेडी देखने न गए हों, वे संतोषी की फिल्म से अपना ‘लाफ्टर डोज’ हासिल कर सकते हैं।
फिल्म अपनी ओर से गुदगुदाने में कोई कसर नहीं छोड़ती। शाहिद कपूर फिल्म की जान हैं। वैसे बीच-बीच में लगने वाले नाकामी के झटकों के कारण उनका कैरियर अभी तक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहां उन्हें बार-बार साबित करना पड़ता है कि वे बेहतरीने ऐक्टर और डांसर हैं।
इस फिल्म में भी वह अपना लोहा मनवाते हैं। कॉमेडी समेत चाहे ऐक्शन के सीन हों या डांस के, वे छाए हुए हैं। एलिना डिक्रूज ऐसी सोशल वर्कर बनी हैं, जो हर गलत काम की शिकायत लेकर पुलिस में पहुंचती है। पुलिसवाले उससे डरते हैं।
एलिना अपने रोल में फिट हैं। पद्मिनी कोल्हापुरे और सौरभ शुक्ला मंजे हुए ऐक्टर हैं और छाप छोड़ते हैं। संतोषी का कहानी कहने के अंदाज सरल-सहज और पारंपरिक है। हां, वह तकनीकी रूप से जरूर थोड़ा गुजरे समय का लगता है।