{"_id":"77bef3c9f370802c5fbb6068aef3905a","slug":"film-review-of-holiday","type":"story","status":"publish","title_hn":"इस हॉलीडे में रोमांस है या एक्शन?","category":{"title":"Movie Review","title_hn":"फिल्म समीक्षा","slug":"movie-review"}}
इस हॉलीडे में रोमांस है या एक्शन?
रवि बुले/अमर उजाला मुंबई
Updated Fri, 06 Jun 2014 01:39 PM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
अक्षय कुमार हॉलीडे फिल्म के जरिए एक नई तरह की वापसी कर रहे हैं। इस फिल्म में वह सबकुछ है जो उनकी पहचान है।
विज्ञापन
अक्षय कुमार लौट आए हैं। एक बार फिर ऐसी फिल्म के साथ, जिसमें एक्शन, कॉमेडी और रोमांस का मिक्स है। लेकिन अगर कुछ नहीं है तो अच्छी स्क्रिप्ट। सब कुछ एक साथ पेश कर देने की कोशिश में काफी घालमेल हो गया है और आप किसी एक चीज का पूरा मजा नहीं ले सकते।
फिल्म रोमांटिक-कॉमेडी होते होते अचानक थ्रिलर-ऐक्शन में तब्दील हो जाती है। जब आप थ्रिलर और ऐक्शन का मजा ले रहे होते हैं तो अचानक रोमांस सामने आ जाता है। तब आप निश्चिंत हो जाते हैं कि हां, सचमुच बॉलीवुड फिल्म ही देख रहे हैं।
विज्ञापन
इंडियन आर्मी की इंटेलिजेंसि शाखा का एक अफसर विराट (अक्षय) छुट्टियों में घर लौटता है और माता-पिता उसकी शादी करा देना चाहते हैं। माता-पिता ने जिस लड़की (सोनाक्षी) को देखा है, वह विराट को अपने टाइप की नहीं लगती। उसे घरेलू और बोरिंग बीवी नहीं चाहिए।
विज्ञापन
जबकि देखा-देखी की रस्म में यह लड़की सिर्फ मां-बाप के कहने पर घरेलू टाइप रोल कर रही थी। लड़की इतनी तेज है कि लड़के के इंकार करने पर पिता को एक थप्पड़ मारती है। डायरेक्टर ने इसे ‘कॉमेडी’ की श्रेणी में रखा है। खैर, लड़के को लड़की के तेज-तर्रार होने का पता चलता है और वह उस पर फिदा हो जाता है। मगर लड़की मना कर देती है।
इस तरह से रोमांस कभी हां कभी ना की तर्ज पर आगे बढ़ता है। तभी कहानी करवट बदलती है और छुट्टी पर आए अफसर के हाथ एक आतंकी लग जाता है, जिसके पास मुंबई को दहलाने की काली योजना है। अफसर नए मिशन में जुट जाता है और थ्रिलर-ऐक्शन शुरू हो जाता है। बीच-बीच में रोमांस की छींटे पड़ते रहते हैं।
निर्देशक ने आतंकवादियों से जुड़े कथानक को किसी हॉलीवुड फिल्म के अंदाज में कहने की कोशिश की और कुछ जगहों पर आप प्रभावित भी होते हैं। लेकिन अंत आते-आते कहानी बिल्कुल हास्यास्पद ढंग से शिथिल हो जाती है। पूरा थ्रिल नकली नाटकीयता में बदल जाता है। अंततः आप निराश होते हैं। आपको लगता है कि बेहतर है अपनी ड्यूटी पर चला जाए।
सवा सौ फिल्मों पुराने अक्षय कुमार ऐक्शन दृश्यों में जमते हैं। यहां गोविंदा की झलक को भी आप याद रख पाते हैं। लेकिन सोनाक्षी सिन्हा बुरी तरह से निराश करती हैं। अगर जरीन खान सोनाक्षी का नाम लेकर कहती हैं कि फिल्म इंडस्ट्री के लोग स्टार परिवारों के प्रभाव में आकर उनके बेटे-बेटियों को जबर्दस्ती दर्शकों पर थोपते हैं, तो गलत नहीं है।
गैर फिल्मी परिवारों की अनेक खूबसूरत और प्रतिभावान अभिनेत्रियां सही मौके का इंतजार कर रही हैं। फिल्म का संगीत और नृत्य बहुत आकर्षक नहीं है। एडिटिंग टेबल पर कुछ और काम करके फिल्म को जरा छोटा किया जाता तो बेहतर रहता। देखने वालों का वक्त बचता।