अंकुर अरोड़ा मर्डर केसः कहानी अच्छी पर फिल्म नहीं
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मेडिकल नेग्लिजेंस की एक सत्य
लेकिन फिल्म के साथ दिक्कत यह है कि जिसे वह गलत बताने का प्रयास कर रही होती है दर्शक उसे गलत न मानकर स्मार्टनेस या प्रोफेशनल मजबूरी मान रहे होते हैं। यहां तक की फिल्म की नायिका भी फिल्म खत्म होने के चंद सेकेंड पहले तक उस डॉक्टर के साथ खड़ी होती है जिसे फिल्म विलेन बताना चाहती है।
फिल्म के निर्देशक सोहेल तातरी और विक्रम भट्ट को इस बात की तारीफ जरूर मिलनी चाहिए कि उन्होंने इस तरह के विषय पर फिल्म बनाने का फैसला लिया। लेकिन उनकी उतनी ही आलोचना भी होनी चाहिए कि उन्होंने इस घटना को ढाई घंटे कि फिल्म बनाने के लिए स्क्रिप्ट में होमवर्क नहीं किया। इसके मुकाबले 'जॉली
एक घटना को फिल्म बनाने के लिए कई सारी उपकथाएं और चरित्र खड़े करने होते हैं। ऐसा करने में यह फिल्म पीछे रह गयी है। इंटरवल के बाद जब निर्देशक को लगा कि यह फिल्म थोड़ी टूट रही है तो उन्होंने इस फिल्म में कुछ चलताऊ फिल्मी मसाले भी डाल दिए, जो फिल्म को और भी कमजोर कर गए।
पात्रों का चयन भी कई जगह खटकता है। पूरी बांह का काला कोट पहनकर कोर्ट में जिरह करतीं पाउली डाम शायद ही किसी को अच्छी लगी होंगी। इसी तरह विशाखा सिंह उस पात्र के द्वंद को दिखाने में असफल हो जाती हैं जैसी कि फिल्म में उसकी जरूरत होती है।
लापरवाही से हुई मौत
यह फिल्म दस साल के एक लड़के अंकुर अरोड़ा के मेडिकल नेगलीजेंसी की वजह से मरने की कहानी है। पेट दर्द की शिकायत की वजह से वह डाक्टर अस्थाना (केके मेनन) के अस्पताल में भर्ती होता है। उसका आपरेशन होता है। नियम के अनुसार उसे आपरेशन से कुछ घंटे पहले खाली पेट रहना होता है। लेकिन अंकुर भूख की वजह से बिस्किट खा लेता है।
यह बात नर्स को मालूम होती है और यह बात वह डा. अस्थाना को बताती भी है। आपरेशन प्रक्रिया के मुताबिक पेट को आपरेशन से पहले खाली करना होता है। डा. अस्थाना ऐसा करना भूल जाते हैं। उनकी इस भूल की वजह से अंकुर की जान चली जाती है। डाक्टर इसे अपनी चूक न मानकर मेडिकल की भाषा में लंग्स फेल्योर दिखा देते हैं। डा. अस्थाना के नर्सिंग होम इंटर्नशिप कर रहा जूनियर डॉक्टर रोमेश इस बात से खफा होकर डाक्टर अस्थाना के खिलाफ मोर्चा खोलता है।
वह अंकुर की मां नंदिता अरोड़ा (टिस्का चोपड़ा) को साथ लेकर कोर्ट में जाता है। कोर्ट में जाने के बाद तरह-तरह के मोड़ आते हैं। अंततः डाक्टर अस्थाना यह केस जीत जाता है। क्लाइमेक्स में अस्थाना के नर्सिंग होम में ही इंटर्नशिप कर रही रिया (विशाखा सिंह)कुछ ऐसा करती है कि डाक्टर अस्थाना का सच सबके सामने आ जाता है।
केके मेनन सब पर भारी
हमेशा की तरह केके मेनन ने इस फिल्म में भी शानदार ऐक्टिंग की है। एक प्रतिभाशाली लेकिन एरोगेंट डॉक्टर का किरदार उन्होंने खूबसूरती के साथ जिया है। अंकुर की मां बनीं टिस्का चोपड़ा को अब तक सबसे लंबा रोल मिला था लेकिन अभिनय के मामले में वह इस फिल्म में 'दिल तो बच्चा है जी' या 'तारे जमीं पर' से आगे नहीं बढ़ पायीं।
एक गंभीर सुलझी हुई प्रोफेशनल लड़की का किरदार विशाखा सिंह ने औसत तरीके से निभा दिया। व्यवस्था से पीड़ित डाक्टर का किरदार निभा रहे अर्जुन माथुर भी ठीक-ठाक ही लगे हैं। यह बात समझ में बिल्कुल नहीं आती कि पाउली डैम की वकील की भूमिका में क्यों रखा गया था। जहां भी कैमरा उनके चेहरे को फोकस करता है उनका कमजोर अभिनय सामने आ जाता है।
सिर्फ कहानी से ही खुश हो गए निर्देशक
सुहैल तातरी की एक निर्देशक के रूप में यह पहली फिल्म है। इस लिहाज से वह बहुत निराश नहीं करते। सोहेल इस फिल्म की कहानी को तो अच्छे तरीके से कह देते हैं लेकिन उनके पास इसे ढाई घंटे की फिल्म बनाने के लिए न तो अच्छी स्क्रिप्ट थी और न ही उपकथाएं।
यह फिल्म जब तक नर्सिंग होम में होती है लोगों को अपने साथ बांध कर रखती है। लेकिन जैसे ही यह फिल्म कोर्ट रूम में पहुंच जाती है फिल्म का आकर्षण कम होता जाता है। केके मेनन के खिलाफ उनके बराबर का चरित्र न खड़ा कर पाना भी फिल्म की कमजोरी बनकर उभरता है। फिल्म के कुछ सीन बहुत ही प्रीडिक्टेबिल हैं, जो इसे बासी और उबाऊ बनाते हैं।
बैकग्राउंड म्यूजिक ठीक-ठाक
फिल्म में गानों की गुंजाइश तो थी नहीं। बैकग्राउंड में जो गाने बजते हैं वह कानों को चुभते नहीं हैं। सुनिधि चौहान की आवाज में गाया हुआ गाना "तेरा अश्क है" सुनने में अच्छा लगता है।
क्यों देखे
मेडिकल निगलीजेंसी पर बनी एक नई किस्म की फिल्म देखने के लिए।
क्यों न देखें
यदि आप इस फिल्म से एक मेडिकल थ्रिलर की उम्मीद करके जा रहे हों।