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फिल्म समीक्षा तीनः इसलिए भी जरुरी है इस फिल्म को देखना

Fri, 10 Jun 2016 10:52 AM IST
रवि बुले/अमर उजाला, मुंबई
रवि बुले/अमर उजाला, मुंबई Updated Fri, 10 Jun 2016 10:52 AM IST
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amitabh bachchan's movie teen review

निर्माताः सुजॉय घोष

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निर्देशकः रिभु दासगुप्ता
सितारेः अमिताभ बच्चन, नवाजुद्दीन सिद्दिकी, विद्या बालन, सब्यसाची चक्रवर्ती, पद्मावती राव
रेटिंग ***

तीन देख कर निकलने के बाद एक ही छवि दिमाग में रह जाती है। अमिताभ बच्चन। सिनेमा और उम्र के साथ कलाकार कैसे निखरता है, इस बात को तीन में आप खूब आश्चर्यचकित होकर देख सकते हैं। अमिताभ कुंदन तो कब के बन चुके हैं, अब उनकी आभा हर फिल्म के साथ और निखरती जाती है। यहां अकेले अमिताभ तीन के बराबर हैं। फिल्म को इतने बेहतरीन ढंग से वह अपने अभिनय के साथ लेकर बढ़ते हैं कि नवाजुद्दीन सिद्दिकी और विद्या बालन पीछे रह जाते हैं। जो नवाज अपनी फिल्मों में अक्सर दूसरे ऐक्टरों से अलग चमक बिखरते हैं, वह अमिताभ के साथ बैक सीट पर होते हैं। हालांकि जिन दृश्यों में वह अमिताभ के साथ नहीं हैं वहां अपनी मौजूदगी को बखूबी दर्ज कराने में कामयाब रहते हैं। तीन कुल जमा सिर्फ अमिताभ बच्चन का सिनेमा है। उन्हें चाहने वालों के लिए है।

यह ऐसी थ्रिलर है जो धीरे-धीरे रफ्तार पकड़ती है। उसका रहस्य धीरे-धीरे खुलता है। बेहतर यही है कि अगर आप फिल्म को देखने का मन बनाए हैं तो इसके बारे में किसी जानने की कोशिश न करें। फिल्म मिस्टर जॉन बिस्वास (अमिताभ बच्चन) की कहानी है, जिनकी पोती का आठ साल पहले अपहरण हो गया था।
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अपहरण के बाद वह हादसे में मारी गई थी। मगर अपहरणकर्ता पकड़ से बाहर है। जॉन उसे सजा दिलाना चाहते हैं और रोज पुलिस थाने के चक्कर काटते हैं कि क्या कोई सुराग मिला? अपहरणकर्ता को पकड़ने में नाकाम पुलिस अधिकारी (नवाजुद्दीन सिद्दिकी) पादरी बन चुका है और वह जॉन से भी हादसे को भूल कर ईश्वर में मन लगाने को कहता है। इसी बीच जॉन को बाजार में एक अनाथ बच्ची दिखती है, जिसके सिर पर वह ऊनी टोपी है, जो अपहरण के समय पोती ने पहन रखी थी। ...और यहां से जॉन की जिद पोती के अपहरण और मृत्यु के रहस्य को ऊन के गोले की तरह खोलती चली जाती है।

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फिल्म आपको विद्या बालन की 'कहानी' का फील देगी

amitabh bachchan's movie teen review

तीन कोरियाई फिल्म मोंटाज का रीमेक है। अगर आप उस फिल्म को देखें तो पाएंगे कि निर्माता-निर्देशक मूल फिल्म से बेहतर नहीं रच सके हैं। फिल्म में कुछ महत्वपूर्ण दृश्य मूल फिल्म की तरह बारीकियों को नहीं पकड़ते, जैसे अपहरणकर्ता का पुलिस को चकमा देना। फिर भी आपको यहां एक कहानी मिलती है जो सीट से जोड़े रखने में कामयाब है। इसमें बड़ी भूमिका अमिताभ के बूढ़े, लाचार मगर जिद्दी दादाजी वाले रूप की है। उनकी आंखें, उनके होंठ, चेहरे पर बढ़ी दाढ़ी, लहराती पतलून, बाहर निकला बुशर्ट और एक पुराना स्कूटर आपके आस-पास के किसी पुराने बूढ़े की याद दिला देता है।

नवाज निराश नहीं करते परंतु पर्दे पर विद्या बालन पुलिस अधिकारी से ज्यादा एक कामकाजी गृहिणी दिखती हैं। फिल्म में कोलकाता की कलात्मक सौंदर्य वाली छवियां हैं। हाल के वर्षों में आई कोलकाता केंद्रित फिल्मों से अलग यहां शहर शांत नजर आता है। अतः यह भी फिल्म देखने की एक वजह हो सकता है। निर्देशक रिभु की यह पहली फिल्म है। सवाल यह कि क्या रीमेक किसी निर्देशक की प्रतिभा के मूल्यांकन का पैमाना हो सकता है? किसी मूल कथा पर उनकी फिल्म का इंतजार बेहतर होगा।

कुछ लोगों को यह फिल्म अपने थ्रिल में विद्या बालन स्टारर कहानी जैसा फील दे सकती है। इसकी मुख्य वजह है, उस फिल्म के निर्देशक सुजॉय घोष इस फिल्म के निर्माता हैं। रीमेक में उनका रचनात्मक योगदान भी अपनी झलक दिखाता है।

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