{"_id":"59ec32664f1c1b74698b6d6b","slug":"story-of-musician-laxmikant-pyarelal-in-bollywood","type":"feature-story","status":"publish","title_hn":"लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल की बेमिसाल जोड़ी, 'वो जब याद आए बहुत याद आए'","category":{"title":"Bollywood","title_hn":"बॉलीवुड","slug":"bollywood"}}
लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल की बेमिसाल जोड़ी, 'वो जब याद आए बहुत याद आए'
बीबीसी हिंदी.कॉम
Updated Sun, 22 Oct 2017 02:26 PM IST
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सत्तर और अस्सी के दशक में 'एल. पी.' का सामान्य अर्थ लांग प्ले रेकॉर्ड के अलावा लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल भी लिया जाता था। इसका एक सीधा मतलब यह भी था कि उस दौर में ज्यादातर फिल्मों के जो लांग प्ले रेकॉर्ड प्रदर्शित होते थे, उनमें बहुतायत में एल. पी. ही बतौर संगीतकार मौजूद रहते थे। लक्ष्मीकान्त कुडालकर और प्यारेलाल रामप्रसाद शर्मा ने मिलकर संगीत के जिस अति लोकप्रिय युग का सृजन किया,
वह हिन्दी फिल्मों के लिए आज धरोहर जैसा है। इस बारे में कोई शक ही नहीं किया जा सकता कि लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल जोड़ी ही शायद अकेले ऐसी शीर्षस्थ संगीतकार जोड़ी रही है, जिसने लोकप्रियता के मामले में बाकी जोड़ियों को पीछे छोड़ दिया था।
एल. पी. की तुलना में हम शंकर-जयकिशन और कल्याणजी आनन्दजी के सदाबहार युगल-अवदान को याद कर सकते हैं। लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल के साथ मिलकर संगीत के साम्राज्य की यह प्रभावी तिकड़ी का फिल्म संगीत में अलग ही स्थान है।
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साज बजाने का करते थे काम
लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल जहाँ अपने आरम्भिक दिनों में शंकर-जयकिशन की धुनों से प्रभावित थे, वहीं उन्होंने स्वतंत्र संगीतकार के रूप में कार्य करने से पहले कुछ दिनों तक कल्याणजी-आनन्दजी के सहायक के बतौर काम किया था।
'हँसता हुआ नूरानी चेहरा' जैसे बेहद कर्णप्रिय व ऑर्केस्ट्रेशन से सजे गीत से बाबूभाई मिस्त्री की फंतासी फिल्म पारसमणि (1963) से एकाएक मुख्य धारा में शामिल होने वाली यह संगीतकार जोड़ी जैसे प्रतिभा की प्रचुरता को अपने साथ तूफान की तरह लेकर आई। स्वतंत्र रूप से संगीतकार बनने से पहले दोनों फनकार दूसरे बड़े संगीत-निर्माताओं के यहाँ साज बजाने का काम भी करते थे।
लक्ष्मीकान्त एक बेहतरीन मैन्डोलिन वादक थे, जबकि प्यारेलाल जुबिन मेहता से बुरी तरह प्रेरित होकर वियना जाकर एक वॉयलिन वादक का कॅरियर चुनने का मन बना चुके थे। हेमंत कुमार के संगीत-निर्देशन में बनी नागिन के गीत 'जादूगर सैयां छोड़ो मोरी बैयां' एवं सचिन देव बर्मन की 'लाजवंती' के 'कोई आया धड़कन कहती है' में लक्ष्मीकान्त ने मैन्डोलिन बजाया था।
इसी तरह मदन मोहन वाली 'हकीकत' के गीत 'मैं ये सोचकर उसके दर से उठा था' में प्रयुक्त वॉयलिन प्यारेलाल ने बजायी थी। आज भी संगीत के अधिकांश जानकारों के मुताबिक लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल से बेहतर ऑर्केस्ट्रेशन की तमीज शायद ही किसी दूसरे संगीतकार के यहाँ मिलती है।
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वह हिन्दी फिल्मों के लिए आज धरोहर जैसा है। इस बारे में कोई शक ही नहीं किया जा सकता कि लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल जोड़ी ही शायद अकेले ऐसी शीर्षस्थ संगीतकार जोड़ी रही है, जिसने लोकप्रियता के मामले में बाकी जोड़ियों को पीछे छोड़ दिया था।
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एल. पी. की तुलना में हम शंकर-जयकिशन और कल्याणजी आनन्दजी के सदाबहार युगल-अवदान को याद कर सकते हैं। लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल के साथ मिलकर संगीत के साम्राज्य की यह प्रभावी तिकड़ी का फिल्म संगीत में अलग ही स्थान है।
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साज बजाने का करते थे काम
लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल जहाँ अपने आरम्भिक दिनों में शंकर-जयकिशन की धुनों से प्रभावित थे, वहीं उन्होंने स्वतंत्र संगीतकार के रूप में कार्य करने से पहले कुछ दिनों तक कल्याणजी-आनन्दजी के सहायक के बतौर काम किया था।
'हँसता हुआ नूरानी चेहरा' जैसे बेहद कर्णप्रिय व ऑर्केस्ट्रेशन से सजे गीत से बाबूभाई मिस्त्री की फंतासी फिल्म पारसमणि (1963) से एकाएक मुख्य धारा में शामिल होने वाली यह संगीतकार जोड़ी जैसे प्रतिभा की प्रचुरता को अपने साथ तूफान की तरह लेकर आई। स्वतंत्र रूप से संगीतकार बनने से पहले दोनों फनकार दूसरे बड़े संगीत-निर्माताओं के यहाँ साज बजाने का काम भी करते थे।
लक्ष्मीकान्त एक बेहतरीन मैन्डोलिन वादक थे, जबकि प्यारेलाल जुबिन मेहता से बुरी तरह प्रेरित होकर वियना जाकर एक वॉयलिन वादक का कॅरियर चुनने का मन बना चुके थे। हेमंत कुमार के संगीत-निर्देशन में बनी नागिन के गीत 'जादूगर सैयां छोड़ो मोरी बैयां' एवं सचिन देव बर्मन की 'लाजवंती' के 'कोई आया धड़कन कहती है' में लक्ष्मीकान्त ने मैन्डोलिन बजाया था।
इसी तरह मदन मोहन वाली 'हकीकत' के गीत 'मैं ये सोचकर उसके दर से उठा था' में प्रयुक्त वॉयलिन प्यारेलाल ने बजायी थी। आज भी संगीत के अधिकांश जानकारों के मुताबिक लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल से बेहतर ऑर्केस्ट्रेशन की तमीज शायद ही किसी दूसरे संगीतकार के यहाँ मिलती है।
प्यारेलाल से अच्छा म्यूजिक अरेंजर फिल्म इंडस्ट्री में हुआ ही नहीं
कहा जाता है कि प्यारेलाल से अच्छा म्यूजिक अरेंजर फिल्म इंडस्ट्री में हुआ ही नहीं। हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि प्यारेलाल के पिता रामप्रसाद एक बेहतरीन वॉयलिन कलाकार थे, जिनसे कल्याण जी, राजेश रोशन और हृदयनाथ मंगेशकर भी वॉयलिन एवं पाश्चात्य म्यूजिक के नोटेशन सीखने जाया करते थे।
उन्होंने भरतपुर महाराजा किशन सिंह महाराज के यहाँ बैण्ड में ट्रम्पेट भी बजाई है और पांचवें दशक की कुछ फिल्मों में संगीत भी दिया है। वे व्यावसायिक रूप से उतने सफल संगीतकार नहीं हो सके, मगर अपने विलक्षण संगीत ज्ञान के चलते ज्यादातर संगीतकारों- सी। रामचंद्र, नौशाद एवं के। दत्ता के यहाँ उनकी फिल्मी धुनों में बरसों तक ट्रम्पेट बजाया है।
उन्हीं के संस्कारों और प्रभाव के चलते प्यारेलाल में एक बेहतरीन कम्पोजर और ऑर्केस्ट्रा अरेंजर के गुण विकसित हो सके।
इस तरह हम कह सकते हैं की वाद्यों को सजाने की सर्वाधिक रचनात्मक शैली, 'एल।पी।' की बनायी धुनों के माध्यम से बेहतर तरीके से दिखाई देती है। इसमें अतिरिक्त मिठास घोलने में उनकी शास्त्रीय-संगीत पर मजबूत पकड़ और शास्त्रीय तालों का समुचित ज्ञान भी सहायता करता है।
लता मंगेशकर ने अहम भूमिका निभायी
यह कहा जाता है कि जब सारे दिग्गज संगीत-निर्माता साठ के दशक के उत्तरार्द्ध में अत्यधिक सफल तरीके से रूपहले पर्दे पर सक्रिय थे, तब लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल को शुरुआती काम दिलाने एवं स्वतंत्र संगीतकार के रूप में स्थापित होने में मदद करने के लिए लता मंगेशकर ने अहम भूमिका निभायी थी।
लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल के सार्थक अवदान की सूची भी शायद इसीलिये बेहद लम्बी होगी, जिसमें सभी का जिक्र या नामोल्लेख कर पाना एक अध्याय की सीमा से परे की चीज लगती है। फिर यह मुश्किल तब और बढ़ जाती है, जब हम यह देखते हैं कि साधारण या विशुद्ध रूप से फ्लॉप किसी फिल्म में यदि लक्ष्मी-प्यारे मौजूद हैं, तो शर्तिया वहाँ एक गीत ऐसा अवश्य होगा, जो ठीक ढंग से संगीत-प्रेमियों के बीच चर्चा में आया होगा।
यह भी संभव है कि उसकी लोकप्रियता रेडियो पर बजकर या रेकॉर्ड व कैसेटों की उल्लेखनीय बिक्री से पुख्ता तौर पर बनी होगी। इसी कारण वह गीत निश्चित ही अपनी फिल्म की असफलता से निरपेक्ष रहते हुए, लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल की संगीत प्रतिभा के सामर्थ्य को व्यक्त कर रहा होगा।
इसलिये हम 'एल।पी।' के संगीत-पटल को पूरी तरह किसी फेहरिस्त में बाँधकर रख पाने में असमर्थ ही दिखाई देते हैं। फिर भी, उनकी प्रतिभा का सबसे नायाब नमूना मानी जाने वाली कुछ फिल्मों के नाम लिए जा सकते हैं, जो एक अनूठा 'एल।पी। टाईप' बनाती रही हैं।
उन्होंने भरतपुर महाराजा किशन सिंह महाराज के यहाँ बैण्ड में ट्रम्पेट भी बजाई है और पांचवें दशक की कुछ फिल्मों में संगीत भी दिया है। वे व्यावसायिक रूप से उतने सफल संगीतकार नहीं हो सके, मगर अपने विलक्षण संगीत ज्ञान के चलते ज्यादातर संगीतकारों- सी। रामचंद्र, नौशाद एवं के। दत्ता के यहाँ उनकी फिल्मी धुनों में बरसों तक ट्रम्पेट बजाया है।
उन्हीं के संस्कारों और प्रभाव के चलते प्यारेलाल में एक बेहतरीन कम्पोजर और ऑर्केस्ट्रा अरेंजर के गुण विकसित हो सके।
इस तरह हम कह सकते हैं की वाद्यों को सजाने की सर्वाधिक रचनात्मक शैली, 'एल।पी।' की बनायी धुनों के माध्यम से बेहतर तरीके से दिखाई देती है। इसमें अतिरिक्त मिठास घोलने में उनकी शास्त्रीय-संगीत पर मजबूत पकड़ और शास्त्रीय तालों का समुचित ज्ञान भी सहायता करता है।
लता मंगेशकर ने अहम भूमिका निभायी
यह कहा जाता है कि जब सारे दिग्गज संगीत-निर्माता साठ के दशक के उत्तरार्द्ध में अत्यधिक सफल तरीके से रूपहले पर्दे पर सक्रिय थे, तब लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल को शुरुआती काम दिलाने एवं स्वतंत्र संगीतकार के रूप में स्थापित होने में मदद करने के लिए लता मंगेशकर ने अहम भूमिका निभायी थी।
लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल के सार्थक अवदान की सूची भी शायद इसीलिये बेहद लम्बी होगी, जिसमें सभी का जिक्र या नामोल्लेख कर पाना एक अध्याय की सीमा से परे की चीज लगती है। फिर यह मुश्किल तब और बढ़ जाती है, जब हम यह देखते हैं कि साधारण या विशुद्ध रूप से फ्लॉप किसी फिल्म में यदि लक्ष्मी-प्यारे मौजूद हैं, तो शर्तिया वहाँ एक गीत ऐसा अवश्य होगा, जो ठीक ढंग से संगीत-प्रेमियों के बीच चर्चा में आया होगा।
यह भी संभव है कि उसकी लोकप्रियता रेडियो पर बजकर या रेकॉर्ड व कैसेटों की उल्लेखनीय बिक्री से पुख्ता तौर पर बनी होगी। इसी कारण वह गीत निश्चित ही अपनी फिल्म की असफलता से निरपेक्ष रहते हुए, लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल की संगीत प्रतिभा के सामर्थ्य को व्यक्त कर रहा होगा।
इसलिये हम 'एल।पी।' के संगीत-पटल को पूरी तरह किसी फेहरिस्त में बाँधकर रख पाने में असमर्थ ही दिखाई देते हैं। फिर भी, उनकी प्रतिभा का सबसे नायाब नमूना मानी जाने वाली कुछ फिल्मों के नाम लिए जा सकते हैं, जो एक अनूठा 'एल।पी। टाईप' बनाती रही हैं।
कुछ प्रमुख संगीतमय फिल्में इस तरह हैं
ऐसे में, कुछ प्रमुख संगीतमय फिल्में इस तरह हैं : आसरा, आए दिन बहार के, प्यार किये जा, अनीता, फर्ज, मिलन, पत्थर के सनम, शागिर्द, नाईट इन लन्दन, बहारों की मंजिल, इज्जत, मेरे हमदम मेरे दोस्त, राजा और रंक, आया सावन झूम के, धरती कहे पुकार के, दो रास्ते, इंतकाम, जीने की राह, साजन, माधवी, आन मिलो सजना, खिलौना, जीवन-मृत्यु, हमजोली, मेरा गांव मेरा देश, हाथी मेरे साथी, महबूब की मेंहदी, दुश्मन, आप आए बहार आई, जल बिन मछली नृत्य बिन बिजली, शोर, बॉबी, दाग़, चरस,
अमर अकबर एंथोनी, मैं तुलसी तेरे आंगन की, सत्यम शिवम् सुंदरम, सरगम, आशा, कर्ज, एक दूजे के लिए, क्रांति, नसीब, प्रेम रोग, हीरो, अर्पण, उत्सव, सुर संगम, ग़ुलामी, मेरी जंग, नगीना, कर्मा, नाम, मिस्टर इंडिया, तेजाब, दयावान, राम लखन, बंटवारा और खलनायक जैसी सांगीतिक रूप से सुपर-डुपर हिट फिल्में।
यहीं उन सिग्नेचर धुनों को भी याद करना चाहिए, जो प्रणय की पराकाष्ठा में रचे गए हैं। यह युगल-गीतों की धरती, लक्ष्मी-प्यारे की सबसे मुखर पहचान है, जो उन्हें अपने समकालीनों से बिलकुल निराले ही अंदाज में अलग कर देती है।
प्रमुख रूप से याद आने वाले गीत
इन गीतों में प्रमुख रूप से याद आने वाले गीत हैं, 'वो जब याद आये बहुत याद आये' (पारसमणि) 'तुम गगन के चन्द्रमा हो, (सती सावित्री), 'वो हैं जरा खफा-खफा' (शागिर्द), 'सावन का महीना पवन करे सोर' (मिलन), 'बदरा छाए कि झूले पड़ गए हाए' (आया सावन झूम के), 'ढल गया दिन हो गयी शाम' (हमजोली), 'जे हम तुम चोरी से बंधे इक डोरी से' (धरती कहे पुकार के), 'झिलमिल सितारों का आंगन होगा' (जीवन-मृत्यु),' अच्छा तो हम चलते हैं' (आन मिलो सजना)।
इन गीतों को इस सूची में 'ये दिल तुम बिन कहीं लगता नहीं' (इज्जत), 'मुझे तेरी मुहब्बत का सहारा मिल गया होता' (आप आये बहार आई), 'महबूब मेरे, महबूब मेरे तू है तो दुनिया कितनी हसीं है' (पत्थर के सनम), 'क्या कहता है ये सावन' (मेरा गांव मेरा देश),
'पत्ता-पत्ता बूटा-बूटा हाल हमारा जाने है, (एक नजर), 'दिल की बातें दिल ही जाने, (रूप तेरा मस्ताना), 'इक प्यार का नग़मा है' (शोर), 'मैं न भूलूंगा, मैं न भूलूंगी' (रोटी कपड़ा और मकान), 'हम तुम एक कमरे में बंद हों' (बॉबी), 'कल की हसीं मुलाकात के लिए' (चरस), 'अब चाहे मां रूठे या बाबा' (दाग़), 'ढफली वाले ढफली बजा' (सरगम), 'मुहब्बत है क्या चीज' (प्रेम रोग), 'हम बने तुम बने एक दूजे के लिए' (एक दूजे के लिए), 'प्यार करने वाले कभी डरते नहीं' (हीरो), 'तेरा नाम लिया तुझे याद किया' (राम लखन), 'दिल करता है ईलू-ईलू' (सौदागर) और 'देर से आना जल्दी जाना' (खलनायक) जैसे तमाम सुरीले गीत शामिल हैं।
ये वे गीत हैं, जो सहज ही याद आते हैं। लेकिन इनके अलावा भी बहुतेरे ऐसे गीत हैं, जिनकी गुणवत्ता पर कोई भी संगीत-प्रेमी उंगली नहीं रख सकता। अलग से दो-चार गीतों की चर्चा सिर्फ यह देखने के लिए कि कैसे ढेरों वाद्यों के संयोजन से बनने वाले ऑर्केस्ट्रेशन का कमाल उनके हर दूसरे गीत में होता रहा है।
अमर अकबर एंथोनी, मैं तुलसी तेरे आंगन की, सत्यम शिवम् सुंदरम, सरगम, आशा, कर्ज, एक दूजे के लिए, क्रांति, नसीब, प्रेम रोग, हीरो, अर्पण, उत्सव, सुर संगम, ग़ुलामी, मेरी जंग, नगीना, कर्मा, नाम, मिस्टर इंडिया, तेजाब, दयावान, राम लखन, बंटवारा और खलनायक जैसी सांगीतिक रूप से सुपर-डुपर हिट फिल्में।
यहीं उन सिग्नेचर धुनों को भी याद करना चाहिए, जो प्रणय की पराकाष्ठा में रचे गए हैं। यह युगल-गीतों की धरती, लक्ष्मी-प्यारे की सबसे मुखर पहचान है, जो उन्हें अपने समकालीनों से बिलकुल निराले ही अंदाज में अलग कर देती है।
प्रमुख रूप से याद आने वाले गीत
इन गीतों में प्रमुख रूप से याद आने वाले गीत हैं, 'वो जब याद आये बहुत याद आये' (पारसमणि) 'तुम गगन के चन्द्रमा हो, (सती सावित्री), 'वो हैं जरा खफा-खफा' (शागिर्द), 'सावन का महीना पवन करे सोर' (मिलन), 'बदरा छाए कि झूले पड़ गए हाए' (आया सावन झूम के), 'ढल गया दिन हो गयी शाम' (हमजोली), 'जे हम तुम चोरी से बंधे इक डोरी से' (धरती कहे पुकार के), 'झिलमिल सितारों का आंगन होगा' (जीवन-मृत्यु),' अच्छा तो हम चलते हैं' (आन मिलो सजना)।
इन गीतों को इस सूची में 'ये दिल तुम बिन कहीं लगता नहीं' (इज्जत), 'मुझे तेरी मुहब्बत का सहारा मिल गया होता' (आप आये बहार आई), 'महबूब मेरे, महबूब मेरे तू है तो दुनिया कितनी हसीं है' (पत्थर के सनम), 'क्या कहता है ये सावन' (मेरा गांव मेरा देश),
'पत्ता-पत्ता बूटा-बूटा हाल हमारा जाने है, (एक नजर), 'दिल की बातें दिल ही जाने, (रूप तेरा मस्ताना), 'इक प्यार का नग़मा है' (शोर), 'मैं न भूलूंगा, मैं न भूलूंगी' (रोटी कपड़ा और मकान), 'हम तुम एक कमरे में बंद हों' (बॉबी), 'कल की हसीं मुलाकात के लिए' (चरस), 'अब चाहे मां रूठे या बाबा' (दाग़), 'ढफली वाले ढफली बजा' (सरगम), 'मुहब्बत है क्या चीज' (प्रेम रोग), 'हम बने तुम बने एक दूजे के लिए' (एक दूजे के लिए), 'प्यार करने वाले कभी डरते नहीं' (हीरो), 'तेरा नाम लिया तुझे याद किया' (राम लखन), 'दिल करता है ईलू-ईलू' (सौदागर) और 'देर से आना जल्दी जाना' (खलनायक) जैसे तमाम सुरीले गीत शामिल हैं।
ये वे गीत हैं, जो सहज ही याद आते हैं। लेकिन इनके अलावा भी बहुतेरे ऐसे गीत हैं, जिनकी गुणवत्ता पर कोई भी संगीत-प्रेमी उंगली नहीं रख सकता। अलग से दो-चार गीतों की चर्चा सिर्फ यह देखने के लिए कि कैसे ढेरों वाद्यों के संयोजन से बनने वाले ऑर्केस्ट्रेशन का कमाल उनके हर दूसरे गीत में होता रहा है।
'मेरे महबूब कयामत होगी'
पियानो, एकॉर्डियन, मैन्डोलिन, ऑर्गन, सैक्सोफोन, ट्रम्पेट, हारमोनियम, कांगो-बांगो, वॉयलिन, गिटार के साथ-साथ सितार, सारंगी, सरोद, तबला, ढोलक, नाल, ढफली, खंजड़ी एवं घटम आदि का सफलतापूर्वक निर्वाह 'एल. पी.' अपनी तर्जों को सजाने में करते रहे। कुछ ऐसी धुनें, जो इस संगीतकार जोड़ी की ऑर्केस्ट्रेशन पर सिद्धहस्तता दर्शाती हैं, यहाँ रेखांकित कर रहा हूँ। आप नए सिरे से इन्हें धैर्यपूर्वक सुनें, तो पाएंगे कि कितने सौन्दर्य के साथ इनका इंटरल्यूड्स रचा गया है।
ये गीत हैं : 'उइ मा उइ मा ये क्या हो गया गया (पारसमणि), 'तोहार नाम लइके छोड़ा है जमाना' (आया तूफान), 'मेरे महबूब कयामत होगी' (मिस्टर एक्स इन बॉम्बे), 'उड़ के पवन के संग चलूंगी' (शागिर्द), 'नजर न लग जाये किसी की राहों में' (नाईट इन लन्दन), 'अल्लाह ये अदा कैसी है इन हसीनों में, (मेरे हमदम मेरे दोस्त), 'मस्त बहारों का मैं आशिक' (फर्ज), 'कजरा लगा के, बिंदिया सजा के' (जल बिन मछली नृत्य बिन बिजली)।
इन्हीं गीतों में ये भी शामिल हैं- 'चन्दा को ढूंढ़ने सभी तारे निकल पड़े' (जीने की राह), 'छुप गए सरे नजारे ओए क्या बात हो गयी' (दो रास्ते), 'पर्वत के उस पार' (सरगम), 'परदा है परदा' (अमर अकबर एंथोनी), 'मैं तेरे इश्क में मर ना जाऊं कहीं' (लोफर), 'झूठ बोले कौआ काटे' (बॉबी), 'चना जोर गरम बाबू मैं लाया मजेदार' (क्रांति), 'हम तुम दोनों जब मिल जाएंगे' (एक दूजे के लिए), 'ओम शांति ओम' (कर्ज), 'भंवरे ने खिलाया फूल-फूल' (प्रेम रोग), 'मेरे मन बाजा मृदंग' (उत्सव), 'कहते हैं मुझको हवा-हवाई' (मिस्टर इंडिया) और 'एक दो तीन।।।।।' (तेजाब) आदि।
अभिनव संगीत के आदर्श उदाहरण
सैकड़ों फिल्मों के अत्यंत मनोग्राही संगीत से अलग उनको कुछ नया रचने वाले, जिज्ञासु और प्रयोगधर्मी संगीतकार के रूप में भी याद किया जाता है।
ये कुछ ऐसी फिल्में हैं, जिनमें लक्ष्मी-प्यारे ने अपने प्रचलित मुहावरे को तोड़कर बिल्कुल नयी जमीन का संगीत रचा है।
लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल की अमरता सती-सावित्री, माधवी, सत्यम शिवम सुंदरम, सुर-संगम, नाचे मयूरी और उत्सव के कारण भी मानी जाती है, जो अभिनव संगीत के आदर्श उदाहरण हैं।
ये गीत हैं : 'उइ मा उइ मा ये क्या हो गया गया (पारसमणि), 'तोहार नाम लइके छोड़ा है जमाना' (आया तूफान), 'मेरे महबूब कयामत होगी' (मिस्टर एक्स इन बॉम्बे), 'उड़ के पवन के संग चलूंगी' (शागिर्द), 'नजर न लग जाये किसी की राहों में' (नाईट इन लन्दन), 'अल्लाह ये अदा कैसी है इन हसीनों में, (मेरे हमदम मेरे दोस्त), 'मस्त बहारों का मैं आशिक' (फर्ज), 'कजरा लगा के, बिंदिया सजा के' (जल बिन मछली नृत्य बिन बिजली)।
इन्हीं गीतों में ये भी शामिल हैं- 'चन्दा को ढूंढ़ने सभी तारे निकल पड़े' (जीने की राह), 'छुप गए सरे नजारे ओए क्या बात हो गयी' (दो रास्ते), 'पर्वत के उस पार' (सरगम), 'परदा है परदा' (अमर अकबर एंथोनी), 'मैं तेरे इश्क में मर ना जाऊं कहीं' (लोफर), 'झूठ बोले कौआ काटे' (बॉबी), 'चना जोर गरम बाबू मैं लाया मजेदार' (क्रांति), 'हम तुम दोनों जब मिल जाएंगे' (एक दूजे के लिए), 'ओम शांति ओम' (कर्ज), 'भंवरे ने खिलाया फूल-फूल' (प्रेम रोग), 'मेरे मन बाजा मृदंग' (उत्सव), 'कहते हैं मुझको हवा-हवाई' (मिस्टर इंडिया) और 'एक दो तीन।।।।।' (तेजाब) आदि।
अभिनव संगीत के आदर्श उदाहरण
सैकड़ों फिल्मों के अत्यंत मनोग्राही संगीत से अलग उनको कुछ नया रचने वाले, जिज्ञासु और प्रयोगधर्मी संगीतकार के रूप में भी याद किया जाता है।
ये कुछ ऐसी फिल्में हैं, जिनमें लक्ष्मी-प्यारे ने अपने प्रचलित मुहावरे को तोड़कर बिल्कुल नयी जमीन का संगीत रचा है।
लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल की अमरता सती-सावित्री, माधवी, सत्यम शिवम सुंदरम, सुर-संगम, नाचे मयूरी और उत्सव के कारण भी मानी जाती है, जो अभिनव संगीत के आदर्श उदाहरण हैं।