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Sirf Ek Bandaa Kaafi Hai: ‘बंदा’ ने अकेले जीते पांच फिल्मफेयर पुरस्कार, यहां फिर से पढ़िए फिल्म का पूरा रिव्यू

Mon, 27 Nov 2023 01:10 PM IST
Pankaj Shukla पंकज शुक्ल
Updated Mon, 27 Nov 2023 01:10 PM IST
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Sirf Ek Bandaa Kaafi Hai Review in Hindi by Pankaj Shukla Manoj Bajpayee Vinod Bhanushali Poonam Chand
फिल्मफेयर ओटीटी पुरस्कारों में रही‘सिर्फ एक बंदा काफी है’ की धमक - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
Movie Review
सिर्फ एक बंदा काफी है
कलाकार
मनोज बाजपेयी , विपिन शर्मा , सूर्य मोहन कुलश्रेष्ठ , अदिति सिन्हा अद्रिजा , इखलाक अहमद खान , बालाजी लक्ष्मीनरसिम्हन , अभिजीत लाहिड़ी और विवेक टंडन
लेखक
दीपक किंगरानी
निर्देशक
अपूर्व सिंह कार्की
निर्माता
विनोद भानुशाली
रिलीज डेट
23 मई 2023
ओटीटी
जी5
रेटिंग
4/5

ओटीटी जी5 पर रिलीज के समय जब ‘अमर उजाला’ ने फिल्म ‘सिर्फ एक बंदा काफी है’ को अपने रिव्यू में चार स्टार की रेटिंग दी, तभी ये तय हो गया था कि ये फिल्म इस साल के ओटीटी पुरस्कारों में धूम मचाने वाली है। फिल्म ने बीती रात हुए फिल्मफेयर ओटीटी पुरस्कारों में सबसे ज्यादा पांच पुरस्कार जीते। सर्वेश्रेष्ठ फिल्म (विनोद भानुशाली), सर्वश्रेष्ठ निर्देशक (अपूर्व सिंह कर्की), सर्वश्रेष्ठ अभिनेता (मनोज बाजपेयी), सर्वश्रेष्ठ कहानी (दीपक किंगरानी) और सर्वश्रेष्ठ संवाद (दीपक किंगरानी) पुरस्कार जीतने वाली इस फिल्म का एक बार फिर पढ़िए पूरा रिव्यू, सिर्फ अमर उजाला डॉट कॉम पर...

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यह देश संतों का देश है। संतों पर इस देश के लोगों की अटूट श्रद्धा भी रही है। उन पर एक विश्वास होता है आमजन का कि वह कुछ गलत नहीं करेंगे। ठीक वैसे ही जैसे अपने परिवार में सगे संबंधियों पर एक विश्वास होता है। फिल्म ‘सिर्फ एक बंदा काफी है’ के उपसंहार का एक दृश्य है जिसमें वकील सोलंकी अदालत के सामने अपनी जिरह का आखिरी हिस्सा पूरा कर रहे हैं। वह शंकर और पार्वती के संवाद का दृष्टांत देते हुए बताते हैं कि पाप, अति पाप और महापाप क्या है? रावण ने सीता का अपहरण किया, यह अति पाप है। इसका प्रायश्चित हो सकता है। लेकिन, उसने साधु वेश में एक महिला का अपहरण किया, यह महापाप है और शिव पार्वती संवाद के मुताबिक इसके लिए कोई क्षमा नहीं है। यह विश्वास को भंग करने का अपराध है। समाज या परिवार जिन पर आंख मूंदकर विश्वास करता हो, वे जब इस विश्वास का अनुचित लाभ उठाकर किसी बहू या बेटी पर हाथ डालें, तो उसकी सजा सिर्फ मृत्युदंड है।

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Sirf Ek Bandaa Kaafi Hai Review in Hindi by Pankaj Shukla Manoj Bajpayee Vinod Bhanushali Poonam Chand
सिर्फ एक बंदा काफी है - फोटो : अमर उजाला, मुंबई

पूनम चंद सोलंकी की सच्ची कहानी
फिल्म ‘सिर्फ एक बंदा काफी है’ को बनाना साहस का काम है। निर्माता विनोद भानुशाली ने जब से टी सीरीज से अलग होकर अपना अलग काम शुरू किया है, वह लगातार ऐसी कहानियां चुन रहे हैं, जिनकी तरफ मुंबई के आम फिल्म निर्माताओं को ध्यान कम ही जाता है। इस बार उन्होंने कहानी चुनी है उन पूनमचंद सोलंकी के साहस की जिन्होंने देश के सबसे चर्चित मामलों में से एक में एक नाबालिग की तरफ से पैरवी की और लाखों अनुयायियों वाले एक बाबा को जेल की सलाखों के पीछे पहुंचाया। पांच साल तक चले इस मुकदमे के दौरान उनको हतोत्साहित करने के, धमकाने के और देश के दिग्गज वकीलों के आभामंडल के सामने हाशिये पर धकेलने की हुई कोशिशें, इस फिल्म का हिस्सा हैं। एक साधारण सा सेशंस कोर्ट (सत्र न्यायालय) का वकील जो इन दिग्गज वकीलों की नजीरें पढ़ पढ़कर अपना ज्ञान बढ़ाता रहा है, इनके साथ फोटो खिंचाने, इनके साथ बैठने तक को एक उपलब्धि मानता है। वही वकील जब अपनी मुवक्किल के लिए इनके सामने अकाट्य तर्क रखता है तो यह हिंदी सिनेमा का एक ऐसा कोर्ट रूम ड्रामा बनता है जिसे देखना इस कालखंड में सबसे जरूरी है।

इसे भी पढ़ें- SEBKH: 'सिर्फ एक बंदा काफी है' को न्यूयॉर्क इंडियन फिल्म फेस्टिवल में मिला सम्मान, मनोज बाजपेयी ने जताया आभार

Sirf Ek Bandaa Kaafi Hai Review in Hindi by Pankaj Shukla Manoj Bajpayee Vinod Bhanushali Poonam Chand
सिर्फ एक बंदा काफी है - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

कहानी विश्वास के मान मर्दन की
अंधभक्त माता पिता अपनी बच्ची की तबीयत खराब होने पर उसे अपने ‘श्रद्धेय’ बाबा के पास लेकर जाते हैं। बाबा उस बच्ची का मान मर्दन करता है। माता पिता अपनी बच्ची को न्याय दिलाने के लिए कानून का सहारा लेते हैं। सरकारी वकील इस मामले का करोड़ों मे सौदा करने की फेर में होता है तो कुछ कर्तव्यनिष्ठ पुलिसकर्मी उसकी मदद को आगे आते हैं और सुझाते हैं एक ऐसे वकील का नाम, जिसकी ईमानदारी पर पुलिस को भी भरोसा है। फिल्म में अधिकतर इस वकील को सोलंकी कहकर ही संबोधित किया गया है, लेकिन एक दृश्य में उनका नाम आता है, पूनम चंद। पूनम चंद सोलंकी ने जिस बाबा के खिलाफ पॉक्सो एक्ट के तहत ये केस लड़ा, उसे जीवित रहने तक आजीवन कारावास की सजा हुई और ये पूरा मामला कानून के छात्रों के लिए एक ऐसा दृष्टांत साबित हुआ, जिसकी मिसाल आने वाले वर्षों में बार बार दी जाती रहेंगी।

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Sirf Ek Bandaa Kaafi Hai Review in Hindi by Pankaj Shukla Manoj Bajpayee Vinod Bhanushali Poonam Chand
सिर्फ एक बंदा काफी है - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

मनोज बाजपेयी का कालजयी अभिनय सोलंकी का ये किरदार परदे पर मनोज बाजपेयी ने निभाया है। अपने तमाम किरदारों का चोला अपनी अदाकारी की रूह से जीवंत कर देने वाले मनोज बाजपेयी फिल्म ‘सिर्फ एक बंदा काफी है’ की भी रूह हैं। जोधपुर की स्थानीय बोली में अपनी भाषा को साधते हुए मनोज बाजपेयी यहां एक बुजुर्ग मां के बेटे और एक बेटे के पिता के रूप में हैं। फीस का जिक्र आने पर सोलंकी बस मांगते हैं, ‘गुड़िया की स्माइल’। फिल्म में इस मामले के दिग्गज वकीलों के असल नाम तो नहीं लिए गए हैं, लेकिन राम जेठमलानी, सुब्रमणियन स्वामी और सलमान खुर्शीद से प्रेरित किरदारों के सामने पूनम चंद सोलंकी की जिरह को मनोज बाजपेयी ने जिस तरह जिया है, वह अदाकारी की पाठ्यपुस्तक के अध्याय बनते दिखते हैं। बचाव पक्ष के वकील का मेज पर हाथ पटककर जज को प्रभावित करने वाले दृश्य में जब सोलंकी बने मनोज बाजपेयी भी अपना हाथ मेज पर पटकते हैं और बाद में कहते हैं, ‘लग गई यार’ तो ये उनके अभिनय का चरम बिंदु बनता है।

Sirf Ek Bandaa Kaafi Hai Review in Hindi by Pankaj Shukla Manoj Bajpayee Vinod Bhanushali Poonam Chand
सिर्फ एक बंदा काफी है - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

एफएफआई के लिए इस साल का सबक
फिल्म ‘सिर्फ एक बंदा काफी है’ सिर्फ और सिर्फ मनोज बाजपेयी के अभिनय को देखने के लिए भी देखी जा सकती है। फिल्म का विषय तो अपने आप में इसे एक दर्शनीय फिल्म बनाता ही है। फिल्म की कथा वस्तु किसी दूसरी फिल्म से प्रेरित नहीं है। फिल्म अपने आप में समग्र है। और, ऐसी फिल्म है जिसे अगर सिनेमाघरों मे भी प्रदर्शित किया जाता तो मौखिक प्रचार से ये फिल्म हिट होने की पूरी संभावनाएं दिखती हैं। संभावना इस फिल्म में तमाम राष्ट्रीय अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार जीतने की भी हैं। फिल्म फेडरेशन ऑफ इंडिया की जो जूरी देश की प्रतिनिधि फिल्म के रूप में एक फिल्म हर साल ऑस्कर पुरस्कारों के लिए भेजती है, उसे भी ये फिल्म बहुत ध्यान से देखनी चाहिए। ऐसा इसलिए क्योंकि इस फिल्म में ऑस्कर जीतने के सारे अवयव मौजूद हैं। 

Sirf Ek Bandaa Kaafi Hai Review in Hindi by Pankaj Shukla Manoj Bajpayee Vinod Bhanushali Poonam Chand
सिर्फ एक बंदा काफी है - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

साथी कलाकारों का नायाब अभिनय
फिल्म ‘सिर्फ एक बंदा काफी है’ में मनोज बाजपेयी के बाद जिस कलाकार का अभिनय देखने लायक है, वह हैं अदिति सिन्हा अद्रिजा। बाबा की कुचेष्टाओं का शिकार एक 16 साल की बच्ची के किरदार में अदिति जब अदालत में कहती है, ‘मेरे साथ ये उस इंसान ने किया जिसे मैंने भगवान माना।’ तो पूरी कहानी का सार बस उनकी आंखों में इस दौरान आए आंसुओं में सिमट आता है। बचाव पक्ष के वकील के रूप में विपिन शर्मा का शातिराना अंदाज प्रभावित करता है और बाबा के किरदार में भारतेंदु नाट्य अकादमी, लखनऊ के पूर्व निदेशक सूर्य मोहन कुलश्रेष्ठ का अभिनय भी प्रशंसनीय है। सेशंस कोर्ट के जज के रूप में इखलाक अहमद खान की संजीदगी देखने लायक है तो दिग्गज वकीलों के रूप में अदालत में पेश होने वाले कलाकारों बालाजी लक्ष्मीनरसिम्हन, अभिजीत लाहिड़ी, विवेक टंडन ने भी क्रमश: सुब्रमणियन स्वामी, राम जेठमलानी और सलमान खुर्शीद से प्रेरित किरदारों में सराहनीय अभिनय किया है। और, ये फिल्म के कास्टिग डायरेक्टर शिवम गुप्ता की भी जीत है।

Sirf Ek Bandaa Kaafi Hai Review in Hindi by Pankaj Shukla Manoj Bajpayee Vinod Bhanushali Poonam Chand
सिर्फ एक बंदा काफी है - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

चुस्त लेखन, उम्दा निर्देशन
लेखक दीपक किंगरानी की पटकथा और संवाद फिल्म ‘सिर्फ एक बंदा काफी है’ का वह आधार है जिस पर ये बेहतरीन फिल्म बनी है। दीपक ने शुरू के एक घंटे इतनी कसी पटकथा लिखी है कि दर्शक इसे देखना शुरू करने के बाद अपनी सीट से हिल नहीं सकता। बीच में हालांकि फिल्म थोड़ा बहकती भी है लेकिन इसे वापस इसके कथानक की उत्तेजना तक आने के लिए ये शायद जरूरी भी है। निर्देशक अपूर्व सिंह कार्की ने अपनी पहली ही फीचर फिल्म में हिंदी सिनेमा में एक लंबी लकीर खींची है। अपने कालखंड के लोकाचार को अपने सिनेमा का हिस्सा बनाना ही एक फिल्म निर्देशक की अपने पेशे के प्रति सच्ची ईमानदारी होती है। अपूर्व की दो दशक से अधिक की साधना उनकी इस पहली फिल्म के हर फ्रेम में नजर आती है। और, फिल्म को फ्रेम दर फ्रेम वास्तविकता के करीब रखने के इस महती कार्य में अपूर्व को अपने सिनेमैटोग्राफर अर्जुन कुकरेती से भरपूर मदद मिली है। समीर कोटियन का संपादन फिल्म को अंत तक चुस्त दुरुस्त बनाए रखता है। गीत संगीत फिल्म का फोकस बिंदु नहीं है लेकिन सोनू निगम का गाया ‘बंदेया’ और फिल्म का संदीप चौटा रचित पार्श्वसंगीत भी फिल्म ‘सिर्फ एक बंदा काफी है’ के चमकदार पहलू हैं।

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