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सीट का समीकरण: रामपुर खास में 1980 से प्रमोद तिवारी का दबदबा, बेटी भी लगा चुकी हैं हैट्रिक, ऐसा है इसका इतिहास
Fri, 30 Oct 2026 06:26 PM IST
अमन तिवारी
इलेक्शन डेस्क, नोएडा
इलेक्शन डेस्क, नोएडा
Published by: अमन तिवारी
Updated Fri, 30 Oct 2026 06:26 PM IST
सार
- प्रतापगढ़ जिले की रामपुर खास विधानसभा सीट पर 1980 से कांग्रेस का कब्जा है। प्रमोद तिवारी यहां से लगातार नौ बार जीते।
- उनके राज्यसभा जाने के बाद 2014 के उपचुनाव में उनकी बेटी आराधना मिश्रा 'मोना' विधायक बनीं।
- 2017 और 2022 भी उनकी जीत का सिलसिला बरकरार रहा। आइये जानते हैं इस सीट का चुनावी इतिहास...
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रामपुर खास सीट का समीकरण
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
उत्तर प्रदेश की चुनावी राजनीति में कुछ सीटें ऐसी हैं जहां दशकों से एक परिवार दबदबा है। प्रतापगढ़ जिले की रामपुर खास विधानसभा सीट भी प्रदेश की ऐसी ही चर्चित और हाई-प्रोफाइल सीटों में शामिल है। पिछले साढ़े चार दशक से यह सीट कांग्रेस का ऐसा अभेद्य किला बनी हुई है। दिग्गज कांग्रेस नेता प्रमोद तिवारी के लगातार 9 बार चुनाव जीतने से लेकर उनकी बेटी आराधना मिश्रा 'मोना' की हैट्रिक तक, रामपुर खास सीट पर एकछत्र वर्चस्व है। हमारी खास सीरीज सीट का समीकरण में आज इसी सीट की बात।
पहले जानते हैं रामपुर खास सीट के बारे में
उत्तर प्रदेश में कुल 75 जिले हैं, जिनमें कुल 403 विधानसभा सीटें हैं। इन्हीं में से एक जिला प्रतापगढ़ है। जिले में कुल सात विधानसभा सीटें हैं, जिनमें रामपुर खास, बाबागंज, कुंडा, विश्वनाथगंज, प्रतापगढ़, पट्टी और रानीगंज शामिल हैं। 'सीट का समीकरण' की कड़ी में आज हम प्रतापगढ़ जिले की रामपुर खास विधानसभा सीट की बात करेंगे। रामपुर खास विधानसभा सीट पहली बार 1967 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के दौरान अस्तित्व में आई थी। इससे पहले 1952, 1957 और 1962 के चुनावों में यह क्षेत्र अन्य पड़ोसी विधानसभा निर्वाचन क्षेत्रों का हिस्सा हुआ करता था। 1967 में परिसीमन के बाद यह स्वतंत्र रूप से रामपुर खास नाम से एक अलग विधानसभा सीट बनी।
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पहले जानते हैं रामपुर खास सीट के बारे में
उत्तर प्रदेश में कुल 75 जिले हैं, जिनमें कुल 403 विधानसभा सीटें हैं। इन्हीं में से एक जिला प्रतापगढ़ है। जिले में कुल सात विधानसभा सीटें हैं, जिनमें रामपुर खास, बाबागंज, कुंडा, विश्वनाथगंज, प्रतापगढ़, पट्टी और रानीगंज शामिल हैं। 'सीट का समीकरण' की कड़ी में आज हम प्रतापगढ़ जिले की रामपुर खास विधानसभा सीट की बात करेंगे। रामपुर खास विधानसभा सीट पहली बार 1967 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के दौरान अस्तित्व में आई थी। इससे पहले 1952, 1957 और 1962 के चुनावों में यह क्षेत्र अन्य पड़ोसी विधानसभा निर्वाचन क्षेत्रों का हिस्सा हुआ करता था। 1967 में परिसीमन के बाद यह स्वतंत्र रूप से रामपुर खास नाम से एक अलग विधानसभा सीट बनी।
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रामपुर खास का जातीय समीकरण
रामपुर खास विधानसभा सीट के जातिगत समीकरण की बात करें तो कुल मतदाताओं में ब्राह्मण, क्षत्रिय (ठाकुर), कायस्थ और कुर्मी समुदाय की आबादी सबसे निर्णायक भूमिका निभाती है। क्षेत्र में सर्वाधिक आबादी ब्राह्मण मतदाताओं की है, जो लगभग 25% हैं। इसके बाद क्षत्रिय (ठाकुर) मतदाताओं की हिस्सेदारी करीब 19% और कायस्थ मतदाताओं की आबादी लगभग 13% है, जबकि कुर्मी मतदाताओं की हिस्सेदारी करीब 10%है। बाकी बचे मतदाता अन्य जातियों व समुदायों से आते हैं।
रामपुर खास विधानसभा सीट के जातिगत समीकरण की बात करें तो कुल मतदाताओं में ब्राह्मण, क्षत्रिय (ठाकुर), कायस्थ और कुर्मी समुदाय की आबादी सबसे निर्णायक भूमिका निभाती है। क्षेत्र में सर्वाधिक आबादी ब्राह्मण मतदाताओं की है, जो लगभग 25% हैं। इसके बाद क्षत्रिय (ठाकुर) मतदाताओं की हिस्सेदारी करीब 19% और कायस्थ मतदाताओं की आबादी लगभग 13% है, जबकि कुर्मी मतदाताओं की हिस्सेदारी करीब 10%है। बाकी बचे मतदाता अन्य जातियों व समुदायों से आते हैं।
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रामपुर खास में हुई कांग्रेस के दबदबे की शुरुआत
रामपुर खास के पहले यानी कि 1967 के चुनाव में प्रतापगढ़ जिले की रामपुर खास विधानसभा सीट से कांग्रेस के आर. अंजोरे विजयी हुए। उन्होंने संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के कुंवर तेज बहादुर सिंह को 4,175 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में आर. अंजोरे को 17,805 वोट, जबकि कुंवर तेज बहादुर सिंह को 13,630 वोट मिले।
रामपुर खास में जीती संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी
इसके बाद 1969 के चुनाव हुए। इस चुनाव में प्रतापगढ़ जिले की रामपुर खास विधानसभा सीट से संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के कुंवर तेज भान सिंह विजयी हुए। उन्होंने कांग्रेस के राम अंजोर मिश्रा को 12,382 वोटों केअंतर से हराया। चुनाव में कुंवर तेज भान सिंह को 22,383 वोट, जबकि राम अंजोर मिश्रा को 10,001 वोट मिले।
1974 का चुनाव
इस चुनाव में रामपुर खास विधानसभा में कांग्रेस ने वापसी की। चुनाव में कांग्रेस के बाबू प्रभाकर सिंह विजयी हुए। उन्होंने सोशलिस्ट पार्टी के ननकू को 1,730 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में बाबू प्रभाकर सिंह को 12,581 वोट, जबकि ननकू को 10,851 वोट मिले।
रामपुर खास के पहले यानी कि 1967 के चुनाव में प्रतापगढ़ जिले की रामपुर खास विधानसभा सीट से कांग्रेस के आर. अंजोरे विजयी हुए। उन्होंने संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के कुंवर तेज बहादुर सिंह को 4,175 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में आर. अंजोरे को 17,805 वोट, जबकि कुंवर तेज बहादुर सिंह को 13,630 वोट मिले।
रामपुर खास में जीती संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी
इसके बाद 1969 के चुनाव हुए। इस चुनाव में प्रतापगढ़ जिले की रामपुर खास विधानसभा सीट से संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के कुंवर तेज भान सिंह विजयी हुए। उन्होंने कांग्रेस के राम अंजोर मिश्रा को 12,382 वोटों केअंतर से हराया। चुनाव में कुंवर तेज भान सिंह को 22,383 वोट, जबकि राम अंजोर मिश्रा को 10,001 वोट मिले।
1974 का चुनाव
इस चुनाव में रामपुर खास विधानसभा में कांग्रेस ने वापसी की। चुनाव में कांग्रेस के बाबू प्रभाकर सिंह विजयी हुए। उन्होंने सोशलिस्ट पार्टी के ननकू को 1,730 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में बाबू प्रभाकर सिंह को 12,581 वोट, जबकि ननकू को 10,851 वोट मिले।
इन चेहरों को मिली एक से ज्यादा बार जीत
- फोटो : अमर उजाला
आपातकाल का समय
1974 के विधानसभा चुनाव के कुछ समय बाद जून 1975 में देश भर में आपातकाल लगा दिया गया, जो 21 महीनों तक चला। मार्च 1977 में आपातकाल हटा और आम चुनाव हुए। इन चुनावों में कांग्रेस की हार हुई और मोरारजी देसाई के नेतृत्व में पहली गैर-कांग्रेसी 'जनता पार्टी' की सरकार बनी।
सत्ता में आते ही जनता पार्टी की केंद्र सरकार ने तर्क दिया कि हालिया लोकसभा चुनावों में हार के बाद कांग्रेस शासित राज्य सरकारें जनता का विश्वास खो चुकी हैं। इसी आधार पर उत्तर प्रदेश समेत नौ राज्यों की विधानसभाओं को समय से पहले भंग कर राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया। इसके बाद जून 1977 में हुए उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में जनता पार्टी को प्रचंड बहुमत मिला और राम नरेश यादव राज्य के नए मुख्यमंत्री बने। हालांकि, अंदरूनी कलह के कारण यह सरकार भी अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर सकी।
1974 के विधानसभा चुनाव के कुछ समय बाद जून 1975 में देश भर में आपातकाल लगा दिया गया, जो 21 महीनों तक चला। मार्च 1977 में आपातकाल हटा और आम चुनाव हुए। इन चुनावों में कांग्रेस की हार हुई और मोरारजी देसाई के नेतृत्व में पहली गैर-कांग्रेसी 'जनता पार्टी' की सरकार बनी।
सत्ता में आते ही जनता पार्टी की केंद्र सरकार ने तर्क दिया कि हालिया लोकसभा चुनावों में हार के बाद कांग्रेस शासित राज्य सरकारें जनता का विश्वास खो चुकी हैं। इसी आधार पर उत्तर प्रदेश समेत नौ राज्यों की विधानसभाओं को समय से पहले भंग कर राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया। इसके बाद जून 1977 में हुए उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में जनता पार्टी को प्रचंड बहुमत मिला और राम नरेश यादव राज्य के नए मुख्यमंत्री बने। हालांकि, अंदरूनी कलह के कारण यह सरकार भी अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर सकी।
1977 का चुनाव
आपातकाल खत्म होने के बाद राज्य में 1977 के चुनाव हुए। इस चुनाव में रामपुर खास विधानसभा सीट से कुंवर तेज भान सिंह विजयी हुए। इस बार उन्होंने निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर चुनाव में जीत हासिल की। उन्होंने जनता पार्टी के राजा राम किसान को 4,123 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में कुंवर तेजभान सिंह को 17,953 वोट, जबकि राजा राम किसान को 13,830 वोट मिले। रामपुर खास विधानसभा सीट पर कांग्रेस के अलावा किसी अन्य पार्टी या निर्दलीय उम्मीदवार की यह आखिरी जीत थी। इसके बाद से इस सीट पर लगातार कांग्रेस के प्रत्याशी ही जीत दर्ज करते आ रहे हैं।
हालांकि, उत्तर प्रदेश में 1977 के बाद 1980 में फिर से विधानसभा चुनाव हुए, क्योंकि केंद्र में जनता पार्टी की सरकार 1980 आते-आते अंदरूनी कलह के कारण बिखर गई। पार्टी के विघटन के बाद जनवरी 1980 में लोकसभा चुनाव हुए। इस चुनाव में इंदिरा गांधी की अगुवाई वाली कांग्रेस ने प्रचंड बहुमत के साथ केंद्र की सत्ता में जोरदार वापसी की। सत्ता में आते ही इंदिरा सरकार ने तर्क दिया कि हालिया लोकसभा चुनावों में जनता पार्टी को राज्यों में बुरी तरह हार मिली है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि राज्य सरकारों ने जनता का विश्वास खो दिया है। इसके बाद उत्तर प्रदेश समेत 9 राज्यों की विधानसभाओं को फिर भंग कर दिया गया।
विधानसभा भंग होने के बाद उत्तर प्रदेश में मई 1980 में दोबारा चुनाव कराए गए। इस चुनाव में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने भारी बहुमत हासिल किया और विश्वनाथ प्रताप सिंह (वी.पी. सिंह) उत्तर प्रदेश के नए मुख्यमंत्री बने।
आपातकाल खत्म होने के बाद राज्य में 1977 के चुनाव हुए। इस चुनाव में रामपुर खास विधानसभा सीट से कुंवर तेज भान सिंह विजयी हुए। इस बार उन्होंने निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर चुनाव में जीत हासिल की। उन्होंने जनता पार्टी के राजा राम किसान को 4,123 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में कुंवर तेजभान सिंह को 17,953 वोट, जबकि राजा राम किसान को 13,830 वोट मिले। रामपुर खास विधानसभा सीट पर कांग्रेस के अलावा किसी अन्य पार्टी या निर्दलीय उम्मीदवार की यह आखिरी जीत थी। इसके बाद से इस सीट पर लगातार कांग्रेस के प्रत्याशी ही जीत दर्ज करते आ रहे हैं।
हालांकि, उत्तर प्रदेश में 1977 के बाद 1980 में फिर से विधानसभा चुनाव हुए, क्योंकि केंद्र में जनता पार्टी की सरकार 1980 आते-आते अंदरूनी कलह के कारण बिखर गई। पार्टी के विघटन के बाद जनवरी 1980 में लोकसभा चुनाव हुए। इस चुनाव में इंदिरा गांधी की अगुवाई वाली कांग्रेस ने प्रचंड बहुमत के साथ केंद्र की सत्ता में जोरदार वापसी की। सत्ता में आते ही इंदिरा सरकार ने तर्क दिया कि हालिया लोकसभा चुनावों में जनता पार्टी को राज्यों में बुरी तरह हार मिली है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि राज्य सरकारों ने जनता का विश्वास खो दिया है। इसके बाद उत्तर प्रदेश समेत 9 राज्यों की विधानसभाओं को फिर भंग कर दिया गया।
विधानसभा भंग होने के बाद उत्तर प्रदेश में मई 1980 में दोबारा चुनाव कराए गए। इस चुनाव में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने भारी बहुमत हासिल किया और विश्वनाथ प्रताप सिंह (वी.पी. सिंह) उत्तर प्रदेश के नए मुख्यमंत्री बने।
1980: प्रमोद तिवारी के दौर की शुरुआत
इसके बाद राज्य में 1980 के चुनाव हुए। इस चुनाव में प्रतापगढ़ जिले की रामपुर खास विधानसभा सीट पर कांग्रेस (आई) के प्रमोद कुमार विजयी हुए। उन्होंने भारतीय जनता पार्टी के राजेंद्र बहादुर सिंह को 10,989 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में प्रमोद कुमार को 21,275 वोट, जबकि राजेंद्र बहादुर सिंह को 10,286 वोट मिले।
वर्ष 1977 के बाद रामपुर खास विधानसभा सीट पर साल 1980, 1985, 1989, 1991, 1993, 1996, 2002, 2007, 2012, 2014 (उपचुनाव), 2017 और 2022 के चुनाव हुए। इन सभी चुनावों में रामपुर खास सीट पर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का एकछत्र राज रहा। हालांकि इस दौरान प्रदेश में राजनीतिक समीकरण और सरकारें बदलती रहीं, लेकिन इस सीट पर कांग्रेस का परचम लगातार लहराता रहा।
इसके बाद राज्य में 1980 के चुनाव हुए। इस चुनाव में प्रतापगढ़ जिले की रामपुर खास विधानसभा सीट पर कांग्रेस (आई) के प्रमोद कुमार विजयी हुए। उन्होंने भारतीय जनता पार्टी के राजेंद्र बहादुर सिंह को 10,989 वोटों के अंतर से हराया। चुनाव में प्रमोद कुमार को 21,275 वोट, जबकि राजेंद्र बहादुर सिंह को 10,286 वोट मिले।
वर्ष 1977 के बाद रामपुर खास विधानसभा सीट पर साल 1980, 1985, 1989, 1991, 1993, 1996, 2002, 2007, 2012, 2014 (उपचुनाव), 2017 और 2022 के चुनाव हुए। इन सभी चुनावों में रामपुर खास सीट पर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का एकछत्र राज रहा। हालांकि इस दौरान प्रदेश में राजनीतिक समीकरण और सरकारें बदलती रहीं, लेकिन इस सीट पर कांग्रेस का परचम लगातार लहराता रहा।
2022 का नतीजा
- फोटो : अमर उजाला
लगातार 9 बार जीते प्रमोद तिवारी
इस दौर में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता प्रमोद तिवारी ने इस सीट से लगातार 9 बार चुनाव जीतकर कीर्तिमान स्थापित किया। 1980 से लेकर 2012 तक वे लगातार रामपुर खास के मतदाताओं का भरोसा जीतकर विधानसभा पहुंचते रहे।
इसके बाद वर्ष 2014 में कांग्रेस पार्टी ने प्रमोद तिवारी को राज्यसभा भेजने का फैसला किया। राज्यसभा सदस्य चुने जाने के बाद उन्होंने नियमनुसार रामपुर खास की विधानसभा सदस्यता (विधायक पद) से इस्तीफा दे दिया। उनके इस्तीफे के कारण खाली हुई इस सीट पर 2014 में उपचुनाव कराया गया, जिसमें कांग्रेस ने प्रमोद तिवारी की बेटी आराधना मिश्रा 'मोना' को मैदान में उतारा।
सीट पर प्रमोद तिवारी की बेटी आराधना मिश्रा पिता के विरासत को बढ़ा रहीं आगे
आराधना मिश्रा 'मोना' ने इस उपचुनाव में बड़ी जीत दर्ज की और अपने पिता की राजनीतिक विरासत को मजबूती से आगे बढ़ाया। इसके बाद वे 2017 और 2022 के आम चुनावों में भी लगातार विजयी रहीं। इस तरह 2014 के उपचुनाव सहित वे अब तक लगातार 3 बार रामपुर खास से विधायक चुनी जा चुकी हैं। यह सीट आज भी कांग्रेस और तिवारी परिवार का सबसे मजबूत राजनीतिक गढ़ बनी हुई है।
इस दौर में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता प्रमोद तिवारी ने इस सीट से लगातार 9 बार चुनाव जीतकर कीर्तिमान स्थापित किया। 1980 से लेकर 2012 तक वे लगातार रामपुर खास के मतदाताओं का भरोसा जीतकर विधानसभा पहुंचते रहे।
इसके बाद वर्ष 2014 में कांग्रेस पार्टी ने प्रमोद तिवारी को राज्यसभा भेजने का फैसला किया। राज्यसभा सदस्य चुने जाने के बाद उन्होंने नियमनुसार रामपुर खास की विधानसभा सदस्यता (विधायक पद) से इस्तीफा दे दिया। उनके इस्तीफे के कारण खाली हुई इस सीट पर 2014 में उपचुनाव कराया गया, जिसमें कांग्रेस ने प्रमोद तिवारी की बेटी आराधना मिश्रा 'मोना' को मैदान में उतारा।
सीट पर प्रमोद तिवारी की बेटी आराधना मिश्रा पिता के विरासत को बढ़ा रहीं आगे
आराधना मिश्रा 'मोना' ने इस उपचुनाव में बड़ी जीत दर्ज की और अपने पिता की राजनीतिक विरासत को मजबूती से आगे बढ़ाया। इसके बाद वे 2017 और 2022 के आम चुनावों में भी लगातार विजयी रहीं। इस तरह 2014 के उपचुनाव सहित वे अब तक लगातार 3 बार रामपुर खास से विधायक चुनी जा चुकी हैं। यह सीट आज भी कांग्रेस और तिवारी परिवार का सबसे मजबूत राजनीतिक गढ़ बनी हुई है।