Lok Sabha Elections : दिल्ली में भी सोशल इंजीनियरिंग से वोट साधने की कोशिश, भाजपा के साथ आप ने भी रखा ध्यान
यहां के मतदाता जातिवादी व्यवस्था वाली राजनीति से ज्यादा सरोकार नहीं रखते हैं। पार्टी लाइन और बेहतर उम्मीदवार पर ही वोट करने की परंपरा है, लेकिन राजनीतिक पार्टियों का प्रत्याशियों को चुनावी अखाड़े में उतारने में इसका अहम रोल रहता है।
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देश की राजधानी दिल्ली का मिजाज अन्य राज्यों की तुलना में बिल्कुल अलग है। यहां के मतदाता जातिवादी व्यवस्था वाली राजनीति से ज्यादा सरोकार नहीं रखते हैं। पार्टी लाइन और बेहतर उम्मीदवार पर ही वोट करने की परंपरा है, लेकिन राजनीतिक पार्टियों का प्रत्याशियों को चुनावी अखाड़े में उतारने में इसका अहम रोल रहता है। दिल्ली लोकसभा चुनावी रण में अपने रणबांकुरों को उतारने में पूरे तरह से सोशल इंजीनियरिंग का खास ध्यान रखा जाता है। 18वें लोकसभा चुनाव में भी सभी वर्गाें को समान प्रतिनिधित्व देकर राजनीतिक दलों ने सभी को साधने की कोशिश की है। दरअसल दिल्ली लोकसभा चुनाव एक ऐसा चुनाव है जहां की जीत-हार का संदेश पूरे देश में जाता है।
आम आदमी पार्टी व भाजपा की तरफ से जारी प्रत्याशियों की सूची में सभी वर्गों को प्रतिनिधित्व देकर सोशल इंजीनियरिंग को तरजीह दी गई है। एक तरह से जातिगत संतुलन बनाने की पूरी कोशिश दिखाई पड़ती है। दिल्ली की डेमोग्राफी पहले की अपेक्षा काफी बदल गई है और पूर्वांचलियों का चुनावी समर में अहम रोल हो गया है, लिहाजा आप व भाजपा दोनों ने ही सात लोकसभा सीटों में एक-एक सीट पर महाबल मिश्रा और मनोज तिवारी के रूप में उम्मीदवार को उतारा है। मिश्रा और तिवारी को उतारकर ब्राह्मण वर्ग को भी साधा गया है।
नई दिल्ली से भाजपा ने बांसुरी स्वराज को उतारकर पंजाबी ब्राह्मण को भी साधने की कवायद की है तो पूर्वी दिल्ली सीट से भाजपा ने हर्ष मल्होत्रा को चुनावी अखाड़े में उतारकर पंजाबी वर्ग को साधा है। भाजपा ने पूर्वांचली ही नहीं, बल्कि जाट, गुर्जर, वैश्य वर्ग के प्रत्याशियों को टिकट देकर सामंजस्य बिठाने का काम किया है। हालांकि दोनों मुख्य राजनीतिक दलों ने सिख और अल्पसंख्यक समाज को दरकिनार किया है। इस वर्ग से आप व भाजपा ने किसी को चुनावी मैदान में नहीं उतारा है।
चांदनी चौक लोकसभा सीट की बात करें तो पिछले चुनाव में वैश्य समाज के डॉ. हर्षवर्धन को प्रत्याशी बनाया गया था वहीं इस चुनाव में भी व्यापारी नेता प्रवीण खंडेलवाल को मौका दिया गया है। उत्तर-पूर्वी लोकसभा सीट से भोजपुरी गायक मनोज तिवारी को तीसरी बार मैदान में भाजपा ने उतारा है। पूर्वांचली वोटरों को आकर्षित करने के फाॅर्मूले पर पार्टी ने तिवारी को उतारा है। पिछले लोकसभा चुनाव में दक्षिण दिल्ली में गुर्जर नेता रमेश बिधूड़ी को पार्टी ने चुनावी मैदान में उतारा था, इस चुनाव में भी गुर्जर नेता रामवीर सिंह बिधूड़ी को ही चुनावी मैदान में उतारा है। यहां से आप ने भी सही राम को मैदान में उतारा है। पश्चिमी दिल्ली से जाट नेता प्रवेश वर्मा की जगह जाट नेता कमलजीत सहरावत पर पार्टी ने भरोसा जताया है। सुरक्षित सीट उत्तर-पश्चिम सीट से स्थानीय नेता योगेंद्र चंदोलिया पर भाजपा ने भरोसा जताया है। पूर्वी दिल्ली से आम आदमी पार्टी ने इस सीट से कुलदीप कुमार को उतारकर एससी/एसटी वर्ग को साधा है।
कांग्रेस के लिए होगी चुनौती
आम आदमी पार्टी और कांग्रेस गठबंधन के तहत दिल्ली में चुनाव लड़ रही हैं। समझौते के अनुसार कांग्रेस के खाते में सात में से तीन सीटें आई हैं। लिहाजा कांग्रेस के लिए इन तीन सीटों पर सोशल इंजीनियरिंग का फाॅर्मूला बिठाना मुश्किल भरा हो सकता है। चांदनी चौक सीट पर वैश्य वर्ग के मतदाता अधिक हैं, लिहाजा यहां इसी वर्ग के प्रत्याशी को उतारने की मजबूरी होगी। इसी तरह उत्तर-पूर्वी दिल्ली में पूर्वांचलियों का दबदबा है और भाजपा ने अपने पूर्वांचली चेहरे मनोज तिवारी को उतारा है, लिहाजा इन्हें टक्कर देने के लिए अन्य फाॅर्मूला पार्टी को बिठाना होगा। इसी तरह उत्तर पश्चिमी दिल्ली में भी पार्टी को ऐसा प्रत्याशी उतारना होगा, ताकि वर्ग आधारित राजनीति भी सध जाए और खास वर्ग के वोटरों की नाराजगी भी नहीं झेलनी पड़े।
संसदीय क्षेत्र भाजपा उम्मीदवार आप व कांग्रेस उम्मीदवार
- नई दिल्ली बांसुरी स्वराज सोमनाथ भारती
- पश्चिमी दिल्ली कमलजीत सहरावत महाबल मिश्रा
- दक्षिणी दिल्ली रामवीर सिंह बिधूड़ी सही राम
- पूर्वी दिल्ली हर्ष मल्होत्रा कुलदीप कुमार
- चांदनी चौक प्रवीण खंडेलवाल कांग्रेस (अभी कोई उम्मीदवार नहीं उतारा)
- उत्तर-पूर्वी दिल्ली मनोज तिवारी कांग्रेस (अभी कोई उम्मीदवार नहीं उतारा)
- उत्तर पश्चिमी दिल्ली योगेंद्र चंदोलिया कांग्रेस (अभी कोई उम्मीदवार नहीं उतारा)
सोशल मीडिया से...
कोई ईवीएम के साथ किसी ने बैलेट पेपर चुना
आगामी लोकसभा चुनाव को लेकर सोशल मीडिया पर ईवीएम ट्रेंड करता रहा। यूजर चुनाव के प्रथम व अंतिम चरण के बड़े अंतर को वोटों की गिनती की पारदर्शिता से जोड़ने लगे। विभिन्न पार्टी समर्थकों की आपस में जंग जारी रही। कोई ईवीएम के साथ खड़ा नजर आया, तो किसी ने बैलेट पैपर को चुना। दोनों के विभिन्न सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर फोटो लगाकर पोल बनाए गए कि कौन अधिक विश्वसनीय है। कई वीडियो वायरल भी हुए, जिनमें वक्ता ईवीएम के बजाय बैलेट पेपर से चुनाव कराने का समर्थन करते दिखे। यूजर्स ने चालाकीपूर्ण तरीके से वोट की गिनती करने का आरोप लगाकर चुनाव आयोग पर भी सवाल उठाया।
विचार : कई चरणों में चुनाव से बढ़ जाती हैं पेचीदगियां
कई चरणों में चुनाव कराने की जो भी वजह हो, लेकिन यह स्वस्थ लोकतंत्र के लिए ठीक नहीं है। इससे कई पेचीदगियां बढ़ जाती हैं। उम्मीदवारों को चुनौती झेलनी ही पड़ती है, साथ ही मतदाताओं का रुझान भी चुनाव के प्रति कम होने लगता है। चुनाव परिणाम अगर देरी से आता है तो जनता का विश्वास भी परिणाम में घटता है। जितना जल्दी चुनाव परिणाम आता है, जनता का विश्वास लोकतंत्र में बढ़ता है। दूसरे चरण की रणनीति और पहले चरण के चुनावी गणित में चुनाव की जिम्मेदारी संभालने वाले उलझ जाते हैं। कई चरणों में चुनाव होने से जिस पार्टी व प्रत्याशी के पास संसाधन ज्यादा होते हैं, उसे फायदा पहुंचने की गुंजाइश बनी रहती है। जहां तक मतदाताओं की बात है तो फ्लोटिंग वोटर जिनकी संख्या काफी अधिक होती है, उन्हें भी निर्णय ले पाना कठिन होता है। मतदान होने के बाद तुरंत परिणाम आना चाहिए। सात-सात चरणों में चुनाव होने से कई बार यह भी देखने को मिलता है कि पार्टी को चुनावी रणनीति बदलनी पड़ती है।
-प्रो. तनवीर ऐजाज, राजनीतिक विश्लेषक