राजस्थान: कहीं बेटा तो कहीं पत्नी, प्रत्याशी चयन में भूमिका भी कसौटी पर, दांव पर है दिग्गजों की साख
चूरू सीट पर भी भाजपा के बड़े नेता राजेन्द्र राठौड़ और कांग्रेस प्रत्याशी राहुल कस्वां के बीच तनातनी की खूब चर्चा है। राठौड़ का टिकट विधानसभा चुनाव में चूरू से कटा तो इसमें कस्वां की भूमिका के आरोप लगे।
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लोकसभा की 25 सीटों वाले राज्य राजस्थान में भले ही सियासत के धुरंधर कहे जाने वाले दिग्गज नेता खुद चुनावी मैदान में नहीं हैं, लेकिन उनकी साख सीधे तौर पर दांव पर लग गई है। दरअसल, कई सीटों पर बड़े नेताओं के पुत्र, पत्नी या रिश्तेदार मैदान में हैं। कुछ अन्य सीटें नेता के गृहनगर या टिकट में भूमिका को लेकर स्वत: ही उनके नाम से जुड़ गई हैं। ऐसे में परिणाम के बाद जीत का सेहरा इन्हीं के सिर पर रखा जाएगा तो हारने का ठीकरा भी इन्हीं के सिर फूटेगा। जानते हैं किन दिग्गजों की साख दांव पर लगी हुई है।
इन नेताओं पर भी जीत का दबाव: झालावाड़ बारां से दुष्यंत के सामने पूर्व मंत्री प्रमोद जैन भाया की पत्नी उर्मिला जैन मैदान में है। ऐसे में ये सीट सीधी भाया की प्रतिष्ठा से जुड़ी है। चूरू सीट पर भी भाजपा के बड़े नेता राजेन्द्र राठौड़ और कांग्रेस प्रत्याशी राहुल कस्वां के बीच तनातनी की खूब चर्चा है। राठौड़ का टिकट विधानसभा चुनाव में चूरू से कटा तो इसमें कस्वां की भूमिका के आरोप लगे। लोकसभा में भाजपा ने कस्वां का टिकट काट दिया तो वे कांग्रेस में आ गए। अब राठौड़ इस सीट पर बेहद सक्रिय दिख रहे हैं।
अशोक गहलोत
पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के बेटे वैभव गहलोत पिछला चुनाव जोधपुर से हार गए थे। कांग्रेस ने उन्हें इस बार जालोर—सिरोही से उतारा है। गहलोत वैसे तो पूरे प्रदेश में दौरे कर रहे हैं, लेकिन उनका फोकस जालोर ही है। नतीजा तय करेगा कि गहलोत का रसूख कितना है और वैभव का भविष्य कैसा होगा।
- पिछला चुनाव: वैभव गहलोत जोधपुर में 5 लाख से अधिक वोट पाने के बावजूद भाजपा के गजेंद्र सिंह शेखावत से करीब ढाई लाख वोटों से हार गए थे।
सचिन पायलट
दौसा और टोंक-सवाई माधोपुर सीट पर सचिन पायलट की चर्चा है। दौसा से मुरारी मीणा और टोंक से हरीश मीणा, दोनों के टिकट में सचिन की राय निर्णायक रही थी। गुर्जर बाहुल्य होने के कारण दोनों पर जीत का दवाब सचिन पर है।
- पिछला चुनाव: दौसा व टोंक दोनों सीटें कांग्रेस हार गई थी।
वसुंधरा राजे
पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के पुत्र दुष्यंत सिंह झालावाड़-बारां सीट से फिर मैदान में है। राजे पूरी तरह से इसी सीट पर सक्रिय हैं। बड़ा चेहरा होने के बावजूद अन्य सीटों पर वह बहुत कम ही नजर आ रही हैं।
- पिछला चुनाव : दुष्यंत सिंह 8.87 लाख वोट हासिल कर 4.50 लाख से अधिक मतों से जीते थे।
भजनलाल शर्मा
राज्य में मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा की साख भी दांव पर है। वे पूरे प्रदेश में चुनाव की कमान संभाले हैं। लेकिन गृहनगर होने के कारण भरतपुर सीट का नाम उनसे जुड़ा है। इस सीट पर इस बार भाजपा ने चेहरा बदल कर रामस्वरूप कोली को टिकट दिया है।
- पिछला चुनाव: भाजपा की रंजीता कोली 3 लाख से अधिक मतों से जीती थीं।
गोविंद सिंह डोटासरा
कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा का गृहनगर सीकर है। इस सीट पर पहले उनके खुद मैदान में उतरने की चर्चा थी, लेकिन कांग्रेस ने यहां माकपा से गठबंधन किया है। समझौते में उनकी राय निर्णायक रही और अमराराम को टिकट मिला।
- पिछला चुनाव: सीकर में कांग्रेस को करारी हार मिली थी। माकपा के अमराराम को सिर्फ 31 हजार वोट मिले थे।
भंवर जितेंद्र सिंह
अलवर से हर बार चुनाव लड़ते आए कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव भंवर जितेंद्र सिंह इस बार मैदान में नहीं है। उन्होंने विधायक ललित यादव की पैरवी कर टिकट दिलवाया। ऐसे में चुनाव का दबाव कहीं ना कहीं उन पर रहेगा।
- पिछला चुनाव: भंवर जितेंद्र 3 लाख से अधिक वोटों से हारे थे।