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Hindi News ›   Election ›   Lok Sabha ›   Khabron Ke Khiladi: Rae Bareli-Amethi Lok Sabha seat becomes battle of credibility for BJP and Congress

खबरों के खिलाड़ी: रायबरेली-अमेठी लोकसभा सीट की लड़ाई भाजपा और कांग्रेस के लिए कितनी साख की, कितनी नाक की?

Sat, 18 May 2024 08:14 PM IST
शिव शरण शुक्ला न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: शिव शरण शुक्ला Updated Sat, 18 May 2024 08:14 PM IST
सार

Khabron Ke Khiladi, Lok Sabha Election: रायबरेली से राहुल गांधी को चुनावी मैदान में उतारने का फैसला करने में कांग्रेस ने देर जरूर कर दी, लेकिन पार्टी ने अब सपा के साथ मिलकर प्रचार में पूरा जोर लगा दिया है। रायबरेली और अमेठी, दोनों ही लोकसभा सीटों पर 20 मई को मतदान है।

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Khabron Ke Khiladi: Rae Bareli-Amethi Lok Sabha seat becomes battle of credibility for BJP and Congress
खबरों के खिलाड़ी। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

रायबरेली और अमेठी लोकसभा सीट राजनीतिक दलों के लिए प्रतिष्ठा का प्रश्न बन गई है। अमेठी में पिछली बार भाजपा की स्मृति ईरानी ने राहुल गांधी को हराया था। वहीं, रायबरेली सीट पर पिछली बार सोनिया गांधी जीती थीं। इस बार राहुल गांधी अमेठी के बजाय रायबरेली से मैदान में हैं। कांग्रेस इस सीट को बरकरार रखने के लिए आक्रामक प्रचार कर रही है। वहीं, भाजपा का दावा है कि वह उत्तर प्रदेश में पूरी 80 सीटें जीतेगी, जिसमें रायबरेली भी शामिल है। इसके क्या मायने हैं, इसी पर इस बार 'खबरों के खिलाड़ी' में चर्चा हुई। चर्चा के लिए इस बार वरिष्ठ पत्रकार विनोद अग्निहोत्री, समीर चौगांवकर, अवधेश कुमार, पूर्णिमा त्रिपाठी और अनुराग वर्मा मौजूद रहे।

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क्या ये दोनों सीटें साख की लड़ाई है?
पूर्णिमा त्रिपाठी:
यह साख और नाक, दोनों की लड़ाई है। कांग्रेस उत्तर प्रदेश से गायब हो चुकी है, इसलिए रायबरेली सीट साख का सवाल है। अमेठी की सीट राहुल हार गए थे। अब गांधी परिवार के विश्वस्त किशोरी लाल शर्मा मैदान में हैं। प्रियंका दोनों सीटों के लिए जमकर प्रचार कर रही हैं। अब ये दोनों सीटें भाजपा के लिए नाक का सवाल बन गई हैं क्योंकि उसके नेता कई बार कह चुके हैं कि इस बार उत्तर प्रदेश में हम 80 की 80 सीटें जीतने वाले हैं। इसलिए यह भाजपा के लिए नाक की और कांग्रेस के लिए साख की लड़ाई है। अमित शाह किस हिसाब से यूपी में क्लीन स्विप की बात कर रहे हैं, यह बड़ा सवाल है।
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क्या भाजपा के लिए भी यह नाक और साख की लड़ाई है? 
अवधेश कुमार:
अगर ऐसा है कि राहुल गांधी रायबरेली से जीत जाते हैं तो भाजपा की नाक कट जाएगी या वे हार जाएंगे तो भाजपा की नाक ऊंची हो जाएगी तो मैं कुछ नहीं कहूंगा। किसी भी पार्टी की नाक इतनी छोटी नहीं होती। 2004 में सपा को 35 सीटें उत्तर प्रदेश में मिली थीं। तब खंडित जनादेश आया करते थे। अब सपा 79 सीटें जीतने का दावा कर रही है। अगर अमित शाह 80 सीटें जीतने की बात कर रहे हैं तो वह भी दावा है। राजनीतिक दल तो चुनाव में दावा करते ही हैं, इसमें नाक या साख की बात नहीं आनी चाहिए। अगर रायबरेली सीट कांग्रेस के लिए इतनी ही सुरक्षित थी तो प्रियंका गांधी, राहुल गांधी, सोनिया गांधी, अखिलेश यादव, सभी वहां क्यों आक्रामक प्रचार कर रहे हैं? अदिति सिंह क्या कर रही हैं, यह भी बड़ा सवाल है। मूल बात यह है कि राहुल गांधी उत्तर प्रदेश से चुनाव लड़ने के अनिच्छुक थे। अंत में उन्हें रायबरेली से उतारा गया, नहीं तो यह माना जाता कि कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश से परित्याग कर दिया। 
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क्या भाजपा रायबरेली की दौड़ में कहीं नजर आ रही है?
समीर चौगांवकर:
कभी माना जाता था कि अमेठी-रायबरेली की सीट पर गांधी परिवार या उनका कोई विश्वासपात्र ही जीतेगा। भाजपा ने इसे चुनौती दी और 2014 में ही स्मृति ईरानी को वहां भेज दिया। 2017 में जब भाजपा विधानसभा चुनाव जीत गई तो उसने अमेठी पर पूरा जोर लगा दिया और 2019 में यह सीट जीत ली। राहुल गांधी ने अमेठी को नजरअंदाज कर दिया। इसी का फायदा स्मृति ईरानी को मिला। अब रायबरेली सीट से सोनिया गांधी की जगह राहुल गांधी लड़ रहे हैं। रायबरेली में कांग्रेस का अभी कोई विधायक नहीं है। भाजपा यह उम्मीद कर रही है कि रायबरेली में भी वह राहुल को हरा सकती है। भाजपा उम्मीदवार दिनेश सिंह को शायद वहां स्थानीय समर्थन उतना नहीं मिल पा रहा, जितना मिलना चाहिए था। इसी वजह से भाजपा को वहां कुछ नुकसान उठाना पड़ सकता है। रायबरेली का चुनाव इस वजह से रोचक हो गया है।

क्या रायबरेली सीट गांधी परिवार के लिए उत्तर प्रदेश से जुड़े रहने की आखिरी कड़ी है?
अनुराग वर्मा:
2024 का चुनाव नेहरू-गांधी परिवार के दबदबे का आखिरी चुनाव माना जा सकता है। मुझे नहीं लगता कि 2029 में हम नेहरू-गांधी परिवार के बारे में इस तरह से चर्चा करने की स्थिति में होंगे। जब जनता को लगता है कि कोई नेता या दल सत्ता तक नहीं पहुंच सकता तो जनता उन्हें नकार भी सकती है। 2014 में नरेंद्र मोदी राष्ट्रीय राजनीति में आए, तो उन्होंने गांधी परिवार को चुनावी राजनीति में पीछे करने के मकसद से ही रणनीति बनाई। कांग्रेस अब समझ रही है कि वोट शेयर अगर इधर-उधर हुआ तो उसे और नुकसान उठाना पड़ेगा। कांग्रेस कहती है कि रायबरेली-अमेठी से गांधी परिवार का पुराना रिश्ता रहा है, लेकिन सवाल यह है कि यह रिश्ता विधानसभा चुनाव में कहां चला जाता है? अगर सोनिया गांधी को अपना उत्तराधिकारी चुनना था तो यह एक साल पहले ही कर लेना चाहिए था। नामांकन के आखिरी दिन रायबरेली से राहुल गांधी के नाम का एलान हुआ। 

क्या रायबरेली में कांग्रेस को कोई खतरा लग रहा था?
विनोद अग्निहोत्री:
राजनीति संभावनाओं का खेल है। किसी को खारिज नहीं करना चाहिए। जब भाजपा को पहली बार दो लोकसभा सीटें मिलीं तो उसे सभी ने खारिज कर दिया। बाद में अटलजी प्रधानमंत्री बने। 2009 में जब कांग्रेस ने लगातार दूसरी बार सत्ता में वापसी की, तो पार्टी भाजपा और नरेंद्र मोदी को खारिज करती रही। 2014 में हालात बदल गए। जब लालू यादव जेल गए तो राजद का मर्सिया पढ़ दिया गया था, लेकिन वे बिहार की राजनीति में मजबूती से बने रहे।


वहीं, जब राहुल गांधी कांग्रेस अध्यक्ष थे, तब कांग्रेस ने तीन विधानसभा चुनाव जीते थे- मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़। 2017 में गुजरात में विधानसभा चुनाव हुए, तब प्रधानमंत्री मोदी ने खुद वहां प्रचार पर जोर लगाया। उधर, लोकसभा चुनाव में हार के बाद राहुल गांधी ने अध्यक्ष पद से इस्तीफा दिया। वे लगातार विफलताएं झेल रहे हैं, संघर्ष कर रहे हैं। जब 2004 में राहुल गांधी पहली बार चुनाव लड़े, तब वे परिवार का हिस्सा थे। अब 20 साल बाद वे पूरी तरह अपनी क्षमता के आधार पर लड़ रहे हैं। कोई भी दल किसी भी तरह की चूक नहीं करना चाहेगा। इसीलिए भाजपा मनोज पांडे को सपा से अपने खेमे में ले आई। भाजपा की तरह कांग्रेस भी जीत के लिए प्रयास कर रही है। अगर कांग्रेस ने राहुल गांधी को दांव पर लगाया तो वह वहां पर पूरी कोशिश कर रही है, इसमें क्या गलत है? रायबरेली और अमेठी, दोनों ही चुनाव बहुत दिलचस्प हैं। राहुल गांधी में रायबरेली और अमेठी में स्मृति ईरानी मजबूत स्थिति में हैं। अमेठी में कांग्रेस के किशोरी लाल शर्मा भी कमजोर उम्मीदवार नहीं हैं।

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