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कानों देखी: अपनों से ही ठगे गए भाजपा के अरुण गोविल, बिना पाला बदले 'विभीषणों' ने दिया बड़ा झटका!

Sun, 05 May 2024 06:51 PM IST
Shashidhar Pathak शशिधर पाठक
Updated Sun, 05 May 2024 06:51 PM IST
सार

मतदान खत्म हुआ नहीं कि अरुण गोविल बोरिया बिस्तर समेट मुंबई चले गए। वहां जाकर ट्वीट भी किया कि उन्हें दु:ख है, ऐसे अपनों को पहचान नहीं पाए। बात आलाकमान तक पहुंची, तो लोगों ने मनाया। 

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प्रियंका गांधी - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

राम मंदिर के प्राण प्रतिष्ठा समारोह से धारावाहिक रामायण में राम बने अरुण गोविल की राजनीतिक यात्रा की शुरुआत हुई। मेरठ की सीट पर राजेंद्र अग्रवाल, अमित अग्रवाल, सुधीर अग्रवाल और तमाम तरह की धींगा-मुश्ती से बचते हुए भाजपा ने मेरठ में अरुण गोविल को प्रत्याशी बना दिया। अरुण गोविल ने भी इसमें कोई कसर नहीं छोड़ी। मतदान से पहले दीपा चिखालिया (सीता), सुनील लहरी (लक्ष्मण) आ गए। अरुण गोविल को बड़ा झटका तब लगा, जब उन्हें अपनी ही सेना में तमाम 'विभीषण' दिखाई दिए। ये रावण के 'विभीषण' से स्मार्ट थे। इन्होंने पाला नहीं बदला। पाले में रहकर अरुण गोविल को भीतर तक हिलाकर रख दिया। अरुण गोविल को यही समझ आया कि चुनाव की लंका से जान बचे तो लाखों पाए। मतदान खत्म हुआ नहीं कि बोरिया बिस्तर समेट मुंबई चले गए। वहां जाकर ट्वीट भी किया कि उन्हें दु:ख है, ऐसे अपनों को पहचान नहीं पाए। बात आलाकमान तक पहुंची, तो लोगों ने मनाया। फिर अरुण गोविल को यह ट्वीट भी हटाना पड़ा। अब चार जून का इंतजार है। 
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राहुल और प्रियंका की जिद में कैसे बुरे फंसे खरगे?
प्रियंका गांधी राज्यसभा चुनाव के जरिए संसद पहुंचना चाहती थीं। शुरुआती रोडमैप इसी तरह का था। तीन विकल्प थे। तेलंगाना, हिमाचल, राजस्थान। तेलंगाना में सीएम रेवंत रेड्डी से मिली थीं, राजस्थान में अशोक गहलोत का सुझाव था। हिमाचल में राजीव शुक्ला, विक्रमादित्य और प्रतिभा सिंह को एतराज नहीं था। कोर मंडली बैठी, इसमें राहुल गांधी भी थे। वहीं सोनिया गांधी राजस्थान से राज्यसभा में आ गईं। जिस दिन चुनी गईं, उसी दिन राहुल गांधी की भारत जोड़ो न्याय यात्रा ने रायबरेली में प्रवेश किया। सोनिया गांधी ने रायबरेली की जनता को चिट्ठी भी लिख दी। जिस दिन सोनिया ने नामांकन किया, उसी दिन प्रियंका के तीन प्रमुख (इसमें एक संदीप सिंह और एक अल्पसंख्यक नेता शामिल हैं) उनके पास पहुंचे।रायबरेली में चुनाव प्रचार तेज करने की अनुमति मांगी। प्रियंका ने रुकने को कहा।
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राहुल ने कहा कि वह वायनाड से ही लड़ेंगे। केरल की जनता ने 2019 में साथ दिया था। छोड़ कैसे दें? प्रियंका ने बाद में मन बना लिया कि लोकसभा चुनाव नहीं लड़ना। राहुल वायनाड पर अड़े रहे। राहुल की सोच मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव का नतीजा आने के बाद से मजबूत होती गई। प्रियंका ने भी रायबरेली से चुनाव न लड़ने का मन बना लिया। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के सामने यह अग्निपरीक्षा थी। तमाम कोशिश के बावजूद दोनों सीटों के प्रत्याशी तय नहीं हो पा रहे थे। प्रियंका अमेठी में महिला बनाम महिला के लिए तैयार न थीं। तमाम सवाल के साथ हां और ना के बीच में थे। अखिलेश यादव चाहते थे कि अमेठी, रायबरेली में गांधी परिवार का कोई जरूर आए। अंत में खरगे को सोनिया की मदद लेनी पड़ी। सोनिया के प्रयास के बाद देर रात की बैठक में राहुल पंरपरा बचाने के नाम पर माने। सबने राहत की सांस ली। 
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बिहार में सिर खुजला रही है भाजपा और मुस्करा रहे ललन सिंह
जद(यू) के पूर्व अध्यक्ष राजीव रंजन उर्फ ललन सिंह 70 के दशक में छात्र राजनीति से लेकर अब तक सक्रिय हैं। मुस्करा रहे हैं। ललन सिंह को पता है कि बिहार में लोकसभा चुनाव के बाद क्या होने वाला है? नीतीश कुमार भी खासे परेशान हैं। लोकसभा चुनाव 2024 में जद(यू) को उम्मीद थी कि 2019 जैसे नतीजे दोहराएगी। इसी उम्मीद से भाजपा भी नीतीश कुमार को साथ लेकर आई थी। लेकिन जब केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने बिहार के नेताओं का फीडबैक लिया, तो एनडीए के खाते में 25 की संख्या के ऊपर नेता बमुश्किल चढ़ पा रहे हैं। भाजपा की मुश्किल यह भी है कि वह सिर्फ 17 सीटों पर ही लड़ रही है। तेजस्वी यादव की राजद के बारे में भाजपा नेताओं की राय कहीं ज्यादा अच्छी जा रही है। शाह ने जब जमीनी दुश्वारियों की जानकारी ली, तो पता चला कि जद(यू) अपनी राह पर है और भाजपा के नेता अपनी। दोनों अपनी-अपनी लाइन बड़ी करने में लगे हैं। एक दूसरे की लाइन बड़ी करने से मतलब ही नहीं है। आप समझ रहे होंगे कि ललन सिंह क्यों मुस्करा रहे हैं। क्योंकि बिहार विधानसभा चुनाव में भाजपा का दांव देखकर ही तो उन्होंने जद(यू) को महागठबंधन में लौटने की सलाह दी थी। जहां भाजपा अपने सहयोगी दलों को ही छोटा कर रही थी। तभी तो जद(यू) तीसरे नंबर की पार्टी बनी थी। 2024 के बाद भी यही स्थिति होने वाली है। निष्कर्ष तो यही है कि सब ठीक है। बस भाजपा और जद(यू) में सब ठीक नहीं है।

कर्नाटक में डीके शिवकुमार का मतलब कांग्रेस के संकट मोचक
डीके शिवकुमार कर्नाटक के दमदार नेता हैं। उपमुख्यमंत्री, कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पार्टी के पूर्ण चाणक्य स्वर्गीय अहमद पटेल द्वारा आगे बढ़ाए गए हैं। डीके ने एक बार फिर अपनी होशियारी, सतर्कता और लड़ाका की बनी छवि के सहारे राज्य में भाजपा को घुटनों पर ला दिया। पूर्व प्रधानमंत्री के बेटे प्रज्ज्वल रवन्ना के कारनामों की पोल खोलने, उनके पिता को एसटीएफ की हिरासत में लिए जाने में शिवकुमार ने बड़ी भूमिका निभाई। बताते हैं कि अपने विश्वस्त विधायक से जब डीके शिवकुमार को इसके बारे में पता चला, तो बिना समय गंवाए उन्होंने निर्णय ले लिया। पहले सारे प्रमाण कब्जे में लिए। फिर विश्वस्त अधिकारी से चर्चा की। इसके बाद सूत्र और पीड़ित की फुलप्रूफ सुरक्षा का प्लान बनाया। दिल्ली में कांग्रेस के दो वरिष्ठ नेताओं को विश्वास में लिया और अगले दिन सुनियोजित तरीके से सब बाहर आना शुरू हो गया। सबसे मजे कि बात है, इतना होने के पहले तक भाजपा के शीर्ष रणनीतिकारों को भनक तक नहीं लगी। भाजपा के ही एक बड़े नेता ने बताया कि प्रज्ज्वल रेवन्ना प्रकरण के खुलासे से बड़ा झटका लग रहा है। भाजपा भी इसे लेकर परेशान है। इधर कांग्रेस को डीके शिवकुमार से 2024 के लोकसभा चुनाव के बाबत भी बड़ा भरोसा मिल रहा है। माना जा रहा है कि चुनाव बाद डीके को इसका पुरस्कार भी मिल सकता है।  


आम आदमी पार्टी के संवाद के तरीके का जवाब नहीं
आम आदमी पार्टी के संवाद के तरीके का कोई जवाब नहीं है। जो चाहती है, जनता के बीच में उस चर्चा को स्थापित कर देती हैं। यह हम नहीं भाजपा के एक बड़े नेता ने दिल्ली के नेताओं को नसीहत देते हुए कही। सभी सन्न, सुन रहे थे। नेताजी ने आगे कहा कि दुर्भाग्य की बात है कि आप लोग (भाजपा के नेता) सत्ता पक्ष से कुछ सीखते नहीं। दरअसल नेताजी दिल्ली का फीडबैक ले रहे थे। उन्हें पता चला कि भाजपा को कांग्रेस के उम्मीदवारों से खतरा कम है। आम आदमी पार्टी के उम्मीदवारों से अधिक और कदाचित अरविंद केजरीवाल जेल से छूटकर आ गए, तो दिल्ली समेत अन्य राज्यों में भी नुकसान संभव है। क्योंकि दिल्ली में आम आदमी पार्टी यह संदेश देने में सफल रही है कि ईडी ने मुख्यमंत्री को जबरदस्ती और बिना सबूत के गिरफ्तार किया है। इसके बाद बारी नेताजी की थी। उन्होंने नसीहत दी कि कांग्रेस वाले तो कसम खा रखे हैं कि उन्हें आम आदमी पार्टी से कुछ नहीं सीखना है। आप लोगों ने भी कुछ नहीं किया। दिल्ली में हमारे इतने कार्यकर्ता, नेता हैं। इसके बाद भी जनता में इस मामले को ठीक से नहीं रख सके।
 
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