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Ground Report Kanker : कसौटी पर वर्ग संघर्ष बनाम धर्म संघर्ष, इसलिए सुर्खियों में हैं भाजपा के भोजराज

Sun, 14 Apr 2024 06:49 AM IST
दुष्यंत शर्मा मनोज मिश्र, कांकेर
मनोज मिश्र, कांकेर Published by: दुष्यंत शर्मा Updated Sun, 14 Apr 2024 06:49 AM IST
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सार
बस्तर संभाग का ही एक हिस्सा होने के कारण कांकेर के कुछ हलकों में नक्सलियों का प्रभाव है, तो हर किलोमीटर-दो किलोमीटर पर मौजूद छोटे-बड़े मंदिर और उन पर फहराती भगवा ध्वजाएं धार्मिक शक्तियों की सघन उपस्थिति का उद्घोष करती प्रतीत होती हैं।
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Ground Report Kanker: Class struggle vs religious struggle on the test
भोजराज नाग और बीरेश ठाकुर - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

कहीं मीलों लंबी सपाट सड़कें, तो कहीं तीखी ऊंचाइयों वाली पहाड़ियां... भौगोलिक स्थिति की तरह ही छत्तीसगढ़ की कांकेर लोकसभा क्षेत्र की सामाजिक-राजनीतिक स्थिति भी खासी विविधतापूर्ण है। बस्तर संभाग का ही एक हिस्सा होने के कारण क्षेत्र के कुछ हलकों में नक्सलियों का प्रभाव है, तो हर किलोमीटर-दो किलोमीटर पर मौजूद छोटे-बड़े मंदिर और उन पर फहराती भगवा ध्वजाएं धार्मिक शक्तियों की सघन उपस्थिति का उद्घोष करती प्रतीत होती हैं।



नक्सलियों की सक्रियता का हाल यह है कि अभी अप्रैल के दूसरे सप्ताह में ही तीन बड़े कमांडरों ने आत्मसमर्पण किया है। इनमें एक पर बाकायदा एक लाख रुपये का इनाम था। लेकिन, इलाके के लोगों से पूछिए तो उन्हें यह सामान्य बात लगती है। अरे काहे के नक्सली? हम धनु पद्दा को जानते हैं। बस 20-22 साल का लड़का है। रेसुराम नुरुटी के चक्कर में पुलिस ने उसे भी फांस लिया। बाकी तुब्बा कोरोटी भी बस नाम का नक्सली है। चला गया होगा आत्मसमर्पण के एवज में मिलने वाले 25 हजार रुपये की लालच में! यह कहते हुए कोंडा गांव के केशकाल कस्बे में छोटी सी दुकान चलाने वाले भूरेलाल राठिया के चेहरे पर चिंता की कोई लकीर नहीं उभरती। ऐसा लगता है जैसे वह मामूली बदमाशों की बात कर रहे हों। इसी के बरक्स जीतेगा कौन के सवाल पर वह झट बोल पड़ते हैं-और कौन? भोजराज।


कांकेर जिला मुख्यालय पर वाटर पंप की दुकान चलाने वाले पूनम चोपड़ा कहते हैं, देखिए अभी तो माहौल ठंडा पड़ा है, लेकिन वोटिंग का दिन नजदीक आते-आते आपको माहौल बदलता दिखाई देने लगेगा। मैं मारवाड़ी हूं। मारवाड़ियों में उठना-बैठना है। मुझे तो भोजराज के अलावा किसी दूसरे की बात करता कोई मिलता नहीं। कांकेर से करीब 100 किमी दूर कोंडा गांव के रमेश उपाध्याय की राय भी इससे जुदा नहीं है। स्थानीय पत्रकार तनुज ठाकुर एक दिलचस्प बात जोड़ते हैं, बीरेश का मुस्लिम बिरादरी के लोगों में भी उठना-बैठना है। इस वजह से तमाम कांग्रेसी भी भीतर ही भीतर उनसे नाराज रहते हैं। ऐसे लोग बीरेश के लिए मेहनत करने से रहे। इसके अलावा बीरेश के पास लोकसभा चुनाव लड़ने के लिए पर्याप्त फंड ही नहीं है। वह जैसे-तैसे प्रचार अभियान चला रहे हैं।

प्रचार में बढ़त पर दिख रही भाजपा
भाजपा ने भोजराज नाग को टिकट दिया है, तो कांग्रेस ने 2019 के चुनाव में छह हजार मतों से पराजित होने वाले बीरेश ठाकुर पर दांव खेला है। झंडे बैनर से लेकर प्रचार के दूसरे संसाधनों तक में भोजराज एकतरफा तौर पर बढ़त बनाए दिखाई देते हैं। उन लोगों के लिए जो बीरेश ठाकुर को नहीं पहचानते हैं, किसी दीवार, किसी चौराहे पर कहीं एक फोटो तक नसीब नहीं होता।

दोनों की ही छवि सहज उपलब्ध और मददगार जननेता की है, लेकिन घर वापसी और धर्मांतरण जैसे मुद्दों को लगातार उठाने के कारण भोजराज सुर्खियों में हैं। लोगों के बीच उनकी पहचान भी गहरी है। इसी वजह से वह संघ और दूसरे हिंदू संगठनों के दुलारे हैं। भाजपा ने मौजूदा सांसद मोहन मंडवी के बजाय भोजराज पर दांव सोच-समझकर खेला है। बीरेश की तरह भोजराज भी आदिवासी समुदाय से आते हैं, इसलिए कांग्रेस को इस समुदाय में बढ़त मिलने की उम्मीद भी कम ही नजर आ रही।

26 साल से भाजपा का गढ़
अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित सीट को वजूद 1967 में मिला। इसे भाजपा का गढ़ माना जाता है। 1998 से यह सीट भाजपा के पास है। 1998 से 2009 तक सोहन पोटाई लगातार सांसद रहे। 2014 में भाजपा के विक्रम उसेंडी ने यहां से शानदार जीत दर्ज की। वहीं, 2019 में कांकेर से मोहन मंडावी सांसद बने।

अनोखी परंपरा...लड़कों के लड़कियों जैसे नाम
जगदलपुर की तरह कांकेर भी जनजाति बहुल इलाका है और कई मायनों में भिन्न परंपराओं वाला। पुरुषों के महिलाओं जैसे नाम इलाके में अक्सर मिल जाते हैं। पूनम चोपड़ा पकी उम्र के व्यापारी हैं, तो गुड्डी उसेंडी बीए के छात्र। इन अटपटे नामों की कोई खास वजह...पूछने पर पूनम हलके से मुस्कुरा देते हैं। कहते हैं-मुझे तो पता नहीं। वैसे लड़कों के लड़कियों जैसे नाम यहां सामान्य बात है। कोई इन पर अचरज नहीं करता।

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