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Ground Report: हाजीपुर में विरासत और प्रतिष्ठा बचाने की चुनौती, चिराग पासवान और शिवचंद्र राम में मुकाबला

Sat, 18 May 2024 05:27 AM IST
bhupendra Kumar bhupendra Kumar
Updated Sat, 18 May 2024 05:27 AM IST
सार

Ground Report: 1977 से पहले हाजीपुर सीट की चर्चा तक नहीं होती थी, मगर इसी साल कांग्रेस विरोधी लहर पर सवार पासवान ने अपने प्रतिद्वंद्वी कांग्रेस के बालेश्वर राम को सवा चार लाख वोट से हराया था। यह जीत गिनीज बुक आफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में दर्ज हुई और चर्चा का विषय बन गई।

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Ground Report: Challenge to save heritage and reputation in Hajipur, Chirag Paswan vs Shivchandra Ram
चिराग पासवान और शिवचंद्र राम - फोटो : एएनआई

विस्तार

गूंजे धरती-आसमान, राम विलास पासवान...यह बरसों तक लगा सिर्फ पुराना चुनावी नारा नहीं है। इससे पता चलता है कि वो कद्दावर नेता राम विलास पासवान ही थे, जिन्होंने नामालूम सी लोकसभा सीट हाजीपुर को इतनी ख्याति दी। बीते चार दशक तक यहां की राजनीति उनके इर्द-गिर्द ही घूमती रही। वे आठ बार यहां से जीते। यही नहीं, सर्वाधिक मतों से जीतने का रिकाॅर्ड भी बनाया।

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1977 से पहले हाजीपुर सीट की चर्चा तक नहीं होती थी, मगर इसी साल कांग्रेस विरोधी लहर पर सवार पासवान ने अपने प्रतिद्वंद्वी कांग्रेस के बालेश्वर राम को सवा चार लाख वोट से हराया था। यह जीत गिनीज बुक आफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में दर्ज हुई और चर्चा का विषय बन गई। फिर 1989 में अपना ही रिकॉर्ड तोड़ते हुए पासवान ने पांच लाख वोटों से जीत दर्ज की।
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इस बार मुकाबला पासवान के बेटे व लोजपा अध्यक्ष चिराग पासवान और राजद के शिवचंद्र राम में है। पिछली बार उनके चाचा पशुपतिनाथ पारस जीते थे। वे यहां से लड़ना चाहते थे, इस पर काफी विवाद भी हुआ। पशुपति ने एनडीए छोड़ा, फिर मान भी गए। चिराग ने एनडीए से लोजपा के लिए इस सीट को खासतौर पर मांगा। उन्हें बिहार में पांच सीटें मिलीं। चिराग ने साफ कर दिया था कि वे पिता की सीट से ही लड़ना चाहते हैं। चिराग को जातिगत वोट, पीएम मोदी का नाम, भाजपा और जदयू के कैडर वोटों का आसरा है। वहीं, राजद के शिवचंद्र को सामाजिक समीकरणों का सहारा है। वे हाजीपुर से कई बार लड़ चुके हैं। स्थानीय हैं। दो बार राजद से विधायक और मंत्री रहे हैं।
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हाजीपुर और पासवान
जनता ने पासवान पर प्यार लुटाया, तो उन्होंने भी शहर को कई बड़ी सौगातें दीं। यहां पूर्व मध्य रेलवे का जोनल ऑफिस, सीपेट और नाइपर जैसे संस्थान लाए। गंगा और गंडक नदी के बीच बसे इस इलाके को शुरू से ही समाजवादियों के प्रभाव वाला माना गया है। लोग उन्हें यहां हुए विकास के लिए याद भी करते हैं। हालांकि हाजीपुर में गंगा का पुल अब भी जाम का सबब है। मुजफ्फरपुर जाना आसान नहीं है, लेकिन स्थानीय लोग पासवान का अहसान मानते हैं कि उन्होंने लोगों को रोजगार दिया। पटना जाने वाले राजमार्ग पर मौजूद होटल में सुरक्षा कर्मचारी अरविंद कहते हैं चिराग के पिता ने इस इलाके के लिए जो किया, वो बेमिसाल है। कई रेलवे संस्थानों को यहां लाए। 

पासवान की लंबी पारी
अन्य सीटों की तरह हाजीपुर भी कभी कांग्रेस और समाजवादियों का गढ़ था। यहां से 1957 और 62 में कांग्रेस के राजेश्वर पटेल जीते। 67 में कांग्रेस के वाल्मीकि चौधरी, 71 में दिग्विजय सिंह जीते। इसके बाद माहौल बदला और 77 और 80 में पासवान जनता पार्टी के टिकट पर जीते। 

84 में कांग्रेस लहर में रामरतन जीते, तो 89 के चुनाव में पासवान फिर जीते। 91 में जनता दल से राम सुंदर दास जीते। इसके बाद लगातार चार बार 96,98, 99 और 2004 में अलग-अलग दलों से पासवान जीते। 2009 में जद-यू के राम सुंदर दास जीते तो 2014 में पासवान लोजपा से जीते। 2019 में उनके भाई पशुपति यहां से जीते।


जातीय समीकरण: इस लोकसभा सीट में कुल छह विधानसभा सीटे हैं। यहां करीब 19.53 लाख वोटर हैं। पासवान और राजपूत मतदाता तीन-तीन लाख हैं। वहीं, दो लाख वोटर मुस्लिम और ढाई लाख महादलित हैं।

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