Flashback: मुहर न ठप्पा, जीत गए कक्का, मतपेटी पर होता था प्रत्याशी का नाम और चुनाव चिह्न
भारत में हुए पहले दो आम चुनावों के दौरान मतदान कराने का तरीका बिल्कुल अनोखा था। चुनाव मतपत्रों से कराए गए थे, लेकिन आपको जानकार हैरानी होगी कि इन चुनावों में मुहर-ठप्पा लगाने की जरूरत नहीं पड़ी और सांसद-विधायक चुन लिए गए। खास बात यह है कि किसी भी राजनीतिक दल को मतदान के इस असामान्य तरीके पर एतराज भी नहीं था।
शुरुआती दो आम चुनावों में मतपत्रों पर उम्मीदवारों के नाम और चुनाव चिह्न के सामने मुहर लगाने की मानक प्रणाली शुरू नहीं हुई थी। तब मतदान कराने का तरीका यह था कि हर चुनाव केंद्र पर उम्मीदवारों की संख्या के हिसाब से मतपेटियां एक पंक्ति में सजाकर रख दी जाती थीं। इसमें हर उम्मीदवार को समर्पित एक मतपेटी होती थी, जिस पर उम्मीदवार का नाम और उसका चुनाव चिह्न चस्पा होता था। बूथ पर पहुंचा मतदाता मतपत्र लेने के बाद उसे अपनी के पसंद के उम्मीदवार की मतपेटी में डाल देता था। चूंकि मतपत्र पर मुहर लगाने का कोई प्रावधान नहीं था, इसलिए इसका कोई निशान नहीं रह जाता था कि किसी का वोट कहां गया है।
बदलाव हुआ तो विरोध भी शुरू
चुनाव आयोग के अनुसार देश में उस समय के सभी प्रमुख राजनीतिक दल चुनाव की इस अनोखी पद्धति को लेकर सहज थे। उन्होंने इसमें किसी भी बदलाव का विरोध किया। हालांकि, दूसरे आम चुनाव के बाद हुए उपचुनावों में चुनाव आयोग ने उम्मीदवारों के नाम और सिंबल के सामने मतपत्र पर मुहर लगाने की मानक प्रणाली शुरू कर दी, जो अगले 45 वर्षों तक चली। इसके बाद इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) से चुनाव का दौर शुरू हुआ जो अब तक जारी है।