Araria Ground Report: भाजपा के सामने एम-वाई समीकरण से पार पाने की चुनौती, यहां राजद से बराबर की है टक्कर
शुरुआत में अररिया सीट कांग्रेस का गढ़ रही। कांग्रेस के तुलमोहन राव 1967 व 71 में पहली बार यहां से सांसद बने। 1977 में कांग्रेस विरोधी लहर में यह सीट भारतीय लोकदल के महेंद्र नारायण ने जीती। 1980 और 84 में फिर कांग्रेस जीती, लेकिन इसके बाद कभी इस सीट को नहीं जीत पाई।
विस्तार
नेपाल की तराई से लगे बिहार के इस इलाके से गुजरना हिंदी के यशस्वी रचनाकार फणीश्वर नाथ रेणु की कृति परती परीकथा या मैला आंचल के पन्ने पलटने जैसा लगता है। रेणु के उपन्यास हों या कहानियां, फारबिसगंज के आसपास का इलाका उसमें बतौर पात्र बड़ी खामोशी से पृष्ठभूमि में रहता था। 1972 में रेणु अररिया जिले की फारबिसगंज सीट से विधानसभा चुनाव लड़े और हार गए। चुनाव क्यों लड़ा, इस पर उनका जवाब था, देखना चाहता हूं, जूता कहां काटता है। अब यह 2024 का अररिया है। चुनावी समीकरण ने ही इसे बिहार की चर्चित सीटों में शुमार कर दिया है। 2014 में मोदी लहर के दौरान भी यह सीट राजद के खाते में गई थी। वजह बहुत साफ है, इस सीट पर 42 फीसदी मुस्लिम और 15 फीसदी यादव हैं, ऐसे में मिलकर यह 57 फीसदी हो जाते हैं। जिसने यह समीकरण साध लिया, अररिया सीट उसी की। यहां हिंदू वोटर 56 फीसदी हैं। तीसरे चरण में 7 मई को होने वाले मतदान के प्रमुख योद्धा हैं भाजपा के प्रदीप कुमार सिंह और राजद के शाहनवाज आलम।भाजपा के लिए पीएम मोदी यहां रैली कर चुके हैं। शाहनवाज राजद के कद्दावर नेता दिवंगत तस्लीमुद्दीन के छोटे बेटे हैं। मुख्य मुकाबला इन दोनों के बीच ही है।
अररिया सीट से छह विधानसभा क्षेत्र जुड़े हैं और कुल मतदाता 19 लाख के करीब हैं। फारबिसगंज में मिठाई की दुकान चलाने वाले मुकेश सहनी कहते हैं, भाजपा ने अच्छा काम किया है। व्यापारी वर्ग भाजपा के साथ है। मुकेश को मालूम है कि विख्यात साहित्यकार रेणु यहां से लड़ चुके हैं। कहते हैं कि रेणु ने इस इलाके को देश-विदेश में पहचान दी। उनके बेटे पद्म पराग विधायक भी रहे। आज भी लोग अररिया के पास उनका पैतृक गांव औराही हिंगना देखने जाते हैं। वहीं, पास में रिक्शा चलाने वाले मंगनी मंडल कहते हैं, चुनाव में कोई जीते हमारी जिंदगी में तो कोई अंतर नहीं आता। छात्र सुकेश सहनी कहते हैं, रोजगार देने की तो कोई बात ही नहीं कर रहा है। यहां हम देखते हैं लोगों को काम के लिए कोलकाता या दिल्ली-मुंबई ही जाना पड़ता है।
भाजपा-राजद में बराबर की टक्कर
शुरुआत में अररिया सीट कांग्रेस का गढ़ रही। कांग्रेस के तुलमोहन राव 1967 व 71 में पहली बार यहां से सांसद बने। 1977 में कांग्रेस विरोधी लहर में यह सीट भारतीय लोकदल के महेंद्र नारायण ने जीती। 1980 और 84 में फिर कांग्रेस जीती, लेकिन इसके बाद कभी इस सीट को नहीं जीत पाई। 1989, 91 और 96 में जनता दल के सुकदेव पासवान यहां जीते। भाजपा के लिए रामजी दास ने पहली बार 1998 में यह सीट जीती। फिर 2004 में राजद और 2009 में भाजपा के टिकट पर जीते। 2009 तक यह सीट आरक्षित थी।
ऐसे नाम पड़ा अररिया
अररिया पहले पूर्णिया जिले का ही हिस्सा था। 1990 में इसे अलग जिले की पहचान मिली। अंग्रेजी हुकूमत में एलेक्जेंडर जान फाब्र्स (1749-1826) यहां ईस्ट इंडिया कंपनी के एजेंट थे जो नील की खेती पर नजर रखते थे। उनके बंगले को रेजीडेंशियल एरिया कहा जाता था, स्थानीय लोग अपनी सुविधा से उसे आर-एरिया कहने लगे, धीरे-धीरे यह अररिया कहलाने लगा। इन्हीं के नाम पर फारबिसगंज कस्बे का नाम भी है।
राजनीति के माहिर प्रदीप
वर्ष 2005 में पहली बार अररिया सदर सीट से विधायक बनने के साथ प्रदीप का सियासी सफर अभी तक शानदार रहा है। लोगों के बीच संपर्क अच्छा है और छवि साफ-सुथरी है। इसी के बूते 2009 में पहली बार सांसद बने। 2014 और 2018 में हार के बाद भी शानदार वापसी की और 2019 में फिर सांसद बने। दिलचस्प यह कि उन्हें तस्लीमुद्दीन का शागिर्द माना जाता है और इस बार मुकाबला उनके छोटे बेटे से है।
सीमांचल के गांधी
2009 में भाजपा के मौजूदा सांसद प्रदीप पहली बार यह सीट जीते, पर 2014 में राजद के दिग्गज नेता और सीमांचल गांधी के नाम से विख्यात अपने राजनीतिक गुरु मो. तस्लीमुद्दीन से हार गए। तस्लीमुद्दीन के निधन की वजह से 2018 में फिर चुनाव हुए, तो उनके बड़े बेटे सरफराज आलम यहां से राजद के टिकट पर जीते। पर अगले ही साल हुए आम चुनाव में भाजपा के प्रदीप फिर सांसद बन गए।