फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Election ›   Lok Sabha ›   Amar Ujala Exclusive All Political Parties deep analysis NDA INDI Alliance BJP Narendra Modi Rahul Gandhi

Election: नाम बदलने के बाद इंडी गठबंधन को जीत की आस, एनडीए का PM मोदी पर विश्वास, जानें कौन कितना मजबूत

Sun, 17 Mar 2024 06:07 AM IST
जलज मिश्रा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: जलज मिश्रा Updated Sun, 17 Mar 2024 06:07 AM IST
सार

राजग ने भी कुछ साथी खोए हैं तो कुछ पुराने साथियों की घर वापसी कराई है। विपक्षी गठबंधन इंडिया में सपा और शिवसेना यूटीबी नए चेहरे हैं तो जदएस को गंवाना पड़ा है।

विज्ञापन
Amar Ujala Exclusive All Political Parties deep analysis NDA INDI Alliance BJP Narendra Modi Rahul Gandhi
Parliament - फोटो : सोशल मीडिया

विस्तार

इस चुनाव में सत्तारूढ़ राजग के सामने कांग्रेस की अगुवाई वाले यूपीए की जगह विपक्ष का नया गठबंधन है इंडिया। कुछ ऐसे दलों का समूह भी मैदान में है, जो भाजपा और कांग्रेस से समान दूरी बनाकर चल रहे हैं। बीते चुनाव के मुकाबले इन तीनों ही समूहों में अहम बदलाव भी हुए हैं। कई दलों में टूट के कारण क्षेत्रीय दलों में नए क्षत्रपों का उदय हुआ है। राजग ने भी कुछ साथी खोए हैं तो कुछ पुराने साथियों की घर वापसी कराई है। विपक्षी गठबंधन इंडिया में सपा और शिवसेना यूटीबी नए चेहरे हैं तो जदएस को गंवाना पड़ा है। चुनाव में दोनों गठबंधनों और गैरभाजपा-गैरकांग्रेस क्षेत्रीय दलों की संभावनाओं और ताकत का विश्लेषण...
विज्ञापन

राजग: एक चेहरे पर हैट्रिक की आस

भाजपा: नरेंद्र मोदी
(303 सीटें, 37.36 फीसदी वोट)
चमत्कारी नेतृत्व। भाजपा को अपने दम पर बहुमत हासिल करने वाला पहला गैरकांग्रेसी दल बनाया। 2019 में अपने दम पर पहले से बड़ी जीत दिलाई। सत्ता की हैट्रिक लगाने के लिए पूरी जिम्मेदारी का कर रहे निर्वहन। प्रखर वक्ता, विरोधियों को घेर कर शिकार करने की अदा। पार्टी को दिया है हिंदुत्व, राष्ट्रवाद के साथ गरीबों को साधने और बूथ प्रबंधन का मंत्र। राजग के पुराने साथियों को साधने एवं कांग्रेस को और कमजोर करने की रणनीति भी इन्हीं की। अबकी बार चार सौ पार का नारा देकर चुनाव से पहले ही माहौल बनाने में सफलता हासिल की है।

विज्ञापन

जदयू : नीतीश कुमार
(16 सीटें, 21.81 फीसदी मत)
बार-बार पाला बदलने से बदनामी के बावजूद बिहार के सीएम नीतीश राज्य में सत्ता का संतुलन हैं। 2005 से अब तक, चुनावों में जब जिसके साथ गए, उसका कल्याण हुआ। जिसका साथ छोड़ा, उसकी लुटिया डूबी। ओबीसी राजनीति के बड़े चेहरे नीतीश और पार्टी की पकड़ कमजोर हो रही है, फिर भी दूसरे दलों में वोट बैंक शिफ्ट कराने की उनकी ताकत की काट किसी दल को नहीं मिल पाई है। बीते लोकसभा व विधानसभा चुनाव भाजपा संग लड़े, फिर राजद का दामन थामा, अब फिर राजग में हैं।

विज्ञापन
विज्ञापन

टीडीपी : चंद्रबाबू नायडू
(3 सीटें, 40.19 फीसदी वोट)
बीते लोकसभा चुनाव से पहले विपक्ष को एकजुट करने के लिए राजग छोड़ा। राज्य की सत्ता गंवाने व लोकसभा चुनाव में वाईएसआरसीपी से बुरी तरह पिटने के बाद राजग में वापसी की। चुनाव नायडू के लिए करो या मरो वाला है। जीत से उनके लिए विकल्प बढ़ेंगे। हार से खुद व पार्टी का अस्तित्व खतरे में पड़ जाएगा।

शिवसेना शिंदे व एनसीपी अजीत: एकनाथ व अजीत
शिवसेना और एनसीपी में टूट के बाद महाराष्ट्र में एकनाथ शिंदे और अजीत पवार के रूप में दो अहम क्षत्रपों का उदय हुआ। यह लोकसभा चुनाव दोनों के लिए लिटमस टेस्ट होगा। जीते तो उद्धव-शरद की राजनीति का पराभव होगा, हारे तो खुद के सियासत के बियाबान में खो जाने का डर रहेगा।

उत्तर प्रदेश : रालोद-जयंत चौधरी
दो चुनावों में खाली हाथ रहने के बाद जयंत ने राजग का दामन थामा है। उन पर भाजपा से मिली दो सीटों पर जीत हासिल कर अपने दादा चौधरी चरण सिंह व पिता चौधरी अजित सिंह की विरासत पर मुहर लगवाने की चुनौती है। पार्टी का पश्चिम उत्तर प्रदेश में प्रभाव है। भाजपा इस क्षेत्र में किसी प्रकार के नुकसान की आशंका को खत्म करना चाहती है। अजित सिंह के निधन के बाद पार्टी को बचाने की सारी जिम्मेदारी अब जयंत पर है।

बिहार : लोजपा के दो धड़े, चिराग और पशुपति पारस
(6 सीटें, 7.86 फीसदी मत)
रामविलास पासवान के निधन के बाद हुई बगावत से लोजपा उनके भाई पशुपति पारस और बेटे चिराग पासवान में बंट गई। राज्य के सामाजिक समीकरण साधने व दलित वोटों के ध्रुवीकरण के लिए भाजपा ने दोनों धड़ों को साध रखा है, मगर परेशानी सीट बंटवारा है। मसला हल न होने पर इनमें से एक विपक्षी महागठबंधन का दामन थाम सकता है।

अपना दल एस : अनुप्रिया
(2 सीटें, 1.21 फीसदी मत)
यूपी में भाजपा की विश्वस्त सहयोगी व सामाजिक न्याय की मुखर आवाज। मोदी सरकार के दोनों कार्यकाल में मंत्री बनीं। ओबीसी वोटों को साधे रखने के लिए भाजपा की अनुप्रिया को पूरे राज्य में घुमाने की योजना।

जदएस : कुमारस्वामी
(1 सीट, 9.67 फीसदी मत)
भाजपा लिंगायत व वोक्कालिगा के साथ अगड़ों को साध दक्षिण के अपने सबसे मजबूत किले में दरार नहीं आने देना चाहती। देखना दिलचस्प होगा कि जदएस के बहाने भाजपा पुराना प्रदर्शन दोहरा पाती है या नहीं।

विपक्षी गठबंधन : नए साथियों पर भरोसा

कांग्रेस: मल्लिकार्जुन
(52 सीटें, 19.31 फीसदी मत)
कांग्रेस की रणनीति में इस बार बदलाव दिखता है। पार्टी यूपीए की जगह इंडिया ब्लॉक का नेतृत्व कर रही है। बीते आम चुनाव के बाद कई राज्यों में हार से उपजी अंतर्कलह के कारण अरसे बाद पार्टी की कमान अब गांधी परिवार के इतर दलित चेहरे मल्लिकार्जुन खरगे के पास है। पार्टी में जान फूंकने के इरादे से राहुल गांधी भारत जोड़ो यात्रा के बहाने पूरा देश घूम चुके हैं। पार्टी की कोशिश सामाजिक न्याय की पुरानी धारा में बहकर चुनावी नैया पार लगाने की है। घोषणापत्र पहले ही सार्वजनिक कर दिया।

द्रमुक : एमके स्टालिन
(24 सीटें, 33.52 फीसदी वोट)
तमिलनाडु का ताकतवर सियासी चेहरा, जिसने पार्टी में अपने पिता करुणानिधि की विरासत को सहेजने में सफलता हासिल की। द्रविड़ राजनीति में गहरी पकड़। अपने दम पर यूपीए को दिलाई थी 39 में से 38 सीटें। जयललिता के दिवंगत होने के बाद अन्नाद्रमुक बेहाल स्थिति में। भाजपा-अन्नाद्रमुक में समझौता नहीं होने से फिर से दमदार प्रदर्शन करने की संभावना जताई जा रही है।

एनसीपी शरद गुट: शरद  
(4 सीटें, 15.66 फीसदी मत)
शिवसेना को भाजपा से अलग कर महाविकास अघाड़ी सरकार के सूत्रधार बने। पार्टी में वर्चस्व की जंग में भतीजे अजीत पवार के समक्ष बेबस साबित हुए। फिलहाल भतीजे से जंग जीतने के साथ खुद की प्रासंगिकता बचाए रखने की चुनौती।

शिवसेना यूबीटी : उद्धव
(18 सीटें, 23.50 फीसदी मत)
विपक्षी इंडिया ब्लॉक में नया चेहरा। बीते चुनाव में राजग में रहते यूपीए को खोई जमीन नहीं पाने दी। बाद में भाजपा से अलग। एनसीपी-कांग्रेस के साथ सरकार गठन कर सीएम बने। अब इंडिया ब्लॉक में रहते हुए पुराना प्रदर्शन दोहराने की चुनौती।

समाजवादी पार्टी: अखिलेश यादव
(5 सीटें, 18.11 फीसदी वोट)
दिग्गज मुलायम सिंह के निधन के बाद देश के सबसे अहम सूबे उत्तर प्रदेश में इंडिया ब्लॉक की सबसे मजबूत उम्मीद। अखिलेश राज्य के सीएम रहे। बीते विधानसभा चुनाव में पार्टी का ग्राफ बढ़ाने में सफलता हासिल की। बीते लोकसभा चुनाव में बसपा की जगह इस बार कांग्रेस से गठबंधन। अपेक्षाकृत कमजोर गठबंधन, सुभासपा और रालोद के साथ छोड़ने से अपने दम पर चमत्कार करने की चुनौती।

आप : अरविंद केजरीवाल
(1 सीट, दिल्ली में 18% पंजाब में 7.38% वोट)
इंडिया ब्लॉक का नया चेहरा। पंजाब व गुजरात में पार्टी विस्तार कर चौंकाया। दिल्ली में भाजपा के खिलाफ पहली बार कांग्रेस से गठबंधन किया। देखना है कि पार्टी विधानसभा की तरह इस बार भी पंजाब में धमाका करेगी या नहीं।

राजद : तेजस्वी यादव
बीते चुनाव में लालू यादव यूपीए का प्रमुख चेहरा थे। इस बार बेटे तेजस्वी यादव के पास जिम्मेदारी। राज्य की मुस्लिम-यादव बिरादरी में लोकप्रिय। नीतीश की पलटी के बाद बनी सरकार में डिप्टी सीएम बनने से कद बढ़ा। लालू के अस्वस्थ रहने से बिहार में इंडिया ब्लॉक के प्रदर्शन का दारोमदार इन्हीं के कंधे पर।

झामुमो : हेमंत सोरेन
(2 सीटें, 34.58 फीसदी वोट)
झारखंड में इंडिया ब्लॉक की उम्मीद की किरण। भ्रष्टाचार के आरोप में जेल में बंद। आदिवासी बहुल राज्य में अपनी बिरादरी में लोकप्रिय। जेल से पार्टी को बेहतर प्रदर्शन कराने व पारिवारिक अंतर्कलह थामने की चुनौती।

नेकां: उमर अब्दुल्ला
(3 सीटें, 7.87 फीसदी वोट)
पिता फारुक अब्दुल्ला से संभाली पार्टी की विरासत। कश्मीर घाटी में लोकप्रिय चेहरा। अनुच्छेद 370 खत्म करने और केंद्रशासित प्रदेश बनाने के खिलाफ आवाज उठाई। पीडीपी व गुलाम नबी आजाद पर भारी पड़ने की चुनौती।

किसी के साथ नहीं...अपनी ताकत पर ही भरोसा

टीएमसी: ममता बनर्जी
(22 सीटें, 43.3 फीसदी वोट)
मुख्यमंत्री ममता बनर्जी निर्विवाद रूप से पश्चिम बंगाल की सबसे बड़ी सियासी शख्सियत हैं। आक्रामक राजनीति उन्हें विशेष पहचान प्रदान करती है। राज्य में दशकों पुरानी वाम मोर्चा सरकार को अपने दम पर उखाड़ फेंकने वाली ममता ने अब इंडिया ब्लॉक से किनारा कर लिया है। राज्य में भाजपा का बढ़ता प्रभाव बड़ी चुनौती है। भाजपा खुलकर हिंदुत्व कार्ड चल रही है। इसके जवाब में ममता को अल्पसंख्यक व बहुसंख्यक मतदाताओं के बीच तालमेल बैठाने की मुश्किल चुनौती का सामना करना पड़ रहा है।

बीजद: पटनायक
(12 सीटें, 42.8 फीसदी वोट)
ओडिशा के पांच बार के सीएम और निर्विवाद रूप से अब तक के सबसे अधिक स्वीकार्य नेता। राजग से किनारा करने के बाद विपक्ष के गठबंधन से लगातार बरता परहेज। संसद में मोदी सरकार का हर मुद्दे पर समर्थन। इसके बाद राजग में वापसी की चर्चा हुई। बीते लोकसभा चुनाव में भाजपा ने बीजद को कड़ी टक्कर दी, मगर विधानसभा चुनाव में कोई दल उसके आसपास भी खड़ा नहीं रह पाया। अस्वस्थ चल रहे पटनायक का यह अंतिम चुनाव हो सकता है।

बसपा: मायावती
(10 सीटें, 19.43 फीसदी वोट)
कभी निर्विवाद रूप से देश के बड़े चेहरों में शुमार रहीं। अपने दम पर पार्टी को यूपी जैसे अहम सूबे में बहुमत दिलाने के बाद सियासी कद बेहद मजबूत हुआ। हालांकि, राज्य में भाजपा के एक बार फिर से मजबूती के साथ उभरने के बाद उनका ग्राफ बहुत नीचे गया है। 2014 के चुनाव में खाता खोलने में नाकाम रहने के बाद 2019 में सपा से गठबंधन के कारण बसपा को 10 सीटें मिलीं। हालांकि, बाद में सपा से नाता तोड़ने के बाद मायावती गैरभाजपा-गैरकांग्रेस की राजनीति कर रही हैं। उन्होंने आगामी चुनाव में किसी के साथ गठबंधन नहीं करने की घोषणा की है।

बीआरएस: के चंद्रशेखर राव
(9 सीटें, 35 फीसदी मत)
केसीआर के नाम से मशहूर के चंद्रशेखर राव ने राज्य के रूप में तेलंगाना के उदय के बाद हुए पहले चुनाव में ही सरकार बना कर सबको चौंकाया। लगातार दूसरा चुनाव जीतने के बाद उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षा बढ़ी। खुद को केंद्र की राजनीति का बड़ा खिलाड़ी बनाने के लिए अपनी पार्टी तेलंगाना राष्ट्र समिति को भारत राष्ट्र समिति का नाम दिया। हालांकि, बीते साल विधानसभा चुनाव हारने के साथ ही चुनौतियां बढ़ गईं। राज्य में कांग्रेस ने उनसे सत्ता छीन ली है तो भाजपा बड़ी ताकत के रूप में उभर रही है।

वाईएसआरसीपी : जगनमोहन
(22 सीटें, 50 फीसदी वोट)
सीएम पिता वाई शेखर राज रेड्डी के निधन के बाद कांग्रेस से अलग होकर जगनमोहन रेड्डी ने वाईएसआरसीपी बनाई। विधानसभा चुनाव में पहली असफलता के बाद पीछे मुड़कर नहीं देखा। बीते चुनाव में दमदार प्रदर्शन से विरोधियों को चौंकाया। इस बार भी अपने दम पर चुनाव मैदान में हैं। उनका मुकाबला भाजपा, जनसेना और टीडीपी गठबंधन से है। पूरे पांच साल तक संसद में मोदी सरकार का समर्थन करने के कारण भाजपा जगनमोहन का साथ छोड़ने को लेकर असमंजस में थी। जाहिर तौर पर लोकसभा के साथ हो रहे विधानसभा चुनाव के नतीजे उनका राजनीतिक भविष्य तय करेंगे।

वाम मोर्चा : सीताराम येचुरी
कभी भाजपा विरोधी गठबंधन खड़ा करने के मामले में माकपा नेता हरिकिशन सिंह सुरजीत सूत्रधार रहे। तब वाम दलों की केरल, पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा में तूती बोलती थी। पार्टी का हिंदीपट्टी के कुछ राज्यों में भी प्रभाव था। हालांकि, अब स्थिति दूसरी है। पार्टी त्रिपुरा, प. बंगाल की सियासत में हाशिये पर है। बाकी केरल ही उम्मीद का आखिरी किरण है। मुश्किल यह है कि यहां उसका सामना कांग्रेस से है, जिसकी अगुवाई में बने इंडिया ब्लॉक का हिस्सा वाम मोर्चा भी है। मोर्चा त्रिपुरा और पश्चिम बंगाल में कांग्रेस से गठबंधन की गुंजाइश तलाश रही है।

अन्नाद्रमुक : पलानीस्वामी
दूसरे दलों की तरह अन्नाद्रमुक भी इस चुनाव में राजग व इंडिया ब्लॉक से दूर है। जयललिता के निधन के बाद ईके पलानीस्वामी को सीएम बनने का मौका तो मिला, मगर वह विरासत व पार्टी में जारी अंतर्विरोध दूर नहीं कर पाए। कई नेताओं के साथ रहते हुए भी पार्टी कई धड़ों में बंटी है। यही कारण है कि पलानीस्वामी भाजपा से गठबंधन बरकरार नहीं रख पाए। हालांकि, बीते चुनाव में पार्टी को 31 फीसदी मत मिले। देखना दिलचस्प होगा कि पलानीस्वामी के नेतृत्व में पार्टी खोया आधार वापस हासिल करती है या हमेशा के लिए बिखर जाना ही इसका भविष्य रह गया है।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed