Aligarh Lok Sabha: सियासी मूड भांप चलता रहा ताला-तालीम की नगरी का मतदाता, 1952 से अब तक का सफर
लोकसभा सीट के राजनीतिक सफर पर गौर करें तो हर चुनाव में मतदाताओं का रुख स्थानीय मुद्दों, धार्मिक ध्रुवीकरण के साथ देश की हलचल पर केंद्रित रहा है। 1960 तक यहां कांग्रेस का दबदबा रहा, उसके बाद यह किला दरक गया और वर्ष 1984 और 2004 में ही कांग्रेस यहां जीत दर्ज कर पाई।
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ताला-तालीम के लिए पहचाने जाने वाले अलीगढ़ की देश में खासी राजनीतिक पहचान है। यहां का मतदाता देश के सियासी मूड के साथ चलता रहा है। धार्मिक आधार पर होने वाला ध्रुवीकरण भी यहां के समीकरणों को प्रभावित करता है। 1960 तक यहां कांग्रेस का दबदबा रहा, उसके बाद यह किला दरक गया और वर्ष 1984 और 2004 में ही कांग्रेस यहां जीत दर्ज कर पाई।
लोकसभा सीट के राजनीतिक सफर पर गौर करें तो हर चुनाव में मतदाताओं का रुख स्थानीय मुद्दों, धार्मिक ध्रुवीकरण के साथ देश की हलचल पर केंद्रित रहा है। आजाद भारत के पहले लोकसभा चुनाव 1952 और दूसरे 1957 के चुनाव में अलीगढ़-हाथरस संयुक्त सीट रही। इन दोनों चुनावों में जनरल व अनुसूचित श्रेणी में इस सीट पर दो-दो सांसद निर्वाचित हुए थे। पहले चुनाव मेंं अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित सीट पर स्वतंत्रता सेनानी और साधु आश्रम से जुड़े नरदेव स्नातक व सामान्य सीट पर श्रीचंद्र सिंघल सांसद निर्वाचित हुए। दूसरे चुनाव में नरदेव स्नातक के साथ जनरल श्रेणी से नेहरू-गांधी परिवार के बेहद करीबी स्वतंत्रता सेनानी जमाल ख्वाजा सांसद निर्वाचित हुए। 1960 तक कांग्रेस का यहां दबदबा रहा, लेकिन उसके बाद उसे चुनौतियां मिलने लगी।
दलित-मुस्लिम गठजोड़ बना जीते थे बीपी मौर्य
1962 के चुनाव में अलीगढ़ व हाथरस अलग-अलग सीट घोषित हो गईं।इस चुनाव में डा.बीआर आंबेडकर की पार्टी रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया के पश्चिमी यूपी के कद्दावर नेता एएमयू प्रोफेसर डा.बीपी मौर्य इस सीट पर चुनाव लड़े और दलित-मुस्लिम गठजोड़ का नारा दिया। उनका यह प्रयोग सफल रहा और उन्होंने कांग्रेस को हराकर जीत दर्ज की।
राजा महेंद्र प्रताप तीसरे स्थान पर रहे। इसके बाद 1967 के चुनाव में चरण सिंह के नेतृत्व वाली बीकेडी सक्रिय हुई और पार्टी के कद्दावर नेता आर्य नगर मडराक के शिवकुमार शास्त्री ने फिर दूसरी बार कांग्रेस को हराया।1984 के चुनाव में इंदिरा गांधी की हत्या की सहानुभूति लहर अलीगढ़ में भी जमकर चली और यहां से कांग्रेस की ऊषा रानी तोमर सांसद निर्वाचित हुईं। 1989 का चुनाव बोफोर्स तोप की दलाली और पूर्व प्रधानमंत्री वीपी सिंह को लेकर लड़ा गया। जनता दल के सतपाल मलिक को जीत मिली और कांग्रेस की ऊषा रानी हार गईं।
चौधरी चरण सिंह मुजफ्फरनगर में हारे, पार्टी ने अलीगढ़ सीट जीती
1971 में चुनाव के दौरान दंगे के चलते मतदान स्थगित हो गया था, पुनः मतदान हुआ तो चौधरी चरण सिंह की पार्टी बीकेडी के शिवकुमार शास्त्री ने जीत दर्ज की। यह वह चुनाव था, जिसमें चौधरी चरण सिंह भी मुजफ्फरनगर सीट पर चुनाव हार गए थे।
इस चुनाव में बीकेडी ने लगातार दूसरी बार शिवकुमार शास्त्री को टिकट दिया। उनके सामने जनसंघ से जुड़े पूरन चंद मालान व कांग्रेस से नेहरू-इंदिरा के बेहद करीबी कांग्रेसी यूनुस सलीम प्रत्याशी थे। मतदान के दिन ऊपरकोट से बूथ कैप्चरिंग के दौरान दंगा हो गया और मतदान स्थगित हुआ। पुन: मतदान में पूरन चंद मालान ने शिवकुमार शास्त्री को अंदरखाने सपोर्ट कर दिया। देश भर में बीकेडी सभी सीटों पर हार गई, खुद चरण सिंह मुजफ्फरनगर में लोकसभा चुनाव हार गए। मगर अलीगढ़ सीट बीकेडी ने जीती। आपात काल के बाद 1977 में हुए चुनाव में कांग्रेस विरोधी लहर थी, सभी विपक्षी दलों ने एकजुट होकर जनता पार्टी के बैनरतले चुनाव लड़ा। इस सीट पर ठा.नवाब सिंह चौहान जीते और कांग्रेस के घनश्याम सिंह चुनाव हारे। 1980 में जनता पार्टी से गभाना की रानी इंदिरा कुमारी ने जीत दर्ज की और कांग्रेस के घनश्याम सिंह फिर हारे। ब्यूरो
रामलहर के बाद से छह बार भाजपा जीती, दो बार बारी
1991 के लोकसभा चुनाव में राम लहर मुद्दा बनी। उसके बाद से लगातार चार बार अलीगढ़ सीट पर जीत का रिकार्ड शीला गौतम के नाम पर है। 1991, 1996, 1998 व 1999 में निर्वाचित हुईं। 91 में जनता पार्टी के कैप्टन बल्देव सिंह, 96 में सपा के सत्यपाल मलिक, 98 में चौ.सुनील सिंह, और 99 में कांग्रेस के उद्यमी एसएन चतुर्वेदी को हराया। 2004 में कांग्रेस के पक्ष में माहौल बना और भाजपा की शीला गौतम को हराकर कांग्रेस के चौधरी बिजेंद्र सिंह को सांसद बने। 2009 में यह सीट बसपा की राजकुमारी चौहान ने सपा के जफर आलम को हराकर जीती। भाजपा व कांग्रेस तीसरे-चौथे स्थान पर खिसक गईं। मगर 2014 से मोदी लहर में सीट वापस भाजपा के पास आई और 2019 में बरकरार रही। इन दोनों चुनाव में बसपा के अरविंद व अजीत बालियान चुनाव हारे हैं।
अब तक सात बार सांसद बनीं महिलाएं
आजादी के बाद से लेकर वर्ष 2019 तक के चुनाव में अलीगढ़ संसदीय क्षेत्र का प्रतिनिधित्व सात बार महिलाओं ने किया है। वर्ष 1980 में इंदिरा कुमारी, 1984 में कांग्रेस की उषा रानी तोमर, 1991, 1996, 1998 और 1999 में लगातार चार बार भाजपा की शीला गौतम, 2009 में राजकुमारी चौहान बसपा से निर्वाचित हुई हैं।