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Success Story: अमेरिका से लौटकर जीता चुनाव और टॉप 100 लोकप्रिय महिलाओं में शामिल

Tue, 26 Dec 2017 07:57 AM IST
भक्ति शर्मा
भक्ति शर्मा Updated Tue, 26 Dec 2017 07:57 AM IST
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success story of america return bhakti sharma
bhakti sharma

बात 2012 की है, मैं उस वक्त राजनीति शास्त्र में एमए कर चुकी थी। मेरे कई परिजन अमेरिका में रहते थे। मेरे लिए अमेरिका जाना आसान था, सो मैंने भी टेक्सास की रंगीन दुनिया में जाकर अपना करियर बनाने का फैसला किया। मैं वहां चली भी गई। मगर मेरे पिता को मेरा फैसला नहीं जचा। दरअसल, मेरी मंजिलें और भी हैं।

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दादाजी और पिताजी, दोनों ने ताउम्र अपने गांव के विकास के लिए नि:स्वार्थ सेवा की थी। बिना सरकारी मदद या किसी अपेक्षा के उनके काम ने हमेशा उन्हें गांव की मिट्टी से जोड़कर रखा था। और उनकी दिली इच्छा थी कि मैं उनकी भावनाओं का कद्र करते हुए जो भी करूं, अपने गांव के लिए करूं।
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उन्होंने मुझे समझाया कि जो सुख अपने देश की सेवा करने में है, वह कहीं नहीं मिल सकता। मैंने उन्हें निराश नहीं किया और एक साल के भीतर ही अमेरिका की लाखों रुपये वेतन वाली नौकरी छोड़कर वापस अपने देश आ गई। वतन वापसी के बाद मेरे मन में सबसे पहला ख्याल एक स्वयंसेवी संस्था बनाने का आया। इस विचार का एक कारण था। 
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मैंने अपने समाज में देखा कि उच्च मध्यवर्गीय परिवारों की महिलाओं की बदहाल जिंदगी के बारे में कोई नहीं सोचता। ये महिलाएं घरेलू हिंसा को सिर्फ इसलिए सहती रहती हैं, क्योंकि परिवार की इज्जत का पूरा दारोमदार इनके मुंह न खोलने पर ही टिका रहता है।

वैसे भी समाज की तथाकथित इज्जत इसी वर्ग के परिवारों में सर्वाधिक पाई जाती है। कई महिलाओं से बात करने पर मैंने पाया कि इन्हें काउंसलिंग की जरूरत है, जिससे ये अपने अधिकारों के प्रति जागरूक हो सकें। मैं अपना काम कर ही रही थी कि उसी वक्त मध्य प्रदेश में पंचायत चुनाव की घोषणा हो गई।
 

success story of america return bhakti sharma
bhakti sharma

मैं चुनाव लड़ने को तैयार हो गई, इसकी एक वजह यह भी थी कि मेरे गांव की सीट पंद्रह वर्षों बाद महिलाओं के लिए आरक्षित घोषित हुई थी और लोक स्वार्थ यह भी था कि अगर मैं जीत गई, तो न सिर्फ उन महिलाओं, बल्कि समाज के दूसरे जरूरतमंदों के लिए भी कुछ कर सकती हूं। कुछ गांव वाले भी चाहते थे कि चुनाव कोई पढ़ी लिखी जीते, ताकि गांव का सही विकास हो। मैं चुनाव लड़ी और जीतकर गांव की सरपंच बन गई।

महिला सशक्तिकरण से जुड़ी प्राथमिकता के साथ मैं पंचायत के सभी दूसरे जरूरी कामों में तेजी ले आई। पक्की सड़कें, हर ग्रामीण का राशन कार्ड, बैंक अकाउंट, मृदा स्वास्थ्य कार्ड, विभिन्न पेंशन तथा किसानों के मुआवजे के लिए मैंने हर स्तर पर लड़ाई लड़ी। स्वास्थ्य के मोर्चे पर कई चुनौतियों को पार करते हुए गर्व के साथ यह कहने लायक बनी कि हमारे गांव में एक भी कुपोषित बच्चा नहीं है।

मैंने सरपंच बनकर कोई भी काम अलग से या किसी अतिरिक्त प्रयास से नहीं कराया। ये सारी योजनाएं उसी व्यवस्था के तहत थीं, जिसमें कई लोगों को भ्रष्टाचार के सिवा कुछ नहीं दिखता। हां, अलग किया है, तो बस इतना कि सरकार द्वारा चलाए जा रहे कार्यक्रम ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ से प्रेरित होकर मैं हर उस परिवार को दो महीने की अपनी तनख्वाह देती हूं, जिसके घर में बेटी जन्म लेती है। इस काम को मैंने 'सरपंच मानदेय' की संज्ञा दी है।

देश में सैकड़ों सरकारी योजनाएं चल रहीं हैं, लेकिन अशिक्षा, भ्रष्टाचार और जागरूकता की कमी के कारण वे सफल नहीं हो पातीं। मैं मानती हूं कि सरपंचों का शिक्षित होना बहुत जरूरी है, क्योंकि पढ़े-लिखे सरपंच ही अधिकारियों से मिलकर अपने गांव में बदलाव ला सकते हैं।
-विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।

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