मंजिलें और भी हैं: सब्जियां बेचकर खोले नि:शुल्क अस्पताल, सरकार ने दिया पद्मश्री सम्मान
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मेरी उम्र तब महज 12 वर्ष थी, जब मेरा विवाह हुआ। विवाह के 12 वर्ष बीतने तक मैं चार बच्चों की मां बन गई। हमारा परिवार बेहद गरीबी में जी रहा था। मैं और मेरे पति प्रतिदिन संघर्ष के बाद जिंदगी की गाड़ी को पटरी पर लाने की कोशिश कर रहे थे। इस बीच मेरे पति आंत्रशोथ की मामूली सी बीमारी से ग्रस्त हो गए, जिसका इलाज उस समय भी संभव था।
किन्तु, पति की तबीयत ज्यादा खराब होने पर जब मैं उन्हें लेकर शहर के एक अस्पताल में पहुंची, तो डॉक्टरों ने इलाज के लिए पहले पैसे मांगे। उस वक्त मेरे लिए रुपये जुटाना पहाड़ तोड़ने जैसा था। मैंने बहुत कोशिश की, परंतु रुपये इकट्ठे न हो सके। अंतत: उनकी मृत्यु हो गई। मैंने तभी संकल्प लिया कि अपने पैसों से गरीबों के लिए एक अस्पताल जरूर बनवाऊंगी, ताकि गरीबी की वजह से मेरे पति की तरह कोई और मौत का शिकार न बने।
मैं पश्चिम बंगाल के 24 परगना जिले की रहने वाली हूं। जब मेरे पति की मृत्यु हुई, तो मेरा सबसे बड़ा बेटा चार वर्ष का था, जबकि सबसे छोटी बेटी महज डेढ़ वर्ष की थी। पति की मौत के बाद सबसे बड़ी समस्या चार बच्चों के पालन-पोषण की थी। चूंकि मैं पढ़ी-लिखी थी नहीं, तो रोजमर्रा के काम करके थोड़ी-बहुत कमाई करने लगी। मैंने प्रण किया कि किसी भी कीमत पर हार नहीं माननी है। अपने परिवार और संकल्प के लिए आगे बढ़ना है। दिन-रात मेहनत करने के बाद भी जब बच्चों के पालन-पोषण में दिक्कतें आने लगीं, तो मैंने दो बच्चों को अनाथालय में भेज दिया। मेरा एक बेटा अजय शुरू से ही होनहार था। उसका मन पढ़ने-लिखने में लग रहा था।
दो बच्चों को अनाथालय भेजने के बाद मैंने उसकी पढ़ाई-लिखाई पर ध्यान देना शुरू किया। मैंने उसे बचपन से ही डॉक्टर बनने के लिए प्रोत्साहित किया। मुझे उसमें अपने संकल्प को पूरा करने की झलक दिखने लगी। बेटे को पढ़ाने और अस्पताल के बनवाने के लिए ज्यादा पैसों की आवश्यकता थी। ऐसे में मैं दिन भर मजदूरी करने के बाद शाम को सब्जियां बेचने लगी। इस तरह रुपये इकट्ठा करने के बाद मैंने हांसपुकुर गांव में एक बीघा जमीन खरीदी।
तब तक मेरा बेटा बड़ा हो चुका था। वर्ष 1993 में मैंने स्थानीय लोगों की सहायता से ह्यूमैनिटी ट्रस्ट का गठन किया और एक अस्थायी क्लीनिक की स्थापना की। अस्थायी क्लिनिक खुलने के बाद कई गांवों के लोगों ने अस्पताल निर्माण में योगदान दिया। इस तरह से वर्ष 1996 में अस्पताल के पक्के भवन का निर्माण हुआ। मेरे बेटे अजय कुमार ने डॉक्टरी की डिग्री लेने के बाद यहीं अस्पताल में काम करना शुरू कर दिया।
अब उसी के साथ मैं इसका प्रबंधन देखती हूं। यहां आने वाले मरीजों का मुफ्त में इलाज किया जाता है। अब तक चंदे और कुछ संगठनों से मिलने वाली आर्थिक सहायता से अस्पताल में करीब 25 बिस्तरों की व्यवस्था कर दी गई है। हालांकि अब भी हम डॉक्टरों की कमी महसूस कर रहे हैं, क्योंकि बेटे के लिए अकेले अस्पताल संभालना मुश्किल हो रहा है। मुझे बेहद खुशी है कि सरकार ने मेरे काम को सम्मान दिया।
इसके बावजूद मुझे ज्यादा खुशी तब होगी, जब दूसरे लोग मेरे काम से प्रेरणा लेकर समाज की बेहतरी के लिए आगे आएंगे। मुझे तो अपने काम का सम्मान उसी दिन मिल गया था, जिस दिन अस्पताल शुरू हुआ था और पहले मरीज का सफलतापूर्वक इलाज हुआ था। मगर मेरा मिशन अभी पूरा नहीं हुआ है। मरीजों की संख्या को देखते हुए अस्पताल में आईसीयू समेत कई अन्य सुविधाओं, डॉक्टरों और कर्मचारियों की जरूरत है। पर मुझे विश्वास है, यहां तक आ गई हूं, तो अब आगे भी कोई न कोई राह जरूर निकलेगी।
(पद्मश्री से सम्मानित समाजसेविका के विभिन्न साक्षात्कारों पर अधारित।)
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