इलाज के अभाव में बहन की हुई थी मौत, टैक्सी चलाकर बनवा दिया अस्पताल
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मेरी बहन आज जिंदा होती, तो वह तीस साल की हो चुकी होती। तेरह साल पहले सीने के संक्रमण की वजह से उसकी मौत हो गई थी। उसकी मौत के पीछे बीमारी के अलावा एक दूसरी बड़ी वजह भी थी। दरअसल मेरे घरवालों की हैसियत नहीं थी कि वे मेरी बहन का महंगा इलाज करा पाते। और कोलकाता शहर की परिधि के बाहर मेरे गांव में कोई ढंग का अस्पताल नहीं था।
आज की तरह उस वक्त भी मैं कोलकाता की सड़कों पर टैक्सी चलाता था। बहन की मौत ने मुझे यह एहसास दिला दिया कि मैं कितना लाचार और गरीब हूं। इतना गरीब कि मेरी बहन इलाज के अभाव में दुनिया छोड़ गई। लेकिन उस घटना का एक सकारात्मक पहलू यह रहा कि बहन की मौत, मेरे दिमाग में गांव में एक अस्पताल खोलने के साहस का बीज बो गई। एक टैक्सी चालक के दिमाग में अपने दम पर अस्पताल खोलने का विचार आ जाए, यह किसी विशेष प्रेरणा से ही संभव था।
मगर मेरी सोच यथार्थ में बदल जाए, यह काम इतना आसान नहीं था। अस्पताल खोलने के लिए सबसे पहली जरूरत थी-जमीन की। कम से कम दो बीघा जमीन, जिसके लिए तीन लाख रुपये चाहिए थे। बचत के नाम पर घर में कुछ दिनों का राशन ही था। जमीन खरीदने के लिए मेरी बीवी ने अपने सारे जेवर बेचने का प्रस्ताव रखा। मुझे ऐसा करना सही नहीं लगा, लेकिन बीवी के समझाने के बाद मैंने उसकी बात मानकर उसके जेवर बेच दिए।
जमीन के इंतजाम के बाद अगला पड़ाव था, अस्पताल के लिए भवन निर्माण। इसके लिए मैंने कई दानदाताओं से संपर्क किया। कई लोगों ने मुझे दान दिया, लेकिन तेईस साल की लड़की सृष्टि घोष का दान मेरे लिए बहुत खास था, जिसने मैकेनिकल इंजीनियरिंग करने के बाद पच्चीस हजार रुपये की अपनी पूरी पहली पगार मेरे अस्पताल की खातिर मुझे सौंप दी थी। सृष्टि से मेरी मुलाकात टैक्सी में हुई थी।
मैं उसके परिवार के साथ उसे अपनी कैब में बिठाकर ले जा रहा था। मेरी योजना के बारे में जानकर उसने उस वक्त मुझे सौ का नोट देकर अपना मोबाइल नंबर दिया था। पिछले साल जब उसकी नौकरी लगी, उसने मुझसे संपर्क किया। कई लोगों ने इससे ज्यादा दान दिया है, लेकिन मैंने सृष्टि में अपनी बहन का अक्स देखा है।
बारह साल की मेहनत के बाद कुल अड़तीस लाख की लागत में आखिरकार मेरे पुनरी गांव में अस्पताल बनकर तैयार हो गया। अस्पताल का नाम मैंने अपनी बहन के नाम पर 'मारुफा स्मृति वेलफेयर फाउंडेशन' रखा है। इस अस्पताल के बन जाने के बाद आसपास के छोटे-बड़े कुल सौ गांवों को फायदा होगा। अभी अस्पताल में शुरुआती सुविधाएं ही उपलब्ध हैं, मगर धीरे-धीरे यहां सभी सुविधाएं होंगी, जो या तो निःशुल्क या फिर कम से कम लागत पर गरीबों के इलाज के लिए उपलब्ध रहेंगी।
मेरा मकसद भी यही था कि वे गरीब, जो पैसों के अभाव में बड़े अस्पताल तक नहीं पहुंच पाते हैं, उन्हें कम लागत में उचित इलाज मुहैया हो सके। ताकि किसी को भी अपनी मारुफा से महरूम न होना पड़े। अस्पताल तो बन गया है, लेकिन मरीजों की देखभाल के लिए नर्सों की भी जरूरत होगी। इसके लिए मैं एक नर्सिंग स्कूल खोलना चाहता हूं, जिससे स्थानीय लड़कियों को नर्सिंग की ट्रेनिंग देकर उन्हें रोजगार दिया जा सके।
-विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।
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