हर लड़की को किरण बेदी बनाना चाहता है पप्पू 'रिक्शा वाला'
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ये कहानी देश के उन तमाम लोगों के लिए प्रेरणास्त्रोत बन सकती है जो शिक्षा के क्षेत्र में कुछ करना चाहते हैं। मजबूर और नन्हें हाथों में होटलों की कप प्लेट नहीं, बल्कि पेंसिल और कॉपी देखना चाहते हैं।
कहानी के हीरो राजस्थान के पप्पू कठैत हैं। लड़कियों-महिलाओं की शिक्षा और सशक्तिकरण में पप्पू का अनूठा योगदान है। तीन दशक बाद आज 6 गावों की तस्वीर बदल चुकी है। लड़कियां पढ़ रही हैं। कामयाबी पा रही है। इस काम में पप्पू की बहनें भी हाथ बंटा रही हैं। इस सफलता की एक पूरी कहानी है जो 36 साल पहले शुरू हुई।
भारत के ज्यादातर हिस्सों की तरह राजस्थान के डेलवारा इलाके के सूरत-ए-हाल भी कमोवेश वैसे ही थे। गरीब, लाचार और मजबूर लोगों से गांव भरे थे। तंगहाली में भी परिवार बड़े होते थे। 6 गांवों में दो ही स्कूल थे। लड़कियों को पढ़ाने का ख्याल तो उसी वक्त दम तोड़ देता था जब उनके पराये घर जाने की बात जेहन में उठती थी। कोई लड़की पढ़ भी गई तो बमुश्किल दो-एक दर्जा तक।
अजमेर जिले के लसारिया गांव से शुरू होने वाली ये कहानी उस शख्स की है जिसे कच्ची उम्र में ही पारिवारिक हालातों के चलते स्कूल छोड़कर दिल्ली आना पड़ा और रिक्शा चलाकर घर खर्च चलाना पड़ा। आगे स्लाइड में पढ़िए पूरी सक्सेस स्टोरी।
रिक्शा चलाते वक्त पप्पू को सताती थी गांव की लड़कियों की पढ़ाई की चिंता
गांवों के स्कूलों में पट्टी-बस्ता चलता था। बैठने के लिए बिछौना घर से ही ले जाना पड़ता था। कभी मास्टर जी पेड़ के नीचे तो कभी सरकारी इमारत के जर्जर छज्जे के नीचे बने बरामदे में क्लास लगा देते थे। 13 साल के पप्पू भी उन बच्चों में शामिल थे जो एक सुर में कभी ककहरा तो कभी पहाड़े रटा करते थे।
लेकिन दिन ऐसा आया कि नन्हें हाथों को पट्टी-बस्ता छोड़कर रिक्शे का हैडल थामना पड़ा। गांव के धूसर रास्तों से वो मीलों दूर चकाचौध भरी राजधानी दिल्ली में आ गया था। घर में बच्चों समेत 10 लोग थे। इसलिए पिता के लिए अकेले घर चलाना मुश्किल था। यही मजबूरी थी कि पप्पू को उस उम्र में पिता का हाथ बंटाने के लिए आना पड़ा। समय के पहिए के साथ रिक्शे का पहिया चलता गया। बाप-बेटे दिन-रात मेहनत काम करते। लोगों का बोझ ढोते-ढोते अंतड़ियां जवाब दे जातीं। 13 साल के रिक्शाचालक की मेहनत का ठीक से अंदाजा लगा लिया जाए तो जाड़े के दिनों में भी पसीना आ जाए।
इस सब के बीच एक अच्छी बात हुई जिसने नन्हें पप्पू के विचारों में क्रांतिकारी परिवर्तन ला दिया और उसे जीने की राह दिखाई। लोगों के जरिए दिल्ली की महिला आईपीएस अफसर किरण बेदी की बातें जब गाहे-बगाहे उसके कानों में पड़तीं तो उसे बहनों का ख्याल हो आता। वो उस उम्र में भी गांव में उपेक्षित जीवन जी रही बच्चियों और महिलाओं के बारे में विचार करता था। उसने सपना देखा कि क्यों नहीं उसके गांव की लड़कियां भी किरण बेदी बन सकती हैं!
यही वो पल था जिसने उसे तमाम मुश्किलों को भूलकर कुछ कर गुजरने का हौसला दिया। हिम्मत और ताकत दी। अब उसे रिक्शा खींचने में सवारियों का बोझ नजर नहीं आता। उसके लिए सबसे बड़ा बोझ था अपने गांव-समाज में महिलाओं के हालात थे। इरादे नेक हों तो खुदा भी साथ देता है। पप्पू भी धीरे ही सही, अपने लक्ष्य की ओर बढ़ चला।
घर से ही शुरू किया शिक्षा का अभियान
साल 1985 में पप्पू के एक एक बड़े भाई मोहन को सेना में नौकरी मिल गई। भाई की तन्ख्वाह से परिवार की हालत में कुछ सुधार हुआ तो पिता गांव लौट गए, लेकिन पप्पू दिल्ली में ही रहे। अब वह ट्रक चलाने लगे थे और क्रेन ऑपरेटर का काम भी सीख लिया था।
दिल्ली में रहने के दौरान पप्पू ने ये समझ विकसित की कि घर और समाज को चलाने में महिलाओं की भूमिका भी जरूरी है। शिक्षित महिलाएं घर ही नहीं पूरे समाज की दशा और दिशा बदल सकती हैं। पप्पू ने अपने लक्ष्य की शुरुआत घर से ही की।
हालांकि तीन बहनें कम उम्र में ही शादी हो जाने के कारण स्कूल छोड़ चुकी थीं। चौथी बहन सुशीला के सामने भी यही दिक्कत थी। वो पांचवीं तक पढ़ चुकी थी। उसकी पांच साल की उम्र में ही शादी की जा चुकी थी। मजबूर बहन को भाई के कंधों का सहारा मिला। गांव में कक्षा पांच के बाद की पढ़ाई के लिए कोई स्कूल था नहीं तो उसने बहन का दाखिला पांच किलोमीटर दूर अंधेरी देवरी गांव के स्कूल में करा दिया। सुशीला रोजाना स्कूल जाने के लिए 10 किलोमीटर का सफर तय करने लगी।
साल 1999 में सुशीला ने दसवीं की परीक्षा पास कर ली। आगे पढ़ाई के लिए उसे अपने गांव से 11 किलोमीटर दूर ब्यावर कस्बे के इंटर कॉलेज में जाना पड़ा।
पप्पू की एक और छोटी बहन जिसका नाम किरण बेदी के नाम पर ही रखा गया था, उसे ब्यावर के एक अंग्रेजी माध्यम के स्कूल में भेजा गया।
पप्पू और उसके परिवार पर गांव वालों ने जताया भरोसा
चूंकि पप्पू का ख्वाब अभी अधूरा था, वो अपने पूरे समुदाय को शिक्षित देखना चाहता था इसलिए उसने साल 2005 के पंचायत का चुनाव लड़ने का फैसला किया। पप्पू को लोगों ने बतौर उम्मीदवार पसंद किया और उसे सरपंच बना दिया। ग्राम पंचायत के अर्तगत आने वाले 6 गांवों के दो स्कूलों में अब तक आठवीं तक की ही पढ़ाई संभव हो पाई थी। पप्पू ने स्कूलों की कक्षाएं बढ़ाए जाने को लेकर प्रयास किया। आखिरकार मेहनत रंग लाई और साल 2008 में डेलवारा के स्कूल को अथॉरिटी ने 10वीं कक्षा तक बढ़ा दिया।
पप्पू कहते हैं कि लड़कियों के पढ़ाई छोड़ने बड़ी वजह थी कि उन्हें एक जगह से दूसरी जगह जाना पड़ता था। उन्हें कई किलोमीटर का रास्ता तय करना पड़ता था। ऐसी जगहों में माता पिता बच्चियों को अकेले सफर करने से मना करते हैं। इसका यही हल था कि सुविधाएं मुहैया कराई जाएं।
साल 2010 में डेलवारा पंचायत महिला उम्मीदवार के लिए आरक्षित हो गई। पप्पू ने अपनी पत्नी उमरा को उम्मीदवार बनाया। पप्पू के किए गए कार्यों पर लोगों को भरोसा था इसलिए उसकी पत्नी को भी चुनाव में भारी जीत दिलाई। उमरा के सरपंच रहते डेलवारा का स्कूल 12वीं तक हो गया और लसारिया का 10वीं तक।
साल 2015 में सरकार ने पंचायत चुनाव के उम्मीदवारों के लिए न्यूतम शिक्षा की योग्यता अनिवार्य की तो गांव वालों ने पप्पू की बहन किरन को सरपंच बना दिया।
पप्पू के परिवार की औरतें इलाके की लड़कियों-महिलाओं के लिए प्रेरणा बन गईं। पप्पू की बहन सुशीला ने बचपन में कराई गई शादी को ठुकरा दिया। ससुराल वाले उसके 14 साल का होते ही उसे भेजने की दबाव डाल रहे थे।
पप्पू की पहल से हकीकत हुआ 'शिक्षा का अधिकार'
12 लाख कठैत मुस्लिमों में सुशीला पहली लड़की है जिसने सरकारी नौकरी पाने में कामयाबी हासिल की। कठैत मुस्लिमों को 14वीं शताब्दी के राजपूतों का वंशज बताया जाता है। जिन्हें इस्लाम में धर्म में परिवर्तित कर दिया गया था। ये लोग तीन जिलों अजमेर, पाली और भीलवाड़ा में बस गए थे।
सुशीला इंस्पेक्टर बन चुकी है। उसकी बहनें संगीता और किरन स्कूल टीचर हैं। किरन पंचायत की सरपंच भी है और सॉफ्टवेयर इंजीनियर भी। बड़ी बहन जीना तलाकशुदा है, लेकिन उसने भी फिर से फिर से पढ़ाई शुरू कर दी। आज वह बी.ए. की पढ़ाई कर रही है। ब्यावर के कॉलेज डेलवारा पंचायत की लड़कियों से भरे हुए हैं।
किरन को भाई पप्पू पर गर्व है कि उसने महिलाओं की शिक्षा और उनके सशक्तिकरण में योगदान दिया। वो कहती है कि शिक्षा उसका पसंदीदा विषय है। किरन श्री सीमेंट के लिए मोबाइल ऐप डेबलपर का काम भी कर रही हैं। किरन ने जोधपुर से इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी में बीटेक की पढ़ाई की है। फिलहाल किरन डेलवारा के सीनियर सेकेंड्री स्कील में कंप्यूटर लैब स्थापित करने में व्यस्त हैं। यहां लड़कियों को कंप्यूटर की शिक्षा दी जाएगी। किरन के प्रयासों से डेलवारा राजस्थान का पहला खुले में शौच मुक्त क्षेत्र घोषित किया जा चुका है। इसके लिए बीते साल कलेक्टर ने किरन को सम्मानित भी किया था।
पप्पू ने फिर स्कूल जाना शुरू कर दिया है। ओपन स्कूल के जरिए एकबार दसवीं की परीक्षा भी दी, लेकिन गणित में पास नहीं हो सके। लेकिन इसबार पप्पू कड़ी मेहनत कर रहे हैं। पप्पू कहते हैं कि उनकी पत्नी उमरा में ने भी कक्षा आठ पास कर लिया है।
ये कहानी पप्पू के पक्के इरादे की है। आज पप्पू के घर की औरतें ही नहीं, बल्कि पूरे डेलवारा ग्राम पंचायत की लड़कियों की जिंदगी शिक्षा से रौशन हो रही है। 6 गांवों की तस्वीर पूरी तरह से बदल चुकी है। कह सकते हैं कि इस कहानी में सफलता पाने वाले किरदार कई हैं लेकिन असल हीरो पप्पू ही हैं जिनके पक्के इरादे से ये सब संभव हो पाया। पप्पू के जज्बे को सलाम।
सोर्स-thebetterindia.com
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