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मंजिलें और भी हैं: लोगों के ताने और फुटबॉल के शौक ने बदल दी जिंदगी

Wed, 09 Oct 2019 02:20 AM IST
देव कश्यप नादिया निघात
नादिया निघात Published by: देव कश्यप Updated Wed, 09 Oct 2019 02:20 AM IST
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Nadia Nighat break stereotypical mindset become Kashmir First woman football coach
Nadia nighat, woman football coach in Jammu and Kashmir - फोटो : अमर उजाला

मैं तीन भाई-बहनों में सबसे छोटी थी। फुटबॉल खेलना मेरा बचपन का शौक था। मैं कश्मीर के श्रीनगर की रहने वाली हूं। फुटबॉल का खुमार जब मुझ पर चढ़ा, तब मैं यहां के एक सरकारी स्कूल में पढ़ रही थी। चूंकि यहां लड़कियों की कोई टीम नहीं होती थी, तो मैं घर के आंगन या फिर सड़क पर अपने आस-पास के लड़कों के बीच जाकर फुटबॉल खेलती थी।

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मेरे साथ खेलने वाले लड़के, मुझसे अक्सर कहते थे कि तुम हमारे साथ फुटबॉल मत खेला करो, क्योंकि स्कूल के अन्य लड़के अक्सर उन्हें चिढ़ाते थे कि वे लड़की के साथ फुटबॉल खेलते हैं, जिससे मेरे साथ खेलने वाले लड़कों को शर्मिंदा होना पड़ता था। ऐसे में लड़कों जैसा दिखने के लिए मैंने अपने बाल काट लिए, लेकिन फुटबॉल खेलना जारी रखा। मैं ग्यारह वर्ष की उम्र से प्रोफेशनल स्तर पर फुटबॉल खेल रही हूं।
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जिन लड़कों के साथ मैं फुटबॉल खेलती थी, उनको एक बार श्रीनगर के अमर सिंह कॉलेज एकेडमी के कोच मोहम्मद अब्दुल्ला के साथ फुटबॉल खेलने का मौका मिला, मैं भी उस टीम में शामिल थी। हालांकि कोच तुरंत पहचान गए कि मैं एक लड़की हूं, पर उन्होंने कोई आपत्ति नहीं जताई।
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कोच के साथ फुटबॉल खेलने में मुझे इतना मजा आया कि मैंने अपने घर आकर मम्मी-पापा से फुटबॉल की कोचिंग लेने की जिद की। पापा तो तैयार हो गए, पर मम्मी इसके लिए बिल्कुल तैयार नहीं थी। तब कश्मीर के हालात को देखते हुए उन्हें लगता था कि एक लड़की होकर मैं फुटबॉल कैसे खेल सकती हूं। लेकिन जब मैंने एकेडमी जाना शुरू किया और धीरे-धीरे मेरे खेल की तारीफ शुरू हुई, तो मेरी मां ने भी मेरा साथ देना शुरू कर दिया। मैं एकेडमी में करीब 48 बच्चों की क्लास में अकेली लड़की थी।

घरवाले तो किसी तरह मान गए, पर असल समस्या बाहर वालों के साथ शुरू हुई। एकेडमी की ड्रेस पहनकर जब मैं फुटबॉल खेलने जाती थी, तो आस-पास के लोग मेरे कपड़ों को लेकर छींटाकशी करते थे। वे कहते थे कि फुटबॉल लड़कियों के लिए नहीं है, अगर कुछ करना ही है तो पढ़ाई करो।

लेकिन मम्मी-पापा के प्रोत्साहन की वजह से मैंने उन पर ध्यान नहीं दिया। चूंकि यहां पत्थरबाजी की घटनाएं ज्यादा होती थीं, तो अक्सर कर्फ्यू लगा दिया जाता था, ऐसे में मुझे घर पर ही फुटबॉल की प्रैक्टिस करनी पड़ती थी। एकेडमी में प्रैक्टिस करने के दौरान ही मुझे वर्ष 2010 और 2011 में जम्मू कश्मीर की ओर से राष्ट्रीय स्तर पर फुटबॉल खेलने का मौका मिला। कश्मीर के जो हालात हैं, उनमें मैं नहीं चाहती थी कि जिन दिक्कतों का सामना मैंने किया, उन्हीं का सामना कोई दूसरी लड़की करे। दूसरा, इन लड़कियों के परिवार वाले नहीं चाहते थे कि उनकी बेटियां खुली जगह पर फुटबॉल खेले।

जल्द ही मैंने जम्मू और कश्मीर फुटबॉल एसोसिएशन (जेकेएएफए) से कोच बनने के लिए प्रशिक्षण लेना शुरू किया। यहीं से मैंने डी-लाइसेंस प्राप्त किया, जो फीफा से मान्यता प्राप्त है। इसके बाद मैंने श्रीनगर में ही अंडर-16 और अंडर-19 बैच को कोचिंग देनी शुरू की। यहां लड़कों के अलावा लड़कियों को भी ट्रेनिंग दी जाती है।

अक्सर लोग कहते हैं कि मैं दूसरी लड़कियों को बिगाड़ रहीं हूं। इसके बावजूद मुझे या कोचिंग लेने वाली लड़कियों को कोई फर्क नहीं पड़ता, क्योंकि मेरा मानना है कि हम क्या खेलते हैं यह मेरा अपना हक है। मेरा मानना है कि यदि आप दिल से कोई काम करना चाहते हैं, तो उसे करने का प्रोत्साहन अपने आप मिलने लगता है। जहां तक बात कश्मीर की है, तो यहां कई सारी समस्याओं के बावजूद विभिन्न खेलों की ओर आकर्षित हो रही प्रतिभाएं मौजूद हैं।

(विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।)

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