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सड़क पर बिताई जिंदगी, जीता गोल्ड...और अब ओलंपिक

Fri, 04 Mar 2016 04:49 PM IST
टीम डिजिटल/अमर उजाला
टीम डिजिटल/अमर उजाला Updated Fri, 04 Mar 2016 04:49 PM IST
सार

  • कभी सड़क पर बिताई थी जिंदगी
  • पिता की असमय मौत ने तोड़ दिया
  • गोदाम में गोला फैंकना सीखा
  • संकट आए पर प्रेक्टिस जारी रखी

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meet inderjeet singh who win Olympic
इंदरजीत - फोटो : चंडीगढ़ ब्यूरो

विस्तार

मूलरूप से पंजाब के होशियारपुर के रहने वाले 27 वर्षीय इंद्रजीत सिंह जब 10वीं में थे तो पिता की असमय मौत हो गई। परिवार के सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो गया। किराए पर कमरा लेने के लिए पैसे नहीं थे। हालांकि पिता की जगह उनके बड़े भाई जसविंद्र उर्फ सोनू को नौकरी मिल गई। मुश्किलें कम नहीं हुईं।
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इंद्रजीत ने जैसे-तैसे अपनी प्रैक्टिस जारी रखी। इंद्रजीत कहते हैं कि अपनी ट्रेनिंग के लिए पिछले कई सालों में मैंने दो दुकानें बेच दीं और कई लोगों से कर्ज भी लिया हुआ था। करीब 10 साल पहले इंद्रजीत केरल में एक प्रतियोगिता में भाग ले रहे थे। एथलेटिक्स कोच शक्ति सिंह ने इंद्रजीत को गोला फेंकते देखा। वह इंद्रजीत से बहुत प्रभावित हुए।
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कोच शक्ति सिंह ने इंद्रजीत को भिवानी बुला लिया। कोच ने अपने एक परिचित के गोदाम में उनके रहने का इंतजाम कराया। करीब तीन वर्ष तक इंद्रजीत उसी गोदाम में रहकर गोला फेंकना सीखा। इंद्रजीत बताते हैं कि मैं एशियन गेम्स में गोल्ड जीतने के लिए तैयार था, लेकिन परिस्थितियां मुश्किल थीं। ठंड पड़ने के साथ-साथ बारिश भी हो रही थी। मैं अच्छे से वार्मअप भी नहीं कर पाया था।
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बकौल इंद्रजीत, मेरे पास कोई कोच भी नहीं था। ऊपर से दो बैग उठाकर करीब 3 किलोमीटर पैदल चला। मेरे हाथ में ओम प्रकाश का बैग भी था, वे कोई जरूरत की चीज लेने के लिए वापस रूम चले गए थे। उसके बाद स्टेडियम पहुंचा और मैं प्रतिस्पर्धा में ब्रोंज मे‌डल ही जीत सका। इस पर ‌इंद्रजीत की मां दर्शन कौर कहती हैं कि तो क्या अगर इंद्रजीत ने गोल्ड मेडल नहीं जीता?

इंद्रजीत बताते हैं कि उनकी सफलता के पीछे उनकी मां का बहुत बड़ा योगदान है। 2007 में पिता गुरदयाल सिंह की मौत के बाद मां ने उनके और बड़े भाई के टैलेंट को प्रोत्साहित करने के लिए हरसंभव प्रयास किया। दूसरी तरफ, इंद्रजीत ने भी उनका सपना पूरा करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। इसके लिए वे रात में ग्राउंड में रोशनी की सुविधा न होने के कारण वाहनों की लाइट जलाकर प्रैक्टिस किया करते थे।

भीम स्टेडियम में प्रैक्टिस के दौरान इंद्रजीत की दोस्ती सेना से रिटायर्ड फौजी राजेंद्र सिंह परमार के लड़के रवि परमार से हुई। गोदाम में रहन-सहन ठीक न होने से इंद्रजीत बीमार पड़ गए। गंभीर हालत में उन्हें हिसार ले जाया गया। अस्पताल में रहते-रहते राजेंद्र परमार उसे बेटे की तरह मानने लगे और अस्पताल से सीधे घर ले आए। आज पांच वर्ष हो गए इंद्रजीत, राजेंद्र के ही घर में रहते हैं।


इंद्रजीत ने 2014 में दक्षिण कोरिया में एशियाई खेलों में कांस्य पदक जीता था। अभी हाल ही में 3 जून को चीन में चल रही एशियन एथलेटिक्स चैंपियनशिप की शॉटपुट स्पर्धा में गोल्ड जीता। उन्होंने 20.41 मीटर गोला फेंका। अब वह 2016 में रियो ओलिंपिक के लिए क्वालीफाई कर चुके हैं। ऐसा करने वाले वह देश के पहले शॉर्टपुट खिलाड़ी बने हैं।

 
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