{"_id":"6ab0b410cec546b2f70f3c4b","slug":"dr-anand-megalingam-honoring-struggle-of-father-once-denied-us-visa-now-nasa-welcoming-know-success-story-2026-09-21","type":"story","status":"publish","title_hn":"पिता के संघर्ष को सम्मान: कभी अमेरिका ने किया वीजा खारिज, आज नासा कर रहा स्वागत; कैसे लिखी सफलता की कहानी?","category":{"title":"Success Stories","title_hn":"सफलताएं","slug":"success-stories"}}
पिता के संघर्ष को सम्मान: कभी अमेरिका ने किया वीजा खारिज, आज नासा कर रहा स्वागत; कैसे लिखी सफलता की कहानी?
Mon, 21 Sep 2026 10:05 AM IST
ज्योति भास्कर
अमर उजाला नेटवर्क।
अमर उजाला नेटवर्क।
Published by: ज्योति भास्कर
Updated Mon, 21 Sep 2026 10:05 AM IST
सार
गरीबी के कारण कभी जिस अमेरिका ने उनका वीजा खारिज कर दिया था, उसी देश ने वर्षों बाद नासा और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर डॉ. आनंद मेगालिंगम का सम्मानपूर्वक स्वागत किया। उनकी कंपनी ने 2024 में भारत का पहला रीयूजेबल हाइब्रिड रॉकेट रूमी1 लॉन्च कर अंतरिक्ष क्षेत्र में नई उपलब्धि दर्ज की।
विज्ञापन
डॉ आनंद मेगालिंगम ने बनाया 800 करोड़ का ब्रांड
- फोटो : अमर उजाला प्रिंट- ग्राफिक्स
विस्तार
24 अगस्त, 2024 का दिन था। तमिलनाडु के थिरुविदंधई में हर नजर आसमान पर टिकी थी। सामने खड़ा था भारत का पहला दोबारा इस्तेमाल होने वाला (रीयूजेबल) हाइब्रिड रॉकेट रुमी-1 और उसके पीछे थी वर्षों की मेहनत, संघर्ष और उम्मीद। लॉन्च का वक्त आ गया। इग्निशन बटन दबाया गया, लेकिन रॉकेट अपनी जगह से टस से मस नहीं हुआ। एक सेकंड... फिर दूसरा... तीसरा... और चौथा सेकंड भी गुजर गया। पूरी टीम की धड़कनें बढ़ने लगीं।
विज्ञापन
फिर, अचानक रुमी-1 ने उड़ान भरी और आसमान की ओर बढ़ गया। इस सफलता के पीछे एक ऐसे व्यक्ति का हाथ था, जिसने संघर्ष को ही अपना मार्गदर्शक बना लिया था। बचपन में वह रोज करीब छह किलोमीटर पैदल चलकर स्कूल जाते थे। कॉलेज के पहले सेमेस्टर में सभी विषयों में फेल भी हुए। लेकिन उन्होंने इसमें भी अपने लिए एक नई मंजिल तलाश ली और एयरोनॉटिकल इंजीनियरिंग की ओर कदम बढ़ाया और धीरे-धीरे उस दुनिया में अपनी जगह बनाई, जहां कभी पहुंचने का सपना भी आसान नहीं था।
विज्ञापन
यह कहानी है डॉ. आनंद मेगालिंगम की, जो अपनी मेहनत, असफलताओं से सीखने और सपनों को हकीकत में बदलने की जिद से उन तमाम लोगों के लिए प्रेरणा हैं, जो किसी एक असफलता के बाद अपनी राह छोड़ने का सोचते हैं।
विज्ञापन
वीजा ने रोका रास्ता, सपना नहीं
कॉलेज के दौरान उनकी टीम का एक रिसर्च पेलोड नासा के क्यूब इन स्पेस कार्यक्रम के लिए चुना गया था और टीम को लॉन्च देखने के लिए अमेरिका जाने का निमंत्रण मिला था। वीजा इंटरव्यू में उनके पिता के पेशे और परिवार की सालाना आय के बारे में सवाल पूछा गया। आनंद ने ईमानदारी से पिता का ट्रैक्टर ड्राइवर होना और सालाना पारिवारिक आय 1.20 लाख रुपये बता दिया। इस वजह से उनका वीजा स्वीकृत नहीं हुआ। करीब एक साल तक जिस प्रोजेक्ट पर उन्होंने मेहनत की थी, उसकी लॉन्चिंग देखने के लिए वे अपनी टीम के साथ अमेरिका नहीं जा सके। इस बात से उन्हें दुख तो हुआ, लेकिन उन्होंने अपने काम को जारी रखा।
23 प्रतिभागियों में बनाई जगह
वक्त का पहिया घूमा, तो हालात भी पूरी तरह बदल गए। जिस अमेरिका ने कभी आर्थिक तंगी के कारण उनका वीजा अस्वीकार कर दिया था, वर्षों बाद उसी देश ने उन्हें एक अंतरराष्ट्रीय नेतृत्व कार्यक्रम के लिए आमंत्रित किया। वह दुनिया के 23 चयनित प्रतिभागियों में जगह बनाने में सफल रहे। इस कार्यक्रम के दौरान उन्हें अमेरिकी अंतरिक्ष क्षेत्र को करीब से समझने और नासा से जुड़े कार्यक्रमों में भाग लेने का अवसर मिला। साथ ही, उन्होंने अमेरिकी अंतरिक्ष एवं एयरोस्पेस क्षेत्र के विशेषज्ञों के साथ काम किया और उनके अनुभवों से सीखने का मौका पाया।
खेल ने दिलाया दूसरा मौका
डॉ. आनंद मेगालिंगम का बचपन तमिलनाडु के एक ग्रामीण, साधारण किसान परिवार में बीता। उनके पिता कंधासामी मेगालिंगम परिवार का खर्च चलाने के लिए ट्रैक्टर चलाने और खेती का काम करते थे। स्कूली शिक्षा के बाद आनंद ने सुरक्षित कॅरिअर की दृष्टि से शुरुआत में कंप्यूटर साइंस/इंजीनियरिंग को चुना, लेकिन इस क्षेत्र में उनका मन न लगा। नतीजतन, कॉलेज के पहले ही सेमेस्टर में वह सभी विषयों में फेल हो गए। इसके बाद उन्होंने पढ़ाई छोड़ दी। फिर, खेलों में उनकी प्रतिभा के चलते उन्हें दोबारा कॉलेज में दाखिला लेने का अवसर मिला। बता दें कि वह कॉलेज स्तर के एक बेहतरीन एथलीट/खिलाड़ी भी थे। इस बार उन्होंने एयरोनॉटिकल इंजीनियरिंग को चुना, जो विमान और अंतरिक्ष तकनीक में उनकी रुचि के अधिक करीब था। इसका असर यह हुआ कि उनका प्रदर्शन पूरी तरह बदल गया और उन्होंने 9.8 सीजीपीए के साथ गोल्ड मेडलिस्ट बनकर स्नातक की उपाधि हासिल की।
पिता के संघर्ष को दिया सम्मान
वर्ष 2021 में डॉ. आनंद की टीम का नाम वर्ल्ड बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में दर्ज हुआ। इसके बाद 2023 में उन्होंने भारत का पहला हाइब्रिड रॉकेट लॉन्च किया, जिसमें सरकारी स्कूलों के विद्यार्थियों के पेलोड शामिल थे। इसके बाद रुमी-1 मिशन के जरिये उन्होंने हाइब्रिड रॉकेट तकनीक और छोटे सैटेलाइट मिशनों के क्षेत्र में एक और महत्वपूर्ण कदम आगे बढ़ाया। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी उन्हें विभिन्न प्रशिक्षण कार्यक्रमों में भाग लेने का अवसर मिला। उनकी एयरोस्पेस स्टार्टअप कंपनी, स्पेस जोन इंडिया, का मार्केट वैल्यूएशन लगभग 800 करोड़ रुपये के आंकड़े को छू चुका है। खास बात यह है कि आनंद ने अपनी कंपनी में किसी बड़े कॉरपोरेट निवेशक के बजाय अपने पिता को पहला डायरेक्टर और को-फाउंडर बनाया। उन्होंने पिता को कंपनी में 50 फीसदी की हिस्सेदारी दी है।
युवाओं को सीख
- जीवन का एक कठिन अध्याय जीवन का सार नहीं होता।
- शुरुआत की असफलता को अंतिम परिणाम न मानें, जरूरत हो, तो अपनी दिशा बदलें।
- सीमित संसाधन सपनों की राह में बाधा हो सकते हैं, लेकिन मेहनत और सीखने की लगन आगे बढ़ने का रास्ता बनाती है।
कमेंट
कमेंट X