मंजिलें और भी हैं: सूखा पीड़ित किसानों के बच्चों की पाठशाला
गांव में रहने और किसान परिवार से होने के कारण मैंने सूखे की वजह से होने वाली किसानों की आत्महत्याओं को बेहद करीब से देखा है। मेरा भी बचपन आर्थिक तंगी में बीता है। मेरा जन्म महाराष्ट्र के मराठवाड़ा इलाके के परभणी जिले में हुआ। मेरे पिता के पास करीब पांच एकड़ जमीन थी, पर सूखे के कारण उससे पर्याप्त आमदनी नहीं हो पाती थी। आर्थिक दिक्कतों की वजह से मैंने दसवीं तक की पढ़ाई गांव से की और आगे की पढ़ाई के लिए परभणी में आकर रहने लगा।
यहां रहकर मैंने कंप्यूटर विज्ञान में परास्नातक किया। पढ़ाई के दौरान अतिरिक्त आय के लिए मैंने होटल और दुकानों में पार्ट टाइम काम भी किया। एक बार मेरे कॉलेज में बाबा आम्टे आए थे, जिनसे मैं प्रभावित हुआ। उसके बाद मैंने झुग्गियों में रहने वाले गरीब बच्चों के लिए अपने जेब खर्च से कॉपी-पेन की व्यवस्था की, और उन्हें प्राथमिक शिक्षा देने लगा। परास्नातक पूरा करने के बाद मेरी नौकरी पुणे की एक सॉफ्टवेयर कंपनी में लग गई। वर्ष 2014-15 में मराठवाड़ा इलाके में जब भयंकर सूखा पड़ा, तो काफी किसान आत्महत्या करने को मजबूर हो गए, जबकि बहुत सारे गांव छोड़कर मेहनत-मजदूरी करने के लिए शहरों में आ गए।
सूखे की चपेट में मेरा गांव भी शामिल था। मुझे यह भी नहीं पता था कि कितने किसान इस सूखे से लड़ सकते हैं। पर मैं उनकी सहायता करना चाहता था। मुझे पता है कि आज जो मेरी बेहतर स्थिति है, वह केवल इसलिए है कि मेरे माता-पिता ने मुझे मुश्किल हालात में भी पढ़ाना नहीं छोड़ा। उस समय मुझे ऐसे किसान परिवारों के बच्चों को शिक्षित करने का विचार आया, जो सूखे की चपेट में थे। मैंने नवंबर 2015 में पुणे में स्नेहवन के नाम से एक संगठन बनाया।
बच्चों के रहने के लिए मेरे एक दोस्त ने अपना घर दिया, जो तब खाली था। मैंने वहां उनके रहने की व्यवस्था की। शुरुआती दौर में आर्थिक मजबूती न होने के कारण मुझे करीब आठ महीने तक अपनी कंपनी में रात को भी काम करना पड़ा, ताकि कुछ धन इकट्ठा हो सके। धीरे-धीरे जब कुछ लोगों को मेरी योजना के बारे में पता चला, तो उन्होंने मदद के लिए हाथ बढ़ाया। वर्ष 2016 में मैंने नौकरी छोड़कर अपना पूरा वक्त ‘स्नेहवन’ को देने का फैसला किया।
इसके बाद मैंने आसपास के छह जिलों से ऐसे बच्चों के बारे में पता किया, जिनके किसान पिता ने आत्महत्या कर ली थी। ये बच्चे स्नेहवन में रहने लगे। इनके रहने, खाने और पढ़ाई का पूरा खर्च मैं उठाता हूं। सभी बच्चे पुणे के ‘समता प्राथमिक माध्यमिक विद्यालय’ में पढ़ते हैं। इन बच्चों की नौकरी लगने तक की पूरी जिम्मेदारी मैंने अपने कंधों पर ली है। जब मैंने इस संगठन को शुरू किया था, तो पहले इसमें सिर्फ आत्महत्या करने वाले किसानों के बच्चों को ही लेने का फैसला लिया, लेकिन लोगों के सुझाव पर मैंने अब कर्ज में डूबे किसानों के बच्चों को भी इसमें लेना शुरू कर दिया है।
इन बच्चों को स्कूली पढ़ाई के अलावा कंप्यूटर, तबला, हारमोनियम, शास्त्रीय संगीत, पेंटिंग के साथ योग की भी ट्रेनिंग दी जाती है। इसके लिए मेरे साथ आठ स्वयंसेवक और शिक्षक हैं, जो इन बच्चों के लिए समय निकालकर आते हैं। बच्चे बेहतर तरीके से पढ़ाई कर सकें, इसके लिए ‘स्नेहवन’ में एक लाइब्रेरी भी बनाई गई है, जहां पर हिंदी, अंग्रेजी और मराठी की किताबें मौजूद हैं। मैं इन बच्चों के व्यक्तित्व विकास पर ध्यान देता हूं। जब मैंने इस काम के लिए नौकरी छोड़ी, तो मेरे माता-पिता ने इसका विरोध किया, लेकिन जब उनको भरोसा हुआ कि मेरा फैसला सही है, तो वे भी इन बच्चों की देखभाल के लिए पुणे आ गए।
(विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।)
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