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सैराट का 'टॉपर' जो बोर्ड परीक्षा में फेल हो गया था, आज लिखी कामयाबी की नई कहानी
बीबीसी हिंदी
Updated Fri, 01 Jun 2018 08:37 PM IST
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नागराज मंजुले
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"वह 1992 का मई या जून महीना था। दसवीं कक्षा की परीक्षा दिए हुए मेरे जैसे कई छात्र रिजल्ट आने का इंतजार कर रहे थे।" 'सैराट' जैसी फिल्म से देशभर में मशहूर हुए नागराज मंजुले ने अपने रिजल्ट के दिनों के बारें में बीबीसी से बात की।
"रिजल्ट आया और पता चला कि मैं फेल हो गया हूं। मेरे सबसे खराब नंबर गणित और अंग्रेजी में आए थे। अंग्रेजी में तो सिर्फ 6 नंबर थे।" "उन दिनों दसवीं कक्षा के रिजल्ट को कुछ ज्यादा ही महत्व दिया जाता था। आजकल करियर के बहुत-से विकल्प खुल चुके हैं।"
"फिर भी मुझे लगता है की रिजल्ट का दिन आज भी छात्रों के लिए उतना ही मायने रखता हैं।" "मुझे गणित विषय में कतई दिलचस्पी नहीं थी। हालांकि गणित नापसंद करने वाला मैं अकेला छात्र नहीं हूं। लेकिन मुझे ये पता था कि गणित का मेरा पेपर बिगड़ेगा।"
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गणित और अंग्रेजी का खौफ
नागराज पढ़ाई के मामले में एकदम सामान्य छात्र थे। लेकिन गणित और अंग्रेजी से उन्हें बहुत डर लगता था। आपके लिए ये हैरानी की बात होगी लेकिन एक से बढ़कर एक मराठी फिल्मों का निर्देशन करने वाले नागराज को मराठी विषय में 100 में से सिर्फ 42 नंबर मिले थे। उन्हें थोड़ा दिलासा दिया था इतिहास-भूगोल और विज्ञान इन विषयों ने।
"दसवीं के इम्तेहान में मुझे गणित विषय में 150 में सिर्फ 32 अंक मिले थे। मेरे मन में गणित का मानो खौफ था।" गणित के अलावा अंग्रेजी से भी उन्हें बिलकुल पंसद नहीं थी। "अंग्रेजी सीखने का क्या फायदा, वो सीखकर क्या मिलने वाला हैं, इस बात की कोई जानकारी नहीं थी और फिर हमारे स्कूलों में भाषा पढ़ाने का तरीका भी तो अजीब हैं।"
रिजल्ट के बाद
नागराज बताते हैं, "जब हम अपनी मातृभाषा बोलना शुरू करते हैं, तो हमें सबसे पहले उस भाषा का ग्रामर नहीं सिखाया जाता।" "व्याकरण का अध्ययन तो बाद में किया जाता हैं। मातृभाषा छोड़कर और भाषाएं सीखते वक्त सबसे पहले ग्रामर से पाला पड़ता हैं।"
"जिसे ग्रामर में दिलचस्पी नहीं हैं, वह तो भाषा सीखने में दिलचस्पी नहीं लेता। बस ऐसा ही कुछ अंग्रेजी के मामले में मेरे साथ हुआ।" नागराज कहते हैं, "दसवीं में मैं दो विषयों में फेल हुआ हूं, इस बात का सबूत मार्कशीट के रूप में हाथ में आने के बाद थोड़ा झटका लगा।"
"दसवीं क्लास में फेल होना उस वक्त मानों पाप था। ऐसा माना जाता था कि फेल हुए मतलब पूरी जिंदगी खत्म।" "पड़ोसी, आसपास के लोग और रिश्तेदार भी कहने लगे कि तेरा अब कुछ नहीं होने वाला।" "मैं भी थोड़ा दुखी हो गया था। मार्क्स कम आएंगे इतना तो पता था, लेकिन फेल होना बहुत बुरा लगा।"
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"रिजल्ट आया और पता चला कि मैं फेल हो गया हूं। मेरे सबसे खराब नंबर गणित और अंग्रेजी में आए थे। अंग्रेजी में तो सिर्फ 6 नंबर थे।" "उन दिनों दसवीं कक्षा के रिजल्ट को कुछ ज्यादा ही महत्व दिया जाता था। आजकल करियर के बहुत-से विकल्प खुल चुके हैं।"
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"फिर भी मुझे लगता है की रिजल्ट का दिन आज भी छात्रों के लिए उतना ही मायने रखता हैं।" "मुझे गणित विषय में कतई दिलचस्पी नहीं थी। हालांकि गणित नापसंद करने वाला मैं अकेला छात्र नहीं हूं। लेकिन मुझे ये पता था कि गणित का मेरा पेपर बिगड़ेगा।"
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गणित और अंग्रेजी का खौफ
नागराज पढ़ाई के मामले में एकदम सामान्य छात्र थे। लेकिन गणित और अंग्रेजी से उन्हें बहुत डर लगता था। आपके लिए ये हैरानी की बात होगी लेकिन एक से बढ़कर एक मराठी फिल्मों का निर्देशन करने वाले नागराज को मराठी विषय में 100 में से सिर्फ 42 नंबर मिले थे। उन्हें थोड़ा दिलासा दिया था इतिहास-भूगोल और विज्ञान इन विषयों ने।
"दसवीं के इम्तेहान में मुझे गणित विषय में 150 में सिर्फ 32 अंक मिले थे। मेरे मन में गणित का मानो खौफ था।" गणित के अलावा अंग्रेजी से भी उन्हें बिलकुल पंसद नहीं थी। "अंग्रेजी सीखने का क्या फायदा, वो सीखकर क्या मिलने वाला हैं, इस बात की कोई जानकारी नहीं थी और फिर हमारे स्कूलों में भाषा पढ़ाने का तरीका भी तो अजीब हैं।"
रिजल्ट के बाद
नागराज बताते हैं, "जब हम अपनी मातृभाषा बोलना शुरू करते हैं, तो हमें सबसे पहले उस भाषा का ग्रामर नहीं सिखाया जाता।" "व्याकरण का अध्ययन तो बाद में किया जाता हैं। मातृभाषा छोड़कर और भाषाएं सीखते वक्त सबसे पहले ग्रामर से पाला पड़ता हैं।"
"जिसे ग्रामर में दिलचस्पी नहीं हैं, वह तो भाषा सीखने में दिलचस्पी नहीं लेता। बस ऐसा ही कुछ अंग्रेजी के मामले में मेरे साथ हुआ।" नागराज कहते हैं, "दसवीं में मैं दो विषयों में फेल हुआ हूं, इस बात का सबूत मार्कशीट के रूप में हाथ में आने के बाद थोड़ा झटका लगा।"
"दसवीं क्लास में फेल होना उस वक्त मानों पाप था। ऐसा माना जाता था कि फेल हुए मतलब पूरी जिंदगी खत्म।" "पड़ोसी, आसपास के लोग और रिश्तेदार भी कहने लगे कि तेरा अब कुछ नहीं होने वाला।" "मैं भी थोड़ा दुखी हो गया था। मार्क्स कम आएंगे इतना तो पता था, लेकिन फेल होना बहुत बुरा लगा।"
फेल होना अच्छा साबित हुआ..
Nagraj Manjule
उस वक्त नागराज के पिता ने उनका साथ दिया। नागराज बताते हैं, "मुझे उस वक्त बहुत हौंसला मिला। दसवीं की परीक्षा जीवन का अंत नहीं, यह बात पिताजी ने मुझे समझाई थी।" "उन्होनें कहा था कि तुम भी अपने जीवन में कामयाबी हासिल करोगे।"
फेल होना मानो नागराज के लिए अच्छा ही साबित हुआ। नागराज बताते हैं, "अगर मैं पास हो जाता, तो आज जो कुछ मैंने हासिल किया है क्या वो कर पाता? ये सवाल अक्सर मैं खुद से पूछता हूं।"
"अपने दोस्तों में मैं अकेला फेल हुआ था। सब दोस्त अपनी-अपनी राह चल दिए और मैं अकेला पड़ गया। इस अकेलेपन ने मुझे सोचने का मौका दिया।" "मैं खूब सोचता था। बहुत किताबें पढ़ता था। शायद उस वक्त ने ही मुझ में एक निर्देशक की नींव डाली।"
जिंदगी सिखाती है...
नागराज कहते हैं कि जो शिक्षा हमें स्कूल नहीं देते, वो जिंदगी देती है। "ऐसा बिल्कुल नहीं है कि पास होकर हम बहुत बड़ा तीर मार लेते हैं और ऐसा भी नहीं है कि फेल होना कोई शर्म की बात है।"
"जिंदगी में खुश रहना अलग बात है। उसका ताल्लुक न तो पास होने से और न ही फेल होने से है।" नागराज के मुताबिक ऐसा नहीं है कि अच्छी जिदगी बिताने के लिए जरूरी चीजें स्कूल में ही सीखने को मिले।
खुद का उदाहरण
"अपना खुदका धंधा शुरू करने का आइडिया स्कूल से नहीं आता। वो हमें तजुर्बे और अपनी बुद्धि से आता है। इसलिए फेल होने से कुछ खत्म नहीं होता।" यह कहते वक्त नागराज खुद का उदाहरण देते हैं।
वो अंत में कहते हैं, "दसवीं कक्षा में दो विषयों में फेल होने के बावजुद भी मैंने अपनी लाइफ की स्टोरी खुद लिखी।" "इस स्टोरी में राष्ट्रीय पुरस्कार जैसे कई अच्छे और खुद पर गर्व महसूस करने वाले पड़ाव भी आए।"
"अगर मुझ जैसा सामान्य व्यक्ति सब हासिल कर सकता हैं, तो आप क्यों नहीं। जो रिजल्ट आया है उसे अपनाओ और अपना सफर शुरू करो।" "कामयाबी की कहानी तो तुम्हें खुद ही लिखनी है।"
फेल होना मानो नागराज के लिए अच्छा ही साबित हुआ। नागराज बताते हैं, "अगर मैं पास हो जाता, तो आज जो कुछ मैंने हासिल किया है क्या वो कर पाता? ये सवाल अक्सर मैं खुद से पूछता हूं।"
"अपने दोस्तों में मैं अकेला फेल हुआ था। सब दोस्त अपनी-अपनी राह चल दिए और मैं अकेला पड़ गया। इस अकेलेपन ने मुझे सोचने का मौका दिया।" "मैं खूब सोचता था। बहुत किताबें पढ़ता था। शायद उस वक्त ने ही मुझ में एक निर्देशक की नींव डाली।"
जिंदगी सिखाती है...
नागराज कहते हैं कि जो शिक्षा हमें स्कूल नहीं देते, वो जिंदगी देती है। "ऐसा बिल्कुल नहीं है कि पास होकर हम बहुत बड़ा तीर मार लेते हैं और ऐसा भी नहीं है कि फेल होना कोई शर्म की बात है।"
"जिंदगी में खुश रहना अलग बात है। उसका ताल्लुक न तो पास होने से और न ही फेल होने से है।" नागराज के मुताबिक ऐसा नहीं है कि अच्छी जिदगी बिताने के लिए जरूरी चीजें स्कूल में ही सीखने को मिले।
खुद का उदाहरण
"अपना खुदका धंधा शुरू करने का आइडिया स्कूल से नहीं आता। वो हमें तजुर्बे और अपनी बुद्धि से आता है। इसलिए फेल होने से कुछ खत्म नहीं होता।" यह कहते वक्त नागराज खुद का उदाहरण देते हैं।
वो अंत में कहते हैं, "दसवीं कक्षा में दो विषयों में फेल होने के बावजुद भी मैंने अपनी लाइफ की स्टोरी खुद लिखी।" "इस स्टोरी में राष्ट्रीय पुरस्कार जैसे कई अच्छे और खुद पर गर्व महसूस करने वाले पड़ाव भी आए।"
"अगर मुझ जैसा सामान्य व्यक्ति सब हासिल कर सकता हैं, तो आप क्यों नहीं। जो रिजल्ट आया है उसे अपनाओ और अपना सफर शुरू करो।" "कामयाबी की कहानी तो तुम्हें खुद ही लिखनी है।"
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