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दिल्ली सरकार की शिक्षा नीति पर केंद्र, दिल्ली सरकार व सीबीएसई से जवाब तलब

Thu, 27 Apr 2017 11:07 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, नई दिल्ली
ब्यूरो/अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Thu, 27 Apr 2017 11:07 AM IST
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 hc asked questions to delhi government center and cbse on education system
CBSE STUDENTS

हाईकोर्ट ने दिल्ली सरकार द्वारा माध्यमिक स्तर पर व्यावसायिक विषयों के संबंध में बनाई नई शिक्षा नीति को चुनौती मुद्दे पर केंद्र, दिल्ली सरकार व सीबीएसई को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है।

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याचिका में तर्क रखा गया है कि इस नीति के तहत यह कोर्स छटे अनिवार्य विषय के रूप में संस्कृत जैसी भाषाओं की जगह होगी। याचिका में दावा किया गया है कि यह फैसला सरकारी स्कूलों पर लागू होगा और इससे उर्दू, संस्कृत और पंजाबी जैसे भाषाओं के विलुप्त होने का खतरा बन गया है।      
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कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश गीता मित्तल व न्यायमूर्ति अनु मल्होत्रा ने तीनों पक्षों को स्पष्ट करने का निर्देश दिया है कि भाषा चुनने के अधिकार को क्यों खत्म किया गया है। अदालत ने मामले की सुनवाई 14 सितंबर तय की है।
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याचिका में सीबीएसई के सर्कुलर को भी चुनौती दी है जिसने राष्ट्रीय कौशल योग्यता फ्रेमवर्क (एनएसक्यूएफ) के तहत नामांकित विद्यालयों के लिए कक्षा 10 के लिए मूल्यांकन की योजना को फिर से तैयार किया है। ऐसे स्कूलों में छात्रों को छटे विषय का अनिवार्य रूप से अध्ययन करना होगा, जो एक व्यावसायिक विषय होगा। यह दो भाषाओं सामाजिक विज्ञान, गणित और विज्ञान के पांच प्रमुख विषयों के साथ होगा।     
 
सीबीएसई ने 10वीं कक्षा में दो स्ट्रीम पेश की है। व्यावसायिक और शैक्षिक शैक्षिक चुनने वालों को पांच विषयों का अध्ययन करना होगा और उनके पास एक अतिरिक्त छठे विषय का चयन करने का विकल्प होगा।

 हालांकि व्यावसायिक विषय को चुनने वालों को एनएसक्यूएफ  के तहत छठे विषय का अनिवार्य रूप से अध्ययन करना होगा। एनएसक्यूएफ 2013 में भारत में अधिसूचित, एक योग्यता-आधारित ढांचा है जो ज्ञान, कौशल और योग्यता के स्तरों के अनुसार सभी योग्यताएं प्रदान करता है।      

याचिकाकर्ता सोसायटी संस्कृत शिक्षा संघ दिल्ली के अनुसार व्यावसायिक विषयों के साथ भाषाओं को स्थानांतरित करने के लिए दिल्ली सरकार का निर्णय शिक्षा के क्षेत्र में राष्ट्रीय नीति के खिलाफ  है। दायर याचिका ने तर्क दिया है कि दिल्ली सरकार की नीति से संस्कृत, पंजाबी और उर्दू भाषाओं और भारतीय संस्कृति को अपूरणीय नुकसान पहुंचेगा।   

   
याचिका में यह भी तर्क दिया गया है कि आने वाली पीढ़ी न केवल संस्कृत या अन्य सांस्कृतिक भाषाओं को नहीं पढ़ पाएगी बल्कि उन्हें संस्कृत और समृद्ध प्राचीन भारतीय संस्कृति का शायद ही कोई ज्ञान रह पाएगा।       

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