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अध्ययन कराकर सिफारिशें लागू कराना भूली सरकारें, 14 साल से धूल फांक रही ग्लेशियरों पर विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट

Mon, 15 Feb 2021 01:08 PM IST
Nirmala Suyal Nirmala Suyal न्यूज डेस्क, अमर उजाला, देहरादून
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, देहरादून Published by: Nirmala Suyal Nirmala Suyal Updated Mon, 15 Feb 2021 01:08 PM IST
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Uttarakhand Chamoli News : 14 year before glacier study done but no action taken
चमोली आपदा - फोटो : अमर उजाला

ग्लेशियरों और झीलों से बाढ़ के खतरे को लेकर की गई सिफारिशें सरकारी तंत्र की अनदेखी की भेंट चढ़ गईं। 14 साल पहले ग्लेशियरों व झीलों पर एक विशेषज्ञ समिति ने अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंपी थी, लेकिन अब तक सत्ता पर काबिज रहीं सभी सरकारों ने इन सिफारिशों को ठंडे बस्ते में डाले रखा।

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चमोली जिले के रैणी गांव की ऋषिगंगा में आई भीषण बाढ़ से हुए जानमाल के भारी नुकसान के बाद शासन ने फिर एक विशेषज्ञ समिति बनाई है। इस समिति की कमान आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के अधिशासी निदेशक पीयूष रौतेला को सौंपी है। संयोग देखिये कि वर्ष 2006 में जो विशेषज्ञ समिति बनी थी, पीयूष रौतेला उसके सदस्य सचिव थे।
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उम्मीद है कि इस कमेटी की रिपोर्ट का हश्र वैसा नहीं होगा, जैसा वर्ष 2006 में ग्लेशियरों के अध्ययन को लेकर गठित विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट के साथ हुआ। ऋषिगंगा की जलप्रलय के बाद 14 साल से सरकारी फाइलों में धूल फांक रही विशेषज्ञ समिति की सिफारिशें प्रासंगिक हो गई हैं।

ऋषिगंगा में आई बाढ़ के बाद नीति नियंताओं से लेकर विशेषज्ञ और विज्ञानी ग्लेशियरों के अध्ययन और निगरानी की जो वकालत कर रहे हैं, ये सारी बातें 14 साल पहले ही कह दी गई थीं। लेकिन सरकारी सिस्टम के दंडकारण्य में खो गईं समिति की सिफारिशों का वनवास तो 14 साल में भी पूरा नहीं हो पाया।

समिति में थे नामी विशेषज्ञ

वर्ष 2006 में तत्कालीन प्रमुख सचिव एनएस नपल्च्याल ने वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियालॉजी के उस समय के अध्यक्ष डॉ. बीआर अरोड़ा की अध्यक्षता में समिति गठित की थी। समिति में कई विशेषज्ञ शामिल थे। 

सिफारिशें जिनसे सरकारों ने मुंह फेर लिया

1. ग्लेशियरों से पैदा होने वाले खतरों से प्रभावित होने की आशंका वाले आबाद गांवों का चिह्नीकरण होना था।
2. ग्लेशियरों के पीछे खिसकने के जल विज्ञान और जलवायु विज्ञान संबंधी आंकड़े तैयार किए जाने थे।
3. इन आंकड़ों के आधार पर आने वाली बाढ़ और ग्लेशियरों से पानी के बहाव की निगरानी होनी थी।
4. प्रदेश में स्थापित होने वालीं जल विद्युत परियोजनाओं के लिए नदियों के उद्गम क्षेत्र में मौसम केंद्र स्थापित होने थे। मौसम संबंधी आंकड़ों का निरंतर विश्लेषण होना था।
5. भागीरथी घाटी की केदार गंगा और केदार बामक के आसपास की ग्लेशियल झीलों व उससे आने वाले पानी पर लगातार निगरानी होनी थी।
6. स्कूल व कॉलेज में ग्लेशियरों से जुड़ीं आपदाओं व दुर्घटनाओं के प्रति बच्चों व स्थानीय लोगों को जागरूक करना था।
7. कक्षा नौ से लेकर 12 तक की पाठ्य पुस्तकों में ग्लेशियरों या अन्य कारणों से आने वालीं आपदाओं की जानकारी की शिक्षा देनी थी।
8. गंगोत्री व सतोपंथ ग्लेशियर में मानव आवाजाही पर रोक हो, इसके लिए पर्यावरण संरक्षण कानून 1986 के प्रावधान की मदद ली जाए।
9. नियमित ग्लेशियल बुलेटिन को ऑडियो या वीडियो मीडिया के जरिये जारी करने कोशिश की जाए।

विशेषज्ञ समिति की दीर्घकालिक सिफारिश

1. ग्लेशियरों व ग्लेशियल झीलों को मानचित्रों के साथ सूचीबद्ध किया जाए, ताकि उनकी पहचान स्पष्ट हो।
2. ग्लेशियरों की स्नो कवर मैपिंग हो और शीत ऋतु में स्नो कवर पैटर्न का आकलन हो।
3. मॉनीटरिंग सिस्टम मजबूत हो। पर्यावरण और बर्फ, ग्लेशियल झीलों, उनके बनने और संभावित बाढ़ की मॉनीटरिंग हो। 
4. बर्फ के गलने और मलबे के भार का आकलन हो।
5. ग्लेशियरों के सिकुड़ने, उनके मास वॉल्यूम में हो रहे बदलाव और स्नोलाइन की मॉनीटरिंग हो, ताकि पर्यावरण की बेहतर समझ पैदा हो सके।
6. ग्लेशियरों की वजह से बांधों, उनके जलाशयों और जल विद्युत परियोजनाओं की सुरक्षा को पैदा होने वाले खतरों का पहले से आंकलन कर लिया जाए।
7. प्रभावी योजना व प्रबंधन के लिए सभी हिमालयी ग्लेशियरों की जानकारी को भौगोलिक सूचना प्रणाली (जीआईएस) से जुटाया जाए।
8. ग्लेशियरों से आने वाली बाढ़ के अध्ययन के लिए विशेषज्ञों के पांच अध्ययन समूह गठित हों।
9. इन समूहों में दूर संवेदी व भौगोलिक सूचना आकलन समूह, ग्लेशियर का मैपिंग समूह, ग्लेशियल निगरानी समूह, जल विज्ञान और अंतरिक्ष विज्ञान समूह, सामाजिक और आर्थिक अध्ययन समूह बनाया जाए।
10. अध्ययन रिपोर्ट लागू करने के लिए सरकार एक कार्ययोजना तैयार करे।

वर्ष 2013 की आपदा के बाद से हिमनदों और झीलों के निरंतर अध्ययन और शोध की बातें हो रही हैं। पूर्व विशेषज्ञों ने कई महत्वपूर्ण सिफारिशें की हैं, लेकिन ये ऋषिगंगा सरीखीं आपदाओं में ही प्रांसगिक होती हैं और फिर इन्हें ठंडे बस्ते में डाल दी जाती हैं। सरकारों को चाहिए कि वे विशेषज्ञों के सुझावों पर अमल करें ताकि आपदाओं की मारकता को कम किया जा सके।
- अनूप नौटियाल, समाजसेवी

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