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उत्तराखंडः बदइंतजामी और लापरवाही की मार

Tue, 02 Jul 2013 10:16 AM IST
देहरादून/ब्यूरो
देहरादून/ब्यूरो Updated Tue, 02 Jul 2013 10:16 AM IST
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carelessness suffers survivors

आपदा के बाद पीड़ित अब बदइंतजामी, सिस्टम की सुस्ती और लापरवाही की मार झेल रहे हैं। राहत पहुंचाने का शोर तो है, पर ज्यादातर जरूरतमंद अब भी इसका इंतजार कर रहे हैं।

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अफरातफरी की स्थिति है। जिलों में अधिकारियों को पता तक नहीं कि कितनी सामग्री आई और कितनी कहां बंटी।

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खुद डिप्टी कलक्टर एसके बरनवाल ने रविवार को संग्राली गांव में राहत सामग्री वितरित कराई। सोमवार को पाटा में राहत सामग्री बांटी गई। ये गांव आपदा प्रभावित नहीं है।
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कितनी राहत सामग्री आई, पता नहीं
उत्तरकाशी के जिला आपदा प्रबंधन अधिकारी देवेंद्र पटवाल ने कहा कि राहत सामग्री के बारे में मुझे नहीं पता, सीडीओ से बात करें। सीडीओ ललित मोहन रयाल ने जिला सेवायोजन अधिकारी और जिला कार्यक्रम अधिकारी का नंबर दिया। जिला कार्यक्रम अधिकारी मुकुल चौधरी ने बताया कि अब तक 45 यूटिलिटी और ट्रक पहुंचे।

शेष ट्रकों की जानकारी पूर्ति विभाग के पास होगी। जिला पूर्ति अधिकारी केएस बिष्ट ने भी पूर्ति निरीक्षक राजेश्वर जगूड़ी का फोन नंबर थमा दिया, लेकिन वे भी कोई जानकारी नहीं दे पाए। लेकिन अमर उजाला को मिली जानकारी के मुताबिक अब तक डेढ़ सौ ट्रक यहां पहुंच चुके हैं।

राहत के नाम पर मजाक
केंद्र सरकार ने उत्तराखंड के लिए 5 हजार किलोलीटर मिट्टी का तेल बिना सब्सिडी वाला भेजा है। आपदा पीड़ितों को मिट्टी का तेल 55 रुपये प्रति लीटर खरीदना होगा। लेकिन आपदा पीड़ित इतना महंगा मिट्टी तेल कहां से खरीदें।

जख्मों पर नमक
अलकनंदा नदी के उफान से अपना घरबार खो देने के बाद लोग दाने-दाने के मोहताज हैं। लेकिन प्रशासन की बेरुखी देखें। तहसील प्रशासन ने आपदा प्रभावित लामबगड़, बेनाकुली के ग्रामीणों को मुआवजा और राहत सामग्री देने के लिए 15 किमी दूर जोशीमठ बुला दिया। मरता क्या न करता।

पीड़ित ग्रामीण सुबह ही जंगल के रास्ते जोशीमठ पहुंचे। लेकिन शाम तक ग्रामीणों को राहत सामग्री नहीं दी गई। ग्रामीण जोशीमठ में ही रात गुजारने को मजबूर हुए।

कैबिनेट ने दी राहत

राज्य मंत्रिमंडल की सोमवार को हुई बैठक में राहत के मानकों और प्रावधानों को शिथिल किया गया। राज्य सरकार ने मुख्यमंत्री राहत कोष से दायरे के बाहर के कई वर्गों को भी आपदा राहत देने का फैसला किया। इससे ढाबे, चाय वाले, छोटे व्यापारी, विद्यार्थी से लेकर गन्ना किसानों तक को मुआवजा मिल सकेगा।

आपदा पीड़ितों को मुफ्त राशन

-जो गांव पूरी तरह कट चुके हैं, वहां एक माह तक मुफ्त 15 किलो चावल, 15 किलो आटा, पांच किलो दाल, तीन किलो चीनी, एक लीटर सरसो/रिफाइंड तेल, मसाले, नमक, माचिस एवं 10 लीटर केरोसिन (सब मिलाकर एक पैकेट सामग्री)। पांच सदस्यों के परिवार को एक पैकेट, ज्यादा पर दो पैकेट मिलेगा

-प्रदेश का नियोजित विकास और पुनर्निर्माण को उत्तराखंड पुननिर्माण और पुनर्वास प्राधिकरण बनेगा

-निजी खेतों में आए नदी के मलबे को निकालने और उसे बेचने की अगले तीन महीने के लिए भी छूट
-आपदा प्रभावित क्षेत्रों में एक जून 2013 से 31 मार्च 2014 तक पेयजल और बिजली मुफ्त
-इंटरमीडिएट तक के छात्रों को 500 रुपये और आईटीआई, पॉलीटेक्निक अथवा इंटर से आगे की कक्षाओं के विद्यार्थियों को एक हजार रुपये एक बार बतौर क्षतिपूर्ति

-आपदा में अनाथ हो चुके बच्चों का लालन-पालन और पढ़ाई आदि सरकार के खर्च परव्यवसायी-किसानों को भी राहत
-साधारण ढाबे-व्यापारी संस्थान को न्यूनतम 50 हजार और अधिकतम एक लाख रुपये राहत राशि, पूरी तरह से क्षतिग्रस्त होटल को दो लाख रुपया

-दो से 10 लाख रुपये तक की क्षति पर 30 प्रतिशत, 10 से 20 लाख की क्षति होने पर 20 प्रतिशत और 20 लाख रुपये से अधिक की क्षति पर 10 प्रतिशत क्षतिपूर्ति
-सदाबहार फसलों की तुलना में गन्ना की फसल क्षतिग्रस्त होने पर 50 प्रतिशत अधिक क्षतिपूर्ति

पीएमजीएसवाई में और मिलेगी मदद
आपदा के चलते मुख्य मार्गों से पूरी तरह कट गए गांवों में संपर्क मार्गों के नवनिर्माण और पुनर्निर्माण को प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना (पीएमजीएसवाई) के तहत केंद्र सरकार और मदद देने को तैयार है। मनरेगा और इंदिरा आवास योजना में भी प्रदेश सरकार को अतिरिक्त सहायता मिलेगी।

बाहर से आए डाक्टर जाने लगे
विनाशकारी प्रलय के शिकार गांवों में घायलों और बीमारों का सहारा बस भगवान ही रह गया है। डाक्टरों के करीब 50 फीसदी पद पहले से ही खाली चल रहे हैं, अब दूसरे राज्यों और अस्पतालों से आए चिकित्सक दल लौटने लगे हैं, जिससे दिक्कतें और बढ़ जाएंगी।

असल चुनौती जलप्रलय की चपेट में आए चार जनपदों में मुख्यधारा से कटे 165 गांवों तक डाक्टरों को पहुंचाने की है।

इनसे निपटना नहीं आसान
-सड़कों से कटे डेढ़ सौ गांवों तक डाक्टर पहुंचाना
-लगभग ढाई सौ अतिरिक्त डाक्टरों की है जरूरत
-108 सेवा को प्रभावित क्षेत्रों में संचालित करना
-गांवों में वाटर क्लोरीनेशन एवं ब्लीचिंग करवाना
-विशेषज्ञ इलाज की सुविधा के लिए उपकरण व अस्पताल
-संक्रामक रोगों के लिए डिजीज सर्विलांस प्रोग्राम चलाना
-क्षतिग्रस्त स्वास्थ्य केंद्रों को किसी तरह चालू करना

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