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फैसला आने पर भी कुनाऊं को न्याय का इंतजार
Dehradun
Updated Mon, 08 Jul 2013 05:31 AM IST
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ऋषिकेश। अनुसूचित जनजाति एवं अन्य परंपरागत वनवासी एक्ट वनाधिकार अधिनियम-2006 कानून के लागू होने के चार साल बाद बीते वर्ष 2012 में बामुश्किल एक गांव के दावों का जिलास्तरीय समिति के माध्यम से निस्तारण किया गया था। इसके बावजूद ग्रामीणों को सात महीने बाद भी न तो भूमि पर मालिकाना हक मिल पाया है और न ही मूलभूत सुविधाओं की ही बहाली हो पाई है।
2008 में संपूर्ण देश में लागू वनाधिकार कानून के तहत राज्य के पौड़ी जिले के अंतर्गत पड़ने वाले कुनाऊं गांव में लगभग डेढ़ सदी से रह रहे करीब सौ परिवारों ने वर्ष 2011 में ग्रामस्तरीय समिति से दावों का निस्तारण कराकर उपखंड स्तरीय समिति कोटद्वार को भेजा गया था। जिनमें से संपूर्ण दस्तावेजों के साथ पेश किए गए 48 दावों को परीक्षण के उपरांत सितंबर-11 में जिलास्तरीय समिति को भेजा गया था। जिलाधिकारी पौड़ी की अध्यक्षता में गठित जिला स्तरीय वन अधिकार समिति द्वारा वनभूमि पर कुनाऊं गोठ के ग्रामीणों के दावों का परीक्षण कराकर सभी 48 दावों का 06 दिसंबर-2012 को सामूहिक रूप से निस्तारण किया गया था। इसमें 1975 में वर्णित 36 परिवारों को आवंटित पट्टों (7.383 हेक्टेयर भूमि) को आधार माना गया है।
राज्य में वनाधिकार कानून के तहत किए गए तमाम दावों में से यह पहले गांव का मामला भी है। बावजूद इसके सात महीने बीत जाने के बाद भी संबंधित मामले में नोडल एजेंसी जनजाति कल्याण विभाग समाज कल्याण विभाग और राजस्व विभाग ग्रामीणाें को दावों के लिहाज से भूमि का मालिकाना हक नहीं दे पाया है। महीनों बीत जाने के बाद भी कुनाऊं के ग्रामीणों को बिजली, पानी, सड़क, चिकित्सा जैसी मूलभूत सुविधा भी उपलब्ध नहीं हो पाई है।
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निर्णय में क्या हैं खामियां
वनाधिकार कानून के तहत गांव के 48 व्यक्तियों द्वारा व्यक्तिगत प्रारूप पर आवेदन (दावा) किया गया था, जबकि जिला स्तरीय वन अधिकार समिति द्वारा दावों का निस्तारण सामूहिक रूप से किया गया।
दावों का निस्तारण कानून के उपाबंध-2 (नियम 8 (ज)) के अंतर्गत भूमि का पट्टा विवाहित होने की स्थिति पति-पत्नी के नाम पर होना था।
आवंटित भूमि अधिनियम के अध्याय-3 के नियम 4 (3) के अनुसार 13 दिसंबर-2005 से पूर्व वनभूमि अधिभोग के अनुरूप हो।
निर्णय के तहत 1975 में वर्णित 36 परिवारों को आवंटित पट्टों पर उक्त परिवारों के आश्रितों को पट्टा निर्गत करने के समय में प्राप्त अधिकारों के उपभोग की स्वीकृति प्रदान की गई है (अर्थात आवंटित पट्टों की लीज बढ़ाई गई है।) न कि वनाधिकार अधिनियम 2006 के तहत वनभूमि पर रहने वाले लोगों को मालिकाना हक दिया गया है। (खास बात यह भी है कि नेशनल पार्क क्षेत्र में राजस्व विभाग/जिलाधिकारी को पट्टा की अवधि बढ़ाए जाने का अधिकार प्राप्त ही नहीं है।)
क्या कहता है कानून
अनुसूचित जनजाति एवं अन्य परंपरागत वनवासी एक्ट वनाधिकार अधिनियम 2006 कानून को एक जनवरी 2008 को पूरे देश में लागू किया गया था। जिसके तहत तीन पीढ़ी अथवा 75 वर्ष तक किसी वनभूमि पर रहने वाले व्यक्ति/परिवार को मालिकाना हक देने का प्रावधान है। साथ ही मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराया जाना अनिवार्य है। उक्त कानून को नेशनल पार्क और सेंचुरियों के भीतर भी प्रभावी माना गया है।
कुनाऊं गांव के लोगों के दावों का निस्तारण करा लिया गया है। उक्त क्षेत्र को राजाजी पार्क क्षेत्र से बाहर करने की सिफारिश का प्रस्ताव शासन को भेज दिया गया है, जिसमें 1975 में आवंटित पट्टाधारियों को ही शामिल किया गया है। शासन स्तर से निर्णय होने पर इस क्षेत्र में सभी सुविधाएं बहाल हो पाएंगी। इसके बाद नेशनल पार्क जंगली जानवरों से ग्रामीणों के बचाव के लिए सुरक्षात्मक उपाय करेगा।
चंद्रेश कुमार यादव, जिलाधिकारी पौड़ी
वनाधिकार कानून के तहत कुनाऊं गांव के ग्रामीणों के दावों का निस्तारण बीते दिसंबर माह में करा लिया गया है। इसके बाद हक-हकूकधारियों को भूमि पर अधिकार और सुविधाएं आदि मामलों का निस्तारण राजस्व विभाग के स्तर से किया जाना है। संभवत: यह प्रक्रिया चल रही है।
एनके शर्मा, डिप्टी डायरेक्टर समाज कल्याण विभाग/ तत्कालीन नोडल अधिकारी
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2008 में संपूर्ण देश में लागू वनाधिकार कानून के तहत राज्य के पौड़ी जिले के अंतर्गत पड़ने वाले कुनाऊं गांव में लगभग डेढ़ सदी से रह रहे करीब सौ परिवारों ने वर्ष 2011 में ग्रामस्तरीय समिति से दावों का निस्तारण कराकर उपखंड स्तरीय समिति कोटद्वार को भेजा गया था। जिनमें से संपूर्ण दस्तावेजों के साथ पेश किए गए 48 दावों को परीक्षण के उपरांत सितंबर-11 में जिलास्तरीय समिति को भेजा गया था। जिलाधिकारी पौड़ी की अध्यक्षता में गठित जिला स्तरीय वन अधिकार समिति द्वारा वनभूमि पर कुनाऊं गोठ के ग्रामीणों के दावों का परीक्षण कराकर सभी 48 दावों का 06 दिसंबर-2012 को सामूहिक रूप से निस्तारण किया गया था। इसमें 1975 में वर्णित 36 परिवारों को आवंटित पट्टों (7.383 हेक्टेयर भूमि) को आधार माना गया है।
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राज्य में वनाधिकार कानून के तहत किए गए तमाम दावों में से यह पहले गांव का मामला भी है। बावजूद इसके सात महीने बीत जाने के बाद भी संबंधित मामले में नोडल एजेंसी जनजाति कल्याण विभाग समाज कल्याण विभाग और राजस्व विभाग ग्रामीणाें को दावों के लिहाज से भूमि का मालिकाना हक नहीं दे पाया है। महीनों बीत जाने के बाद भी कुनाऊं के ग्रामीणों को बिजली, पानी, सड़क, चिकित्सा जैसी मूलभूत सुविधा भी उपलब्ध नहीं हो पाई है।
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निर्णय में क्या हैं खामियां
वनाधिकार कानून के तहत गांव के 48 व्यक्तियों द्वारा व्यक्तिगत प्रारूप पर आवेदन (दावा) किया गया था, जबकि जिला स्तरीय वन अधिकार समिति द्वारा दावों का निस्तारण सामूहिक रूप से किया गया।
दावों का निस्तारण कानून के उपाबंध-2 (नियम 8 (ज)) के अंतर्गत भूमि का पट्टा विवाहित होने की स्थिति पति-पत्नी के नाम पर होना था।
आवंटित भूमि अधिनियम के अध्याय-3 के नियम 4 (3) के अनुसार 13 दिसंबर-2005 से पूर्व वनभूमि अधिभोग के अनुरूप हो।
निर्णय के तहत 1975 में वर्णित 36 परिवारों को आवंटित पट्टों पर उक्त परिवारों के आश्रितों को पट्टा निर्गत करने के समय में प्राप्त अधिकारों के उपभोग की स्वीकृति प्रदान की गई है (अर्थात आवंटित पट्टों की लीज बढ़ाई गई है।) न कि वनाधिकार अधिनियम 2006 के तहत वनभूमि पर रहने वाले लोगों को मालिकाना हक दिया गया है। (खास बात यह भी है कि नेशनल पार्क क्षेत्र में राजस्व विभाग/जिलाधिकारी को पट्टा की अवधि बढ़ाए जाने का अधिकार प्राप्त ही नहीं है।)
क्या कहता है कानून
अनुसूचित जनजाति एवं अन्य परंपरागत वनवासी एक्ट वनाधिकार अधिनियम 2006 कानून को एक जनवरी 2008 को पूरे देश में लागू किया गया था। जिसके तहत तीन पीढ़ी अथवा 75 वर्ष तक किसी वनभूमि पर रहने वाले व्यक्ति/परिवार को मालिकाना हक देने का प्रावधान है। साथ ही मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराया जाना अनिवार्य है। उक्त कानून को नेशनल पार्क और सेंचुरियों के भीतर भी प्रभावी माना गया है।
कुनाऊं गांव के लोगों के दावों का निस्तारण करा लिया गया है। उक्त क्षेत्र को राजाजी पार्क क्षेत्र से बाहर करने की सिफारिश का प्रस्ताव शासन को भेज दिया गया है, जिसमें 1975 में आवंटित पट्टाधारियों को ही शामिल किया गया है। शासन स्तर से निर्णय होने पर इस क्षेत्र में सभी सुविधाएं बहाल हो पाएंगी। इसके बाद नेशनल पार्क जंगली जानवरों से ग्रामीणों के बचाव के लिए सुरक्षात्मक उपाय करेगा।
चंद्रेश कुमार यादव, जिलाधिकारी पौड़ी
वनाधिकार कानून के तहत कुनाऊं गांव के ग्रामीणों के दावों का निस्तारण बीते दिसंबर माह में करा लिया गया है। इसके बाद हक-हकूकधारियों को भूमि पर अधिकार और सुविधाएं आदि मामलों का निस्तारण राजस्व विभाग के स्तर से किया जाना है। संभवत: यह प्रक्रिया चल रही है।
एनके शर्मा, डिप्टी डायरेक्टर समाज कल्याण विभाग/ तत्कालीन नोडल अधिकारी