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दून पहुंचे तो लगा मिली नई जिंदगी
Dehradun
Updated Thu, 20 Jun 2013 05:30 AM IST
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देहरादून। सेना के सहयोग से बारिश से आपदाग्रस्त पहाड़ी क्षेत्रों में राहत और बचाव कार्य शुरू हुआ तो बुधवार को चारधाम यात्रा में जगह-जगह फंसे श्रद्धालु दून पहुंचने लगे हैं। यहां पहुंचे श्रद्धालुओं के चेहरे पर डर, आंखों में आंसू और आपदा का भयावह मंजर साफ दिखाई दे रहा था। आपदास्थल से निकलकर लोगों ने चॉपर से दून की धरती पर कदम रखे तो उन्हें नई जिंदगी मिलने जैसा सुकून मिला।
महाराष्ट्र के एक ही परिवार से 48 लोग आपदा के दौरान थराली में दो दिन फंसे रहे। संपर्क नहीं होने पर परिजन महाराष्ट्र से दून पहुंचे। अपने यहां के मुख्यमंत्री से गुहार लगाई तब जाकर अपनों का पता लगा। इस परिवार के आधे सदस्य बुधवार को चॉपर से दून पहुंच गए थे, आधे हर्षिल में फंसे हैं।
आपदा में फंसे भलपुर, उड़ीसा के 19 लोगों का भी पता नहीं है। इनके संबंधी प्रमोद राठी और प्रदीप राठी बुधवार को दिनभर हेलीपैड पर अपनों की खबर मिलने का इंतजार करते रहे। 17 जून को शाम साढ़े छह बजे केदारनाथ में आखिरी बार उनकी परिजनों से बात हुई थी।
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आंखों के आगे बह रही थी मौत
सुमित बंसल, गोदिया (महाराष्ट्र) : परिवार और रिश्तेदारी से 48 लोग चारधाम यात्रा के लिए आए थे। गांगोत्री से 16 जून को वापस आते वक्त रात में मौसम बेहद खराब होने पर हम सभी थराली रुक गए। ठहरे हुए कुछ देर हुई थी कि आपदा का भयावह मंजर पेश आया। पानी के साथ मलबा, पत्थर बह रहे थे। होटल में पानी से पहली मंजिल डूब गई। आपदा का हवाला देते हुए होटल से बाहर निकाल दिया गया। पहाड़ी पर बैठे-बैठे रात गुजारी। दो दिन परेशान बैठे रहे। इसके बाद सेना की मदद से हर्षिल तक पहुंचे।
साक्षी बंसल, गोदिया (महाराष्ट्र): आपदा के वक्त होटल से निकाले जाने पर ढाई वर्ष के बेटे दिव्यम और आठ माह की बेटी कृतिका को सीने से दबाए रातभर पहाड़ी के ऊंचे हिस्से पर बैठे रहे। खाने-पीने के लिए कुछ नहीं था। बिस्किट के सहारे दो दिन गुजारे। मंगलवार को सेना की मदद से तीन किलोमीटर पैदल चलने के बाद कैंप पहुंचे तो लगा कि जिंदगी वापस आ गई है। इस परिवार के चेहरे पर आपदा का इतना डर था कि चॉपर से उतरते ही एक-दूसरे के सीने से लगकर खूब रोये।
रिगल सिंघल, दिल्ली: गंगोत्री से पहुंचे, सहस्रधारा हेलीपैड उतरे दिल्ली के रिगल और साथ में मौजूद परिवार की आंखों में आपदा का मंजर पसरा था। परिवार का कहना है कि वहां सैकड़ों लोगों की मौत हो गई है। राहत के लिए केवल सेना की मदद मिल रही है। जो लोग सेना के कैंपों में पहुंच गए हैं, वह सुरक्षित हैं। जबकि सैकड़ों लोगों का पता नहीं है। घोड़ों और खच्चरों के भी शव दिखाई दे रहे हैं।
बीरत्मा, हैदराबाद (आंध्रप्रदेश): पहाड़ पर हालात बहुत बुरे हो गए हैं। दो दिन तक हर तरफ मौत जैसा मंजर था। पल-पल आंख के सामने बहता मलबा और पत्थर डरा रहे थे।
23 लाख चुकाकर पहुंचे दून
हर्षिल से दून पहुंचे 48 सदस्यीय अग्रवाल परिवार ने यहां आने के लिए निजी चॉपर कंपनी को 23 लाख रुपये चुकाए हैं। आपदा के नाम पर ट्रांसपोर्ट जैसी सुविधाओं को उन्होंने शून्य बताया। बोले कि अगर पैसे नहीं चुकाते तो उन्हें हर्षिल में ही कई दिनों तक रहना पड़ता।
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महाराष्ट्र के एक ही परिवार से 48 लोग आपदा के दौरान थराली में दो दिन फंसे रहे। संपर्क नहीं होने पर परिजन महाराष्ट्र से दून पहुंचे। अपने यहां के मुख्यमंत्री से गुहार लगाई तब जाकर अपनों का पता लगा। इस परिवार के आधे सदस्य बुधवार को चॉपर से दून पहुंच गए थे, आधे हर्षिल में फंसे हैं।
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आपदा में फंसे भलपुर, उड़ीसा के 19 लोगों का भी पता नहीं है। इनके संबंधी प्रमोद राठी और प्रदीप राठी बुधवार को दिनभर हेलीपैड पर अपनों की खबर मिलने का इंतजार करते रहे। 17 जून को शाम साढ़े छह बजे केदारनाथ में आखिरी बार उनकी परिजनों से बात हुई थी।
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आंखों के आगे बह रही थी मौत
सुमित बंसल, गोदिया (महाराष्ट्र) : परिवार और रिश्तेदारी से 48 लोग चारधाम यात्रा के लिए आए थे। गांगोत्री से 16 जून को वापस आते वक्त रात में मौसम बेहद खराब होने पर हम सभी थराली रुक गए। ठहरे हुए कुछ देर हुई थी कि आपदा का भयावह मंजर पेश आया। पानी के साथ मलबा, पत्थर बह रहे थे। होटल में पानी से पहली मंजिल डूब गई। आपदा का हवाला देते हुए होटल से बाहर निकाल दिया गया। पहाड़ी पर बैठे-बैठे रात गुजारी। दो दिन परेशान बैठे रहे। इसके बाद सेना की मदद से हर्षिल तक पहुंचे।
साक्षी बंसल, गोदिया (महाराष्ट्र): आपदा के वक्त होटल से निकाले जाने पर ढाई वर्ष के बेटे दिव्यम और आठ माह की बेटी कृतिका को सीने से दबाए रातभर पहाड़ी के ऊंचे हिस्से पर बैठे रहे। खाने-पीने के लिए कुछ नहीं था। बिस्किट के सहारे दो दिन गुजारे। मंगलवार को सेना की मदद से तीन किलोमीटर पैदल चलने के बाद कैंप पहुंचे तो लगा कि जिंदगी वापस आ गई है। इस परिवार के चेहरे पर आपदा का इतना डर था कि चॉपर से उतरते ही एक-दूसरे के सीने से लगकर खूब रोये।
रिगल सिंघल, दिल्ली: गंगोत्री से पहुंचे, सहस्रधारा हेलीपैड उतरे दिल्ली के रिगल और साथ में मौजूद परिवार की आंखों में आपदा का मंजर पसरा था। परिवार का कहना है कि वहां सैकड़ों लोगों की मौत हो गई है। राहत के लिए केवल सेना की मदद मिल रही है। जो लोग सेना के कैंपों में पहुंच गए हैं, वह सुरक्षित हैं। जबकि सैकड़ों लोगों का पता नहीं है। घोड़ों और खच्चरों के भी शव दिखाई दे रहे हैं।
बीरत्मा, हैदराबाद (आंध्रप्रदेश): पहाड़ पर हालात बहुत बुरे हो गए हैं। दो दिन तक हर तरफ मौत जैसा मंजर था। पल-पल आंख के सामने बहता मलबा और पत्थर डरा रहे थे।
23 लाख चुकाकर पहुंचे दून
हर्षिल से दून पहुंचे 48 सदस्यीय अग्रवाल परिवार ने यहां आने के लिए निजी चॉपर कंपनी को 23 लाख रुपये चुकाए हैं। आपदा के नाम पर ट्रांसपोर्ट जैसी सुविधाओं को उन्होंने शून्य बताया। बोले कि अगर पैसे नहीं चुकाते तो उन्हें हर्षिल में ही कई दिनों तक रहना पड़ता।