WI Inning
173/3 (13.4 ov)
Target: 250
Sherfane Rutherford 79(34)*
Shai Hope 63 (32)
WI need 77 runs in 38 remaining balls
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पसली में चोट के बावजूद तीन माह खेलते रहे सचिन तेंदुलकर, सांस लेने में होती थी परेशानी
ब्यूरो/अमर उजाला, नई दिल्ली
Updated Sat, 08 Oct 2016 02:15 AM IST
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सचिन तेंदुलकर
- फोटो : ..
क्रिकेट की दुनिया में दो दशक से ज्यादा समय तक राज करने वाले मास्टर ब्लास्टर सचिन तेंदुलकर का कहना है कि आपको अपनी कमजोरियों को विपक्षी टीम पर जाहिर नहीं करना चाहिए। उन्होंने यहां मैराथन के लिए आयोजित एक कार्यक्रम में कहा कि आप अपनी कमजोरियों को उजागर नहीं कर सकते।
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एक बार मुझे पसली में तेज गेंद लगी। गेंदबाज मुझे घूर रहा था और मैं गेंदबाज को घूर रहा था। दर्द इतना था कि मैं सांस भी नहीं ले पा रहा था लेकिन मैंने इसकी भनक तक विपक्षी गेंदबाज को नहीं लगने दी। तीन माह बाद मुझे स्कैन से पता लगा कि मेरी पसली में चोट लगी थी।
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सचिन ने कहा कि मैंने कभी विरोधी को यह अहसास नहीं होने दिया कि मैं थका हुआ हूं। कभी हार नहीं माननी चाहिए। अगर आपने अपने प्रतिद्वंद्वी को अपनी कमजोरी का अहसास करा दिया तो वह उसको भुनाने की कोशिश करेगा।
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रनिंग का फिटनेस पर बड़ा सकारात्मक असर रहा
सचिन तेंदुलकर
- फोटो : getty
सचिन ने कहा कि रनिंग का मेरी फिटनेस पर बड़ा सकारात्मक असर रहा। मैदान पर क्षेत्ररक्षण करते समय भी मैं चहल-कदमी करता रहता था। विकेटों के बीच की दौड़ के बारे में कहा कि सिर्फ गति की बात नहीं इसमें दौड़ना और वापस मुड़ना भी महत्वपूर्ण होता है।
सचिन ने कहा कि आजकल फिटनेस को लेकर जागरूकता बढ़ी है। आज ट्रेनिंग के विभिन्न तरीके आ गए हैं। यह समय की जरूरत है। भारतीय टीम दुनिया की श्रेष्ठ टीमों में से है। ऐसा नब्बे के दशक में नहीं था। ढांचागत सुविधाएं बढ़ी हैं। आज खिलाड़ी फील्डिंग के समय डाइव लगाना सीख गए हैं। खिलाड़ियों को यह भी पता कि क्या खाना चाहिए और कब खाना चाहिए।
मास्टर ब्लास्टर ने यह भी सलाह दी कि चुनौतियों और मुश्किलों से कभी घबराना नहीं चाहिए। मैं मैदान पर ज्यादा से ज्यादा समय बिताना चाहता था। मैं मैदान पर बारह घंटे तक ट्रेनिंग और खेल में समय बिताता था। यह रूटीन बन गया था।
सचिन ने कहा कि आजकल फिटनेस को लेकर जागरूकता बढ़ी है। आज ट्रेनिंग के विभिन्न तरीके आ गए हैं। यह समय की जरूरत है। भारतीय टीम दुनिया की श्रेष्ठ टीमों में से है। ऐसा नब्बे के दशक में नहीं था। ढांचागत सुविधाएं बढ़ी हैं। आज खिलाड़ी फील्डिंग के समय डाइव लगाना सीख गए हैं। खिलाड़ियों को यह भी पता कि क्या खाना चाहिए और कब खाना चाहिए।
मास्टर ब्लास्टर ने यह भी सलाह दी कि चुनौतियों और मुश्किलों से कभी घबराना नहीं चाहिए। मैं मैदान पर ज्यादा से ज्यादा समय बिताना चाहता था। मैं मैदान पर बारह घंटे तक ट्रेनिंग और खेल में समय बिताता था। यह रूटीन बन गया था।