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वह धर्मनिरपेक्षता अब कहां है

Wed, 27 Apr 2016 08:41 PM IST
तस्लीमा नसरीन
तस्लीमा नसरीन Updated Wed, 27 Apr 2016 08:41 PM IST
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Where is that secularism
तस्लीमा नसरीन

धर्मनिरपेक्ष देश का क्या कोई धर्म होता है? इसका उत्तर हम सब जानते हैं कि नहीं होता। बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना ने किस आधार पर अपने देश को एक सेक्यूलर देश बताया है, यह मैं नहीं जानती। धर्म के आधार पर कानून होने के बावजूद बांग्लादेश को धर्मनिरपेक्ष कहने का कोई तुक नहीं है। बांग्लादेश में विवाह, तलाक, उत्तराधिकार आदि पारिवारिक कानून अब भी धर्म पर आधारित ही हैं। मैं उम्मीद करती हूं कि बांग्लादेश जैसे एक इस्लामी राष्ट्र को सेक्लूयर बताकर प्रधानमंत्री अपनी हंसी नहीं उड़ाएंगी। वर्ष 2011 में बांग्लादेश की सरकार से वहां की सर्वोच्च अदालत ने जानना चाहा था कि संविधान के आठवें संशोधन को, जिसके जरिये बांग्लादेश के राष्ट्रधर्म को इस्लामी घोषित किया गया है, क्यों न गैरकानूनी घोषित कर दिया जाए। पर अफसोस, अब ऐसी स्थिति नहीं है।

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बांग्लादेश के नब्बे फीसदी लोगों का धर्म इस्लाम है। राष्ट्र का कोई धर्म न होने पर भी वहां के नब्बे प्रतिशत मुस्लिमों का धर्म इस्लाम ही होगा। लेकिन बेहद आत्मविश्वासहीन और दुर्बल चित्त होने पर ही मनुष्य राष्ट्र को अपना धर्म अपनाने के लिए कहता है।
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याद है, बांग्लादेश के राष्ट्रधर्म की शुरुआत कैसे हुई थी? राष्ट्रपति मोहम्मद इरशाद को पद से हटाने के लिए जनता तब सड़कों पर उतर आई थी। उस दबाव को इरशाद ने आध्यात्मिक तरीके से खत्म करने की चाल चली। किसी से कोई बात किए बगैर अचानक इरशाद ने संविधान में एक नई चीज घुसा दी। उसका नाम था राष्ट्रधर्म। तब क्या किसी ने मांग की थी कि इस्लाम को राष्ट्रधर्म बनाया जाए? जहां तक मुझे मालूम है, किसी ने ऐसी मांग नहीं की थी। क्या बांग्लादेश में मुस्लिमों को अपने धार्मिक क्रियाकलापों में समस्या आ रही थी कि राष्ट्रधर्म की जरूरत पड़ी? राष्ट्र को क्या वाकई धर्म की जरूरत पड़ती है? मनुष्य को धर्म की जरूरत पड़ती है, लेकिन राष्ट्र तो मनुष्यों का होता है। राष्ट्र तो सभी संस्कृतियों के लोगों को सुरक्षा देने के लिए है। राष्ट्र अगर निरपेक्ष न हो, राष्ट्र अगर कई संप्रदायों में से किसी एक संप्रदाय का पक्ष ले, तो उस राष्ट्र के मनुष्यों में क्षोभ पैदा होना स्वाभाविक है।
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वर्ष 1971 में बंगाली मुस्लिमों ने शोषक गैरबंगाली मुस्लिमों के खिलाफ लड़ाई लड़कर साबित कर दिया था कि मुस्लिम होना ही एकजुट होकर रहने की गारंटी नहीं है। वर्ष 1971 में बंगालियों ने यह भी प्रमाणित कर दिया कि द्विराष्ट्रवाद के आधार पर भारत का विभाजन एक गलत सिद्धांत था। इकहत्तर में आजादी के आंदोलन में कूद पड़े बंगालियों का स्वप्न था कि वे गैरबंगाली मुस्लिमों को भगाकर बांग्ला भाषा और संस्कृति के आधार पर बांग्ला नाम से एक नया देश बनाएंगे। नौ महीने चले युद्ध के बाद एक स्वाधीन देश बना। शेख मुजीबुर रहमान ने उस देश को दिशा देनी भी शुरू की। उनकी असंख्य गलतियां रही हो सकती हैं, राजनेता के तौर पर अत्यंत जनप्रिय होने के बावजूद राष्ट्र को दिशा-निर्देश देने में वह अनुभवहीन साबित हुए, लेकिन उन्होंने बांग्लादेश को एक मजबूत संविधान दिया था। उस संविधान में बंगाली राष्ट्रवाद और समाजतंत्र के साथ धर्मनिरपेक्षता को जगह मिली थी।

वह धर्मनिरपेक्षता अब कहां है? न जाने कहां से सत्ता में आकर मेजर जिया ने धर्मनिरपेक्षता को बाहर कर दिया। जिया का अनुसरण करते हुए एक और सेनानायक ने संशोधन के नाम पर संविधान में धर्म को घुसाकर उससे भी बड़ा अनर्थ किया। अब राष्ट्रधर्म अगर इस्लाम होगा, तो हिंदू-बौद्ध-ईसाई धर्मावलंबियों को स्वाभाविक ही दूसरे दर्जे का नागरिक बनकर रहना होगा।

सात जून, 1988 का दिन बांग्लादेश के इतिहास में एक धर्मनिरपेक्ष समाज निर्माण की संभावना को गला दबाकर मार डालने के लिए याद किया जाएगा। उसने बांग्लादेश को एक-दो नहीं, हजार वर्ष पीछे कर दिया। उस समय शेख हसीना मददगार हो सकती थीं। वर्ष 1981 में वह बांग्लादेश में लौट आई थीं और अवामी लीग की अध्यक्ष बन चुकी थीं। उनके लौटने पर मुक्तियुद्ध की चेतना से लैस उन लोगों ने सुखद बदलाव की उम्मीद की थी, जो जियाउर रहमान से क्षुब्ध थे। पर इन्हीं हसीना ने मोहम्मद इरशाद के बुने जाल में फंसते हुए वर्ष 1986 में जमात-ए-इस्लामी के साथ चुनाव में उतरने का फैसला किया। तब खालिदा जिया ने आश्चर्यजनक रूप से इरशाद के हथकंडे से दूरी बनाए रखी थी। जब हसीना ने समझा कि इरशाद ने अपनी सत्ता को वैध रूप देने के लिए चुनाव का आयोजन किया था, तब तक बहुत देर हो चुकी थी। हसीना ने तब हालांकि संसद का बहिष्कार किया, लेकिन जमात-ए-इस्लामी के साथ खड़े होकर अपनी छवि उन्होंने जिस तरह धूमिल की, उससे उबरना आसान नहीं था। उसके बाद भी प्रगतिशील सोच वाले लोगों को भरोसा था कि सत्ता में आने पर हसीना संविधान के खोए हुए गौरव को लौटाएंगी!


जिन लोगों ने शेख हसीना से उम्मीदें पाली थीं, आज वे बेहद हताश हैं। वर्ष 1972 के धर्मनिरपेक्ष संविधान को दोबारा बहाल करने की जो प्रतिबद्धता उन्होंने जताई थी, वह आज तक पूरी नहीं हुई। आज से अट्ठाईस वर्ष पहले बांग्लादेश के बुद्धिजीवियों ने संविधान से राष्ट्रधर्म को हटाने के लिए जो याचिका दायर की थी, उसका फैसला आ चुका है। सर्वोच्च न्यायालय ने कह दिया है कि बांग्लादेश में राष्ट्रधर्म रहेगा। राष्ट्रधर्म रहने का मतलब है कि जल्दी ही बांग्लादेश में इस्लाम ही एकमात्र कानून होगा। जिस तरह की स्थितियां हैं, उसमें मेरा मानना है कि मैं जीते-जी बांग्लादेश में इस्लामी कानून को काबिज होते देख पाऊंगी।

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