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कब रुकेगी इज्जत के नाम पर हत्या

Sat, 07 May 2016 01:43 PM IST
सुभाषिनी सहगल अली
सुभाषिनी सहगल अली Updated Sat, 07 May 2016 01:43 PM IST
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When stop honour killing
सुभाषिनी सहगल अली

इज्जत के नाम पर न जाने कितनी हत्याएं और हमले हमारे संगठन, अखिल भारतीय जनवादी महिला समिति, के सामने गुजरी हैं। ऐसे मामले हमारे सामने तभी आते हैं, जब घटना घट चुकी होती है। फिर उन सवालों को पूछने का कोई औचित्य नहीं रह जाता है, जो हमारे दिमाग में उठते रहते हैं। सख्त निगरानी के बीच, युवक-युवती कैसे मिले, और एक दूसरे के इतने करीब कैसे पहुंचे कि साथ जीने-मरने का फैसला कर डाला, यह जानते हुए भी, कि यह फैसला उनकी मौत का कारण भी बन सकता है। मामला तभी सामने आता है, दोनों की या एक की जान जा चुकी होती है।

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इन सवालों का उत्तर हाल ही में प्रकाशित पेरुमल मुरुगन की तमिल पुस्तक, 'पुकुरी' के अंग्रेजी अनुवाद 'पायर' में मिला। हिंदी में इसका अर्थ है 'चिता'। यह पुस्तक कुमारेसन और सरोजा की कहानी सुनाती है। कुमारेसन की आंखों से हम उसका छोटा-सा गांव देखते हैं, उसकी विधवा मां को जानते हैं, जिसने बड़े जतन से उसे पाला है। काम की तलाश में कुमारेसन एक छोटे शहर आता है और सोडा की बोतलें तैयार करने का काम करता है। इन बोतलों को कांच के कंचे से बंद किया जाता है। जिस कमरे में वह बोतलों को भरता है, उसी में रहता भी है। शहर में उसे बड़ी आजादी का एहसास होता है। उसे लगता है कि वह वाकई आजाद है और कुछ भी कर सकता है। उसके कमरे के पास सरोजा अपने भाई और बाप के साथ रहती है, उसकी मां मर चुकी है। पेड़ की छांव में पड़ी खटिया से कुमारेसन उसे पहली बार देखता है और उसकी सुनहरी मूरत उसे मुग्ध कर देती है। बातचीत का मौका तो कई दिन बाद आता है, जब सरोजा उससे माचिस मांगने आती है। उसकी शहरी भाषा कुमारेसन की समझ में नहीं आती, इसलिए मुलाकात थोड़ी लंबी और दिलचस्प बन जाती है। सरोजा रेडियो पर गाने सुनती रहती है और उसकी आवाज कुमारेसन के कमरे तक पहुंचती है। उस ध्वनि को सुनकर वह समझने लगता है कि सरोजा कब घर पर होती है, कब अपने पिता और भाई का खाना लेकर बाहर निकलती है और फिर कब वापस आती है। गानों के प्यार भरे बोल मानो उनके बीच का संवाद है। यह सिलसिला जारी रहता है, छोटे-छोटे परिवर्तनों साथ। सरोजा का भाई अपने दोस्त से उसकी शादी करना चाहता है। सरोजा यह सूचना कुमारेसन को देती है और वे बिना किसी योजना के उसके गांव के लिए निकल पड़ते हैं। कुमारेसन अपने काम के प्रति बहुत ईमानदार है और सरोजा के प्रति भी। उसे इस बात की भनक भी नहीं है कि लोग दूसरों को पसंद या नापसंद उनकी विशेषताओं के आधार पर नहीं, बल्कि उनकी जाति और संबंधों के आधार पर करते हैं।
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गांव में उनका आगमन ही अशुभ रहा। सरोजा का रंग-रूप ही उसका दुश्मन बन गया, क्योंकि वह कुमारसेन और उसकी बिरादरी के लोगों जैसी नहीं थी। कुमारेसन की मां का आवेश और आक्रोश असह्य है। गांव की पंचायत कुमारेसन और उसके परिवार के बहिष्कार का फैसला लेती है। कुमारेसन काम की तलाश में बाहर जाता है, उसे लौटने में देर हो जाती है। रात को सरोजा के पेट में मरोड़ आती है। वह डरी हुई बाहर निकलती है, जहां उसे अपनी सास की किसी अनजान व्यक्ति से बातचीत सुनाई देती है। वे उसे मारने की योजना बना रहे  हैं। पेरुमल मुरुगन के खिलाफ संघ परिवार ने हल्ला दो साल पहले बोला था और उसने कहा था, मेरे अंदर का लेखक हमेशा के लिए मर गया। यह पुस्तक उस घटना से पहले की है। पेरुमल स्वयं भी जातिवाद की चिता पर सुलग रहा है।

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