जब समाज चुप्पी साधता है
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बांग्लादेश में लेखक-बुद्धिजीवियों की हत्या का सिलसिला जारी है। उदारवादियों को तो निशाना बनाया ही जा रहा है, सांस्कृतिक सोच के लोगों का भी जीना मुहाल है। मुस्लिम-गैरमुस्लिम का कोई भेद भी नहीं है। फेसबुक में कुछ लिखने, गाना गाने, सितार बजाने, कविता लिखने, कविता पत्रिका प्रकाशित करने के जुर्म में भी मार डाला जा रहा है। बुर्के के खिलाफ दो शब्द बोल लेने को भी दुस्साहस मान लिया जाता है। इस्लामी कट्टरपंथी अगर किसी को निशाना बनाते हैं, तो यह मान लिया जाता है कि मारा गया आदमी नास्तिक था। पर नाजिमुद्दीन, रेजाउल, जुलहास, ये लोग नास्तिक नहीं थे, इस्लाम के आलोचक नहीं थे, ब्लॉगर भी नहीं थे। इसके बावजूद उन्हें नृशंसता से मार डाला गया।
थोड़े समय पहले तक भी बांग्लादेश में यह माना जाता था कि कट्टरवादी इस्लाम के आलोचकों और नास्तिक ब्लॉगर्स को ही निशाना बना सकते हैं। यह किसी के ख्याल में नहीं था कि प्रगतिशील होना भी किसी के मारे जाने का कारण बन सकता है। नाजिमुद्दीन समद नास्तिक ब्लॉगर नहीं, बल्कि प्रगतिशील छात्र थे और धार्मिक कट्टरवाद का विरोध करते थे। रेजाइल करीम सिद्दीकी सितार बजाते थे, एक साहित्यिक पत्रिका प्रकाशित करते थे और सांस्कृतिक काम-काज में उत्साही थे। उन्होंने धर्म के खिलाफ कभी कुछ नहीं कहा। पर अपने सांस्कृतिक मूल्यों की कीमत उन्हें जान देकर चुकानी पड़ी। जुलहास मन्नान को उनके उदारवादी होने के कारण निशाना बनाया गया।
बांग्लादेश में जब एक के बाद ब्लॉगर की हत्या की जा रही थी, तब नागरिक समाज ने इसका प्रतिरोध करने के बजाय चुप्पी साधना उचित समझा था। उन्हें लगा कि निशाने पर सिर्फ उन्हें ही लिया जा रहा है, जो धर्म की आलोचना कर रहे हैं। चूंकि हम खुद ऐसा नहीं कर रहे, इसलिए सुरक्षित हैं। लेकिन आज ऐसे लोग गलत साबित हो रहे हैं। कट्टरवादियों का दुस्साहस इतना बढ़ गया है कि वे उदारवादियों तक की हत्या करने में नहीं हिचक रहे।
आलम यह है कि अनेक ब्लॉगर्स बांग्लादेश छोड़कर बाहर चले गए हैं। जो लोग वहां हैं भी, वे छिपे हुए हैं। उनमें से कइयों ने ब्लॉग लिखना बंद कर दिया है। ऐसे में, दहशत जारी रखने को आमादा कट्टरपंथियों ने उदारवादियों को चुन-चुनकर मारना शुरू किया है। अब भी अगर वहां के लोग चुप रहें और सरकार निष्क्रियता दिखाए, तो कट्टरपंथियों का दुस्साहस और बढ़ जाएगा। वैसे में, आने वाले दिनों में आस्तिक भी मारे जाएंगे। पिछले दिनों यूरोपीय संसद में अपने व्याख्यान में मैंने बांग्लादेश की इसी समस्या की ओर लोगों का ध्यान दिलाया। यह बेहद खतरनाक है कि लोग सिर्फ अलग विचार रखने के कारण मारे जा रहे हैं, और न्याय नहीं मिल रहा। संसद के सदस्यों ने मुझसे सवाल पूछा कि सिविल सोसाइटी क्या कर रही है? इस पर थोड़ी देर तक मैं कुछ कह नहीं पाई।
लेकिन अगर बांग्लादेश की मौजूदा स्थिति को गहराई से देखें, तो खतरनाक निष्कर्ष निकलता है। वहां का नागरिक समाज क्या केवल कट्टरवादियों के भय से चुप है? यह पूरी तरह सच नहीं है। नागरिक समाज का एक बड़ा हिस्सा है, जो दबे-छिपे शब्दों में मानता है कि अगर लोग व्यवस्था के अनुरूप चलें, अधिक साहस का परिचय न दें, धारा के विपरीत न तैरें और चुपचाप रहें, तो कट्टरवादी उन्हें नुकसान नहीं पहुंचाएंगे। यानी पिछले कुछ समय से बांग्लादेश में कट्टरवादियों का जो निरंतर तांडव चल रहा है, उसे बहुतेरे लोग गलत नहीं मानते। वे इस पर भी विचार नहीं करते कि कुछ लोगों को किसी की हत्या करने का अधिकार किसने दिया। कौन सही है, कौन गलत, इसका विचार समाज के कुछ कट्टरवादी तत्व भला कैसे कर सकते हैं? जब समाज अन्याय पर चुप रहता है, जब वह कुछ लोगों के गलत काम को प्रकारांतर से सही ठहराने की कोशिश करता है, जब वह कट्टरवादियों के एक समूह द्वारा दी जाने वाली सजा को अदालत द्वारा दी जाने वाली सजा के बराबर मान लेने का भ्रम पाल बैठता है, तब उस समाज का रसातल में जाना तय है।
बांग्लादेश के नागरिक समाज में यह स्थिति अचानक नहीं आई है। इसके पीछे दरअसल सरकारी उदासीनता का भी हाथ है। सच यह है कि इतनी हत्याओं के बावजूद बांग्लादेश की शेख हसीना सरकार ने अभी तक कट्टरपंथियों के खिलाफ जरूरी सख्ती नहीं दिखाई है। सरकार कहे या न कहे, लेकिन उसकी निष्क्रियता से यह संदेश जाता ही है कि वह भी कमोबेश उदारवादियों को ही उनकी हत्या का जिम्मेदार ठहराती है। औरतों का जब बलात्कार होता है, तब अनेक उदारमना लोग और जिम्मेदार पदों पर बैठा शख्स यह कहने से नहीं हिचकता कि इसमें औरत ही दोषी है। वह रात को अकेली क्यों घूम रही थी? उसने वैसे कपड़े क्यों पहन रखे थे? अपनी निष्क्रियता का ठीकरा नागरिकों के सिर फोड़ देना नया नहीं है। इससे सरकारें अपनी जिम्मेदारी से बच जाती हैं। लेकिन बांग्लादेश में तो सरकार और समाज, दोनों ने जैसे अपनी जिम्मेदारी से मुंह मोड़ रखी है।
जर्मन प्रोटेस्टेंट मार्टिन न्यूमोलर के बारे में अनेक लोग जानते हैं। मार्टिन हिटलर के विरोधी थे। सात साल उन्हें कनसेंट्रेशन कैंप में भी बिताने पड़े थे। दूसरे विश्वयुद्ध के समय जब जर्मन नाजी एक के बाद एक जिप्सियों, कम्युनिस्टों और यहुदियों की हत्या कर रहे थे, तब किसी ने उसका विरोध नहीं किया था। मार्टिन की वह चर्चित कविता कहती है, जब वे सोशलिस्टों के लिए आए/मैं नहीं बोला/क्योंकि मैं नहीं था सोशलिस्ट/फिर वे ट्रेड यूनियनिस्टों के लिए आए/मैं कुछ नहीं बोला/क्योंकि मैं नहीं था ट्रेड यूनियनिस्ट/उसके बाद वे यहुदियों के लिए आए/और मैं कुछ नहीं बोला/क्योंकि मैं नहीं था यहूदी/फिर वे मेरे लिए आए/और कोई नहीं था जो मेरे लिए बोलता।
आज बांग्लादेश की मौजूदा स्थिति को देखते हुए न्यूमोलर की यह कविता बेहद याद आती है।