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यह संक्रमण काल संक्रमित है

Sat, 04 Aug 2018 05:53 PM IST
डॉ आशीष जैन, नई दिल्ली
डॉ आशीष जैन, नई दिल्ली Updated Sat, 04 Aug 2018 05:53 PM IST
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Satire on current media scenario by Dr. Ashish Jain

आओ बैठो यार! तुम तो तेल देखो, तेल की धार देखो।

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पता चला, एक स्वयंभू 'सबसे विश्वसनीय' आपको आगे रखने वाले समाचार चैनल के शीर्ष, दिग्गज व क्रांतिकारी पत्रकारों के त्यागपत्र के बाद सोशल मीडिया पर एक अजीब सी कृत्रिम ऊहापोह मची हुई है। कहीं शोक-बैठकें हो रही हैं तो कहीं उत्सव। देखिये कैसे एक ही घटना भिन्न और परस्पर विरोधी भावनाओं को जन्म देती है, और ये इस बात पर निर्भर करता है की आपका झुकाव किस ध्रुव की ओर है। पर मैं तो पेशे से चिकित्सक हूं और स्वयंभू तटस्थ। अत: मैं केंद्र से दोनों ध्रुवों को देख, कभी आनंद तो कभी अवसाद के भावों में झूलता रहता हूं। इन्हीं भावों और विचारों को आपके समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूं। और आपसे यह अकल्पनीय अपेक्षा भी रखता हूं कि आप इसे मेरे ही दृष्टिकोण से देखें।

इस धड़े के विपरीत उस धड़े का विश्वास है की अघोषित आपातकाल लागू हो गया है। कहना कठिन है, क्योंकि आरोप लगाने वालों की भांति मैंने भी वह काल नहीं देखा था। सुना और पढ़ा अवश्य है। एक बात तो तय है, उस काल में प्रेस के ऊपर अत्याचार कहीं अधिक तीक्ष्ण और धारदार थे और प्रेस की प्रतिक्रिया कहीं अधिक गंभीर और अपेक्षा के अनुरूप थी। चरित्र में प्रामाणिकता थी, शासन का व्यवहार शासक की भांति था और प्रेस का आचरण उसके चरित्र के अनुकूल। अब सब गुड़ गोबर हो गया है।
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शासन और प्रेस दोनों एक दूसरे पर छद्म रूप से वार कर रहे हैं। समस्या यहीं है। जब समाचार पत्रों की बिजली पानी बंद कर दी गई तो भी अखबार छपे, बंटे और पढ़े गए। शासन पर सीधे वार हुए और अंतत: लोकतन्त्र विजयी हुआ। क्योंकि लड़ाई लोकतन्त्र एवं स्वतंत्रता को बचाने की थी। अब लड़ाई कुछ और ही है। शासन और पत्रकार दोनों ही अपनी गद्दी बचाने में व्यस्त हैं। इनमें से कभी कोई जीतता है तो कभी कोई, पर जनतंत्र की हार तय है। निश्चित ही यह संक्रमण काल है, पर खेद है यह संक्रमित भी है और रोग गंभीर भी।

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जब व्यावसायिक प्रतिष्ठानों ने समाचार चैनलों का प्रबंधन पत्रकारों के हाथ से ले लिया

Satire on current media scenario by Dr. Ashish Jain

रोग अत्यधिक पुराना भी है। यहां एक चिकित्सकीय उपमा प्रासंगिक होगी। हुआ यूं कि कर्क रोग यानि कैंसर से शरीर लंबे समय से ग्रस्त था। अब फैल चुका है। जब इसने रीढ़ की हड्डी अशक्त कर दी और अधोभाग को लकवा मार गया तब रोगी को बीमारी का पता चल रहा है। दूरदर्शन का आरंभ से ही सरकारी भोंपू के रूप में उपयोग हुआ है।

तब समाज और पत्रकार इसका उपहास कर अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर दिया करते थे। पर रूप-रेखा तय हो चुकी थी। शासक ने अपनी मंशा जाहिर कर दी थी। काश कि तब रोष जताया होता, लोकतन्त्र का चौथा खंबा कैसे पहले खंबे के अधीन रह सकता है? नींव तभी कमजोर हो गई थी। अब सांप निकल चुका है, हम लकीर पीट रहे हैं। और अब यह सांप हमें ही निगलने को आतुर है, देखो कैसी जीभ लपलपा रहा है दुष्ट।

कुछ वर्षों पहले फिर दूसरा दौर आरंभ हुआ जब व्यावसायिक प्रतिष्ठानों ने समाचार चैनलों का प्रबंधन पत्रकारों के हाथ से ले लिया। तब भी संभलने का मौका था पर तब सभी बड़े-छोटे, नौसिखिए-प्रशिक्षित, नामी-गुमनामी पत्रकार लपलपाती जीभ ले कर इन प्रतिष्ठानों के द्वार पर पंक्तिबद्ध खड़े हो गए। आज जब नेता रूपी व्यवसायी और व्यवसायी रूपी नेता पैसों की उगाही कर रहे हैं और नि:स्वार्थ भाव से स्वार्थ सिद्धि कर रहे हैं तो काहे उत्पात मचा रहे हो?

इतने वर्षों से तो प्रतिवर्ष अपने बढ़ते कद की ऊंचाई और कार की लंबाई देख कर इठलाते फिर रहे थे!! जब यह सब घटित हो रहा था तब तो सिद्धांतों की आंच पर पारिश्रमिक के भुट्टे सेंके जा रहे थे!! सिद्धान्त जल कर राख हो गए और भुट्टे के दाने कुछ चुनिन्दा लोगों ने खा लिए। हमारे लिए बचे ये डंठल, जिन्हें हवा में लहरा कर हम 'लोकतन्त्र अमर रहे' के नारे लगाते फिर रहे हैं। पर मालिक अपने चरित्र के अनुसार ही बर्ताव कर रहे हैं, उनके लिए ये प्रतिष्ठान पैसा कमाने के लिए हैं, सो वे पैसा कमा रहे हैं - क्या गलत है?

पूंजीवाद का यह कर्क रोग मात्र मीडिया तक ही सीमित नहीं है

Satire on current media scenario by Dr. Ashish Jain

पर ऐसा नहीं है कि पूंजीवाद का यह कर्क रोग मात्र मीडिया या समाचार चैनलों तक ही सीमित हो। शिक्षा के क्षेत्र में विद्यालय, महाविद्यालय और विश्वविद्यालय भी रसूखदारों के हैं। चिकित्सा में अब नए अस्पतालों के मालिक व्यवसायी ही हैं। आप यूं ही उम्मीद लगाए बैठे हैं कि वे परोपकार करेंगे जबकि उनका उद्देश्य तो दीगर है। इस राजनीतिक पूंजीवाद ने सारे समाज को अपने मकड़जाल में उलझा लिया है। इससे निकलने का मार्ग दुष्कर ही नहीं, असंभव प्रतीत हो रहा है। जो आज समाज में हो रहा है, वो दरअसल हो नहीं रहा है अपितु किया जा रहा है।

अंत में हमें क्या पता कि चुनावों की इस बेला में यह 'पद वापसी' किसी विशेष प्रयोजन के अंतर्गत 'अवार्ड वापसी' की तरह प्रायोजित तो नहीं?  क्योंकि बाबूमोशय, आप तो रंग मंच की कठपुतली हो और आपकी डोर उस ऊपर वाले पूंजीपति नेता के हाथ में है...

आप तो बस रिमोट हाथ में लो, तेल देखो और तेल की धार देखो।

लेखक परिचय-

डॉ आशीष जैन,
वरिष्ठ परामर्शदाता
श्वास रोग विभाग
मैक्स सुपर स्पेशिएलिटी हॉस्पिटल
साकेत, नई दिल्ली

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