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वंशवाद की राजनीति में तो यही होगा

Sun, 24 Apr 2016 06:52 PM IST
तवलीन सिंह
तवलीन सिंह Updated Sun, 24 Apr 2016 06:52 PM IST
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Outcome of Dynesty Politics
तवलीन सिंह

आपने भी सूखाग्रस्त मराठवाड़ा में पंकजा मुंडे की सेल्फी लेते हुए तस्वीर देखी होगी। उस तस्वीर को देखकर आपको भी शायद उतना ही बुरा लगा होगा, जितना मुझे लगा है। सुश्री पंकजा महाराष्ट्र सरकार में मंत्री हैं और उस बीड चुनाव क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करती हैं, जहां आजकल पानी का इतना गंभीर अभाव है कि रेलगाड़ियों में भेजा जा रहा है। वहां सूखे का यह हाल है कि अधिकांश कुएं सूख गए हैं, सो टैंकरों द्वारा पानी भरे जाते हैं, लेकिन ऐसा होने के बावजूद कुओं में इतना कम पानी रहता है कि बच्चे-बूढ़े अपनी जान पर खेलकर कुएं के अंदर जाकर पानी निकालते हैं। पानी की इस खतरनाक खोज में कुछ लोगों ने अपनी जानें भी गंवाई हैं।

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सुश्री पंकजा को भी इन सब बातों का पता जरूर होगा। फिर भी उन्हें खुली जीप में खड़ी होकर सूखी नदी के सामने सेल्फी लेने का विचार आया, तो इससे ज्यादा चौंकाने वाला और कुछ हो नहीं सकता। मेरा यह मानना है कि पंकजा जैसी राजनीतिक वारिसों की देश की राजनीति में कोई जगह नहीं होनी चाहिए। जनसेवा का अधिकार विरासत में नहीं मिलता, न ही किसी नेता के घर में पैदा होने से मिलता है।
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साथ ही यह कहना भी जरूरी है कि वंशवाद की राजनीति में पंकजा अकेली नहीं हैं। पिछले कई दशकों के दौरान लोकसभा से लेकर पंचायतों तक में यह कुप्रथा स्थापित हो गई है और इस कारण देश का लोकतंत्र अंदर ही अंदर कमजोर होता गया है। लोकसभा का तो इतना बुरा हाल है कि अनुमान लगाया जाता है कि 35 प्रतिशत से ज्यादा नौजवान सिर्फ इसलिए सांसद चुनकर आए हैं, क्योंकि उनके पिता या माता ने उन्हें विरासत में अपना चुनाव क्षेत्र दिया है। समस्या यह भी है कि देश के तकरीबन सारे राजनीतिक दल अब निजी जायदाद की तरह बन गए हैं।
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बेशक देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी कांग्रेस से इसकी शुरुआत हुई। लेकिन भाजपा ने अगर इस आदत को न अपनाया होता, तो प्रजातंत्र को शायद कम नुकसान हुआ होता। सुश्री पंकजा अगर जनता की सेवा करने राजनीति में आई होतीं, तो अपने चुनाव क्षेत्र में पिछले वर्ष ही उन्होंने राहत का काम शुरू करवाया होता। वहां पानी पहुंचाने की व्यवस्था पहले से तैयार करने की आवश्यकता थी, क्योंकि पिछले दो वर्षों से मराठवाड़ा में बरसात नहीं हुई है। वह अपने विधायक कोष के जरिये सूखाग्रस्त गांवों में दो वक्त की रोटी मुहैया कराने का काम अक्षयपात्र जैसी संस्था को सौंप सकती थीं, क्योंकि उन गांवों की हालत बेहद खराब है।


इस तरह की चीजें तब तक होती रहेंगी, जब तक हमारे राजनेता परिवारवाद की प्रवृत्ति पर अंकुश लगाने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाते। इसे रोकना आसान नहीं है, क्योंकि छोटे-मोटे नेता भी आज अपने परिजनों को राजनीति में लाने का काम कर रहे हैं। इसका कारण यह है कि राजनीति व्यवसाय बन गई है। देश की राजनीति में आज ऐसे कई परिवार हैं, जिनके सारे बच्चे 'जनता की सेवा’ कर रहे हैं। एक भाई लोकसभा में जाता है, दूसरा विधानसभा में, और अगर तीसरा भाई भी हो, तो उसे इस राजनीतिक कारोबार को संभालने का काम सौंप दिया जाता है। इसके लाभ बहुत हैं, लेकिन देश की लोकतांत्रिक संस्थाओं को इस प्रथा से नुकसान भी उतने ही हैं। सुश्री पंकजा ने सेल्फी लेकर इस नुकसान की एक छोटी-सी झलक दिखाई है।

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