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आश्रम स्कूलों में हमारे समय के एकलव्य

Wed, 27 Apr 2016 08:44 PM IST
सुभाष गाताडे
सुभाष गाताडे Updated Wed, 27 Apr 2016 08:44 PM IST
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Our age Eklavya in ashram schools
सुभाष गाताडे

चीजें जितनी बदलती जाती हैं, उतनी वे एक जैसी दिखती रहती हैं। यह एक फ्रेंच मुहावरे का हिंदी में तर्जुमा है, जो अक्सर आदिवासियों की स्थिति को लेकर याद आता है। हाल ही में एक अंग्रेजी अखबार ने संविधान की पांचवीं अनुसूची के तहत आदिवासी बहुल दस राज्यों में संचालित सरकारी आवासीय विद्यालयों की स्थिति पर सूचना के अधिकार के तहत जानकारी मांगी थी, जिनसे पता चला कि 2010 से 2015 के दौरान ऐसे विद्यालयों में विभिन्न कारणों से 882 विद्यार्थियों की मौत हो गई। इनमें सर्वाधिक मौतें महाराष्ट्र और फिर ओडिशा में हुईं। इस सूची में गुजरात, आंध्र प्रदेश और राजस्थान जैसे राज्य भी शामिल हैं। अखबार ने ऐसे सरकारी आवासीय विद्यालयों में होने वाली मौतों के साथ ही उनके कारण, यौन अत्याचार की घटनाएं और ऐसे माता-पिता के ब्योरे भी मांगे थे, जिन्हें अब तक मुआवजा नहीं मिला है। आदिवासी बहुल छत्तीसगढ़ और उत्तरी राज्य हिमाचल प्रदेश ने आरटीआई के तहत मांगी इन जानकारियों का जवाब देना भी जरूरी नहीं समझा।

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उल्लेखनीय है कि पिछले साल महाराष्ट्र के चंद्रपूर जिले की जीवती तहसील में चार छात्रों द्वारा 15 अगस्त के दिन की गई आत्महत्या की कोशिश का मामला सुर्खियों में रहा था, जिन्होंने जैसे ही झंडा फहराने की प्रक्रिया शुरू हुई, अपने जेब में रखी जहर की बोतलें अपनी हलक के नीचे उतार दी थीं। जांच में पता चला कि इन छात्रों ने यह कदम स्कूल की बदइंतजामी, अध्यापकों की कमी और खाने की सामग्री की अनुपलब्धता आदि को रेखांकित करने के लिए उठाया था। डेढ़ साल पहले ओडिशा के नयागढ़ जिले के राणापुर ब्लॉक के केन्दुआ में आदिवासी लड़कियों के लिए बने छात्रावास में भोजन के बाद 20 लड़कियां बीमार हो गई थीं, जिनमें से एक की मौत हो गई। ये घटनाएं और जानकारियां इसी परिघटना की व्यापकता को रेखांकित करती है, जो बताती हैं कि देश भर में फैली आश्रमशालाओं में ऐसी घटनाओं का होना अब अपवाद नहीं है। ध्यान रहे कि नवोदय विद्यालय की तर्ज पर बने एकलव्य मॉडल आवासीय विद्यालय में छठी से 12वीं तक के बच्चे पढ़ते हैं। केंद्र सरकार की आदिवासी उपयोजना के तहत संचालित आश्रमशालाओं में ऐसी घटनाओं की बहुतायत देखी गई है। प्रश्न उठता है कि वंचित समुदाय के मेधावी बच्चों के शैक्षिक विकास के लिए बने ऐसे स्कूल मौत के कुएं क्यों बन रहे हैं। इनकी निगरानी करने वाला तंत्र भी उपलब्ध नहीं है।
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राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद द्वारा प्रकाशित ‘नेशनल फोकस ग्रुप ऑन प्रॉब्लम्स ऑफ शेड्यूल्ड कास्ट ऐंड शेड्यूूल्ड ट्राइब चिल्ड्रन’ शीर्षक रिपोर्ट अध्यापकों एवं अनुसूचित तबके के छात्रों के अंतर्संबंधों पर ठीक रोशन डालती है। रिपोर्ट के मुताबिक, अध्यापकों के बारे में यह बात देखने में आती है कि अनुसूचित जाति और जनजाति के छात्रों एवं छात्राओं से उनकी न्यूनतम अपेक्षाएं होती हैं और झुग्गी बस्तियों में रहने वाले गरीब बच्चों के प्रति तो उनका व्यवहार बेहद अपमानजनक और उत्पीड़नकारी रहता है। यह अकारण नहीं कि इन तबकों के स्कूल छोड़ने की दर में कमी के कोई आसार नहीं दिख रहे हैं। और संविधान के तमाम वायदों के बावजूद 21वीं सदी में भी शिक्षा हासिल करना अनुसूचित तबके के अधिकतर छात्रों के लिए बाधा दौड़ जैसा ही बना हुआ है।

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