पाकिस्तान की मेजबानी में जवाहिरी
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इन दिनों पश्चिमी देशों का सारा ध्यान इस्लामिक स्टेट (आईएस) को नष्ट करने पर है और इसमें अयमान-अल-जवाहिरी नामक शख्स ध्यान से उतर गया है। फिर भी बिन लादेन के इस उत्तराधिकारी से अमेरिका खासा भयभीत है, क्योंकि जवाहिरी आज भी अमेरिका पर हमले की धमकी का मुख्य आयोजक बना हुआ है। यह धमकी, अमेरिका की होमलैंड सिक्योरिटी के सचिव और रिटायर्ड मरीन कोर जनरल जॉन केली के शब्दों में, 'सोलह साल पहले 9/11 पर जो हमने अनुभव की, उससे बदतर होगी'। अप्रैल की शुरुआत में अमेरिका की नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल में दक्षिण एशिया डेस्क पर लिसा कर्टिस की नियुक्ति ही ह्वाइट हाउस द्वारा अल जवाहिरी और उसके आतंकवादी साथियों के खात्मे के प्रति अपने कड़े रुख का एक जबरदस्त संकेत है। सीआईए की जानी-मानी पूर्व विश्लेषक एवं विदेश नीति की जानकार कर्टिस ने फरवरी में एक लेख के जरिये हंगामा बरपा दिया कि अमेरिका को पाकिस्तान को उसकी सरजमीं पर सभी आतंकवादी समूहों की गतिविधियों के लिए जिम्मेदार ठहराना चाहिए।
परंपरावादी हडसन इंस्टिट्यूट के लिए हुसैन हक्कानी के साथ मिलकर लिखे गए लेख में कर्टिस ने तर्क दिया कि पाकिस्तान को एक सहयोगी के रूप में देखना और दर्शाना बंद कर देने का समय आ गया है। नए अमेरिकी प्रशासन को यह बात जान लेनी चाहिए कि पाकिस्तान अमेरिका का सहयोगी नहीं है। हुसैन हक्कानी अमेरिका में पाकिस्तान के राजदूत रह चुके हैं। कर्टिस फिलहाल पाकिस्तान और भारत के लिए ह्वाइट हाउस की सर्वोच्च अधिकारी हैं।
पाकिस्तान की खुफिया इंटेलिजेंस एजेंसी 'आईएसआई' मिस्र में जन्मे जवाहिरी को 2001 में अफगानिस्तान में अमेरिकी फौज द्वारा अल कायदा के खिलाफ की गई कार्रवाई के समय से संरक्षण दे रही है। जवाहिरी एक प्रशिक्षित सर्जन है। उसकी स्थिति (लोकेशन) कराची में बताई जाती है। सीआईए के जानकार सूत्रों का कहना है कि अबोटाबाद- जहां बिन लादेन मारा गया था- वहां पाई गई सामग्री और संकेत साफ तौर पर दर्शाते हैं कि तार्किक रूप से कराची ही वह जगह है, जहां वह छिप सकता है, क्योंकि अमेरिकी वहां आकर उसे नहीं मार पाएंगे।
दो मई, 2011 को बिन लादेन के ठिकाने पर किए गए कमांडो हमले की तरह के अभियान के लिए कराची बहुत मुश्किल जगह है, यह कहना है सीआईए के विशेषज्ञ ब्रूस रिडेल का, जिन्होंने चार अमेरिकी राष्ट्रपतियों के साथ काम किया है। एक तो कराची में पुलिस बड़ी संख्या में मौजूद है, दूसरे वहां एक बड़ा आणविक केंद्र है और फिर पाकिस्तानी नौसेना और वायुसेना के अड्डे भी हैं। इन्हें कभी भी अमेरिकी हमलावरों को रोकने हेतु त्वरित गति से तैनात किया जा सकता है। और तो और, बिन लादेन आज भी कराची के लाखों गरीबों और कट्टर मुसलमानों के बीच काफी लोकप्रिय है और वे सब अपने-अपने घरों और दुकानों से निकलकर अमेरिकियों को दबोच सकते हैं।
पिछले साल जनवरी में अमेरिका ने पाकिस्तान की दूरस्थ शावल घाटी में ड्रोन हमले के जरिये अल जवाहिरी को निशाना बनाने की कोशिश की। पर ड्रोन का हमला उससे अगले कमरे पर हुआ, जिसमें जवाहिरी ठहरा हुआ था। बीच की दीवार ढह गई और जवाहिरी मलबे में दब गया। उसका चश्मा जरूर टूट गया, लेकिन बाल-बांका भी नहीं हुआ। उसके चार सुरक्षाकर्मी मौके पर ही मारे गए। मजेदार बात यह है कि जवाहिरी दस मिनट पहले ही उस कमरे से सोने के लिए निकला था।
ब्रिटेन के खोजी पत्रकार आद्रियान लेवी और केथी स्कॉट क्लार्क की एक प्रकाशनाधीन पुस्तक के अनुसार, जवाहिरी केंद्र शासित आदिवासी इलाके में 2005 से घूम रहा है। उसने एक स्थानीय पश्तो लड़की से शादी कर दामादोला पहाड़ियों में एक नया घर बसा लिया है।
जुलाई 2015 में अल-जवाहिरी अपनी तीन बीवियों और खास सहायक सैफ अल अदल के साथ शावल घाटी में था। अब 66 साल का जर्जर जवाहिरी 2001 से कई ड्रोन हमले झेल चुका है और इस्लामी समूहों के समूचे हालात पर चिंतित है। लेकिन अब आदिवासी इलाकों में उसका स्वागत नहीं होता, क्योंकि ये इलाके विश्व शांति के खतरे के रूप में चिह्नित होना नहीं चाहते। लिहाजा वह आईएसआई के निर्देश पर कराची चला गया है। उसका सहायक अल-अदल भी उसके साथ है। पाकिस्तान के एक आला अफसर का तो यहां तक कहना है कि बिन लादेन का 26 साल का बेटा हमजा, जो आज अल-कायदा में एक उभरती हुई ताकत है, भी आईएसआई के संरक्षण में पाकिस्तान में ही है। हालांकि पाकिस्तान के एक प्रवक्ता के अनुसार यह सब मीडिया का अभियान है। अल-कायदा के खिलाफ पाकिस्तान की उपलब्धियां अभूतपूर्व और स्वयंसिद्ध हैं।
बिन लादेन का बेटा हमजा पिछले साल समूह के अमीर या कमांडर के रूप में उभरा था, लेकिन विश्लषकों का मानना है कि बुजुर्ग और चोट खाए हुए जवाहिरी ने उसे संगठन के प्रेरणादायी चहरे के रूप में तैयार किया है। हमजा भी महत्वाकांक्षी साबित हुआ। जुलाई 2016 के एक वीडियो में उसने अपने पिता की हत्या के खिलाफ अमेरिका से बदला लेने की कसम खाई। जनवरी में अमेरिकी विदेश विभाग ने उसे ‘स्पेशली डेजिगनेटेड ग्लोबल टेररिस्ट’ घोषित कर किया।
दशकों तक वाशिंगटन ने इस्लामाबाद द्वारा अल-कायदा, बिन लादेन और अफगान तालिबान के संरक्षण को सहन किया, क्योंकि वह पाकिस्तान को आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक युद्ध में अपना सहयोगी समझता था। लेकिन इस्लामाबाद के अल कायदा के प्रति लाड़-प्यार, उसका आणविक हथियारों का अनिर्बंधित उत्पादन और भारत पर आईएसआई पोषित आतंकवादी समूहों के लगातार हमलों ने वाशिंगटन, खासकर ट्रंप प्रशासन से उसके संबंध धूमिल कर दिए हैं। राजनयिक सूत्रों के अनुसार यह तथ्य भविष्य में दक्षिण एशिया क्षेत्र में घटनाओं को खासा प्रभावित करने का माद्दा रखता है। बहरहाल यह देखना दिलचस्प होगा कि पाकिस्तान इससे कितना प्रभावित होता है!