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बनारस के युवा चाहते हैं परिवर्तन

Sun, 13 Apr 2014 06:05 PM IST
तवलीन सिंह
तवलीन सिंह Updated Sun, 13 Apr 2014 06:05 PM IST
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youth want to change Banaras

राजनीतिक पंडित कहते हैं कि यह पहला आम चुनाव होगा, जिसके नतीजों पर पढ़े-लिखे, शहरी नौजवानों की स्पष्ट छाप नजर आएगी। अनुमान है कि कोई 12 करोड़ ऐसे मतदाता हैं, जो पहली बार वोट करेंगे। सो भारत के नौजवानों की आवाज इस बार ऊंचे स्वरों में सुनाई देने वाली है। इसी का ध्यान रखते हुए जहां-जहां गई हूं चुनाव की हवा परखने, वहां-वहां मेरी कोशिश रही है नौजवानों से मिलने की। पिछले सप्ताह बनारस पहुंचते ही नौजवानों को ढूंढने निकल पड़ी। अस्सी घाट के गंगा व्यू होटल में सामान रखा, बगल वाले रेस्तरां में बनारसी सात्विक खाना खाया, और निकल पड़ी बीएचयू (बनारस हिंदू विश्वविद्यालय) की ओर। बरसों बाद जाना हुआ इस प्रसिद्ध विश्वविद्यालय के कैंपस में। बीएचयू सिर्फ विश्वविद्यालय नहीं है, भारत की विरासत का हिस्सा है।

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बीएचयू में इस बार मेरा गाइड था आनंद मोहन झा नाम का एक दुबला-पतला लड़का, जो संस्कृत पढ़ रहा है इस विश्वविद्यालय में। आनंद मोहन मुझे लेकर गया संस्कृत विभाग में अपने गुरुजी से मिलवाने, लेकिन सीढ़ियां चढ़ते ही हमारी भेंट हुई उसके कुछ दोस्तों से, सो हम वहीं बरामदे में बैठकर बातें करने लगे। सबने कहा कि सबसे बड़ा मुद्दा है उनके लिए, बेरोजगारी और भ्रष्टाचार। इन विद्यार्थियों की नजरों में ये दोनों मुद्दे जुड़े हुए हैं, उनको यकीन है कि अगर भ्रष्टाचार न होता देश भर में, तो संभव है कि इतनी तरक्की कर गया होता भारत कि बेरोजगारी भी कम हो गई होती। सबने कहा कि वे नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री के रूप में देखना चाहते हैं, क्योंकि उनका मानना है कि मोदी ही वह नेता हैं, जो देश को विकास के रास्ते पर ला सकते हैं।
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यहां पीएच.डी के एक छात्र शेषमणि शुक्ला ने कहा कि समय आ गया है शिक्षा संस्थानों में आरक्षण समाप्त करने का। आरक्षण के कारण संस्कृत विभाग की 90 सीटों में से आम श्रेणी में सिर्फ 32 सीटें रह जाती हैं। मेरे साथ बैठे तमाम छात्रों ने स्वीकार किया कि आरक्षण हटाना मुश्किल काम है किसी भी राजनेता के लिए, लेकिन यह भी कहा कि मोदी को अगर सशक्त प्रधानमंत्री बन जाने का मौका मिलता है, तो वह ऐसी चीजों में भी परिवर्तन ला सकते हैं। जब मैंने इन छात्रों से अखिलेश यादव के शासनकाल के बारे में पूछा तो सबने कहा कि वे अपने मुख्यमंत्री से नाखुश हैं, क्योंकि जिस दिशा में वह उत्तर प्रदेश को लेकर जा रहे हैं, वह गलत है। उनकी राय थी कि लैपटॉप बांटने और बेरोजगारी भत्ता देने के बदले अगर रोजगार के साधन पैदा करने में निवेश हुआ होता, तो राज्य का हाल बेहतर होता।
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बीएचयू में मुझे जितने भी छात्र मिले, तकरीबन सब ब्राह्मण थे, तो अगले दिन मैंने हरहुआ गांव की ओर रुख किया, जहां मुसलमानों की काफी आबादी है। मैं यह मालूम करना चाहती थी कि क्या मुस्लिम नौजवानों में भी वही मायूसी है। हरहुआ एक बड़ा-सा गांव है बनारस के नए एयरपोर्ट से थोड़ी ही दूर। यहां पहुंचने के बाद मैं प्रधान अनवर उर्फ अन्नू के घर गई। लोग काफी देर तक मुझे यकीन दिलाते रहे कि मुसलमानों का वोट मोदी को किसी हाल में नहीं जाएगा। सबने कहा कि केंद्र सरकार ने बहुत काम किया है, सो उनका वोट कांग्रेस को ही जाएगा।


यह बातें हो ही रही थी कि जीशान अनवर नामक एक लड़के ने आवाज ऊंची करके कहा, कुछ नहीं हुआ है विकास के तौर पर इस गांव में। बड़ों ने उसे चुप कराने की कोशिश की। लेकिन वह चुप नहीं हुआ और समस्याओं की लंबी सूची उसने मेरे सामने रखी, जिसमें बेरोजगारी सबसे ऊपर थी। बड़ों ने विषय बदल कर मंदिर-मस्जिद तक लाने की खूब कोशिश की, लेकिन जीशान अड़ा रहा। अगर इस देश के नौजवान, चाहे हिंदू हों या मुस्लिम, ठान लें कि परिवर्तन आना है, तो परिवर्तन आकर ही रहेगा।

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