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श्रेष्ठ धनुर्धर होकर भी इस मामले में कर्ण से जलते थे अर्जुन

राधामोहन गोकुल Updated Tue, 07 Apr 2015 12:25 PM IST
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श्रीकृष्ण ने अर्जुन के सामने ही कर्ण की उदारता और याचक को बिना दिए न लौटाने के व्रत की प्रशंसा की। अर्जुन यह सह न सके। उन्होंने कहा, माधव! आप बार-बार कर्ण की प्रशंसा कर मेरे हृदय को ठेस पहुंचा रहे हैं। आपको मेरी दानशीलता का शायद ज्ञान नहीं है। भगवान अर्जुन की बात सुनकर चुप रह गए।
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एक दिन एक ब्राह्मण अर्जुन के पास पहुंचा और कहने लगा, धनंजय, सुना है कि आपके दरवाजे से कोई याचक लौटकर नहीं जाता। मैं एक धर्मसंकट में पड़ गया हूं, मेरी स्त्री आज चल बसी। मरते समय उसने कहा कि उसके शरीर का दाह केवल चंदन की लकडि़यों से ही हो। क्या आप चंदन की इतनी लकडि़यों की व्यवस्था कर सकेंगे?


अर्जुन ने हामी भरी और कोठारी को बुलाकर तुरंत चंदन की लकड़ी देने की आज्ञा दी। दुर्भाग्यवश उस दिन न तो भंडार में कोई चंदन की लकड़ी थी, और न कहीं बाजार में। अर्जुन ने अपनी लाचारी बताई।

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तब वह ब्राह्मण कर्ण के यहां पहुंचा। वहां भी हालत वैसी ही थी। ब्राह्मण ने कहा, तो मैं अब चलूं। कर्ण ने कहा, आप नाराज न होइए। मैं प्रबंध करता हूं। और उन्होंने अपने महल के चंदन के खंभे निकलवाकर दे दिए।

शाम को श्रीकृष्ण और अर्जुन भ्रमण के लिए निकले। उन्होंने देखा कि एक ब्राह्मण श्मशान पर संकीर्तन कर रहा है। अर्जुन ने पहचाना कि यह वही ब्राह्मण है, जो उनके पास चंदन की लकड़ी के लिए आया था। उन्होंने उससे ब्राह्मणी के दाह संस्कार के बारे में पूछा। ब्राह्मण ने सारी कहानी बता दी। कृष्ण यह सुनकर अर्जुन से बोले, चंदन के खंभे तो तुम्हारे महल में भी थे, पर तुम्हें उनकी याद नहीं आई।

यह सुनकर अर्जुन को अपनी दानशीलता बहुत छोटी लगने लगी।

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