तुम ही एक ‘नाथ’ हमारे हो
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भले ही वह पिछले कुछ साल किसी के काम न आ सके, पर अब वह पार्टी की गिरती साख के वास्ते सभी की आंखों के नूर और दिल के करार नजर आ रहे हैं। 'दो बैलों की जोड़ी' से जन्मी संप्रति एक परिवार के 'हाथ' पर टिकी देश की सबसे पुरानी पार्टी के युवा 'मार्गदर्शक' रोज एक नया 'बम' फोड़ रहे हैं। नेपथ्य में समर्पित भक्तों द्वारा 'पितु, मात, सहायक, स्वामी, सखा तुम ही एक नाथ हमारे हो' की कातर प्रार्थना है, तो बुजुर्ग 'मार्ग-दर्शक' हाशिये पर हैं। फिर भी छप्पन दिन के अज्ञातवास के बाद छप्पन इंच वाले सीने पर अपनी 'सूझ-बूझ' से हमला कर सुर्खियों में हैं।
हालांकि वह चुप्पी भी साधते रहे हैं, तो कभी संसद में झपकी मारते भी देखे गए हैं। वह किसी कलावती की पैरवी कर लाइम लाइट में भी आ चुके हैं। मगर अब तंज कसने के साथ-साथ मंच, माला, माइक, तीनों को साध लिया है। दुर्गम पहाड़ी और विदर्भ की ‘पद-यात्राओं’ से उनके ‘जमीन से जुड़े होने’ का भी एहसास हो रहा है। एनआरआई की ताकत पर पहलवान बने ‘बजरंग बली’ की पूंछ में मनी, मैनेजमेंट और मीडिया की तीन 'म'-शालें धू-धू जल रही है। मानो, सबका साथ, सबका विवाद नजर आ रहा है।
यद्यपि मुखरता से अधिक प्रभावशाली है, मौन। प्राचीन काल में मौन धारण करने वाले मुनि कहलाते थे। व्यर्थ की आलोचना से बचकर मौन धारण करने में ही शांति मिलती है। इसके बरक्स राजनीति में मौन रहने का दुष्परिणाम देख चुकी है, उनकी पार्टी। इसलिए अब वह चुप नहीं बैठने वाले हैं। उन्होंने ठोक दी है ताल- बचना ए विरोधियों, लो मैं (छुट्टी से वापस) आ गया।
उधर बदहाल किसान राजनीति के हर योद्धा का शंख बना हुआ है। जिसका जैसा मूड, वैसा गाल फुलाकर फूंक मार रहा है। कभी रामलीला मैदान, कभी जंतर-मंतर, तो कभी संसद के भीतर। बदहाल किसान शब्द नहीं एक ध्वनि बन चुका है। उसकी ‘आवाज’ से न जाने कितने नेता सुर्खियों में हैं इन दिनों। राम जाने, इस ‘अनाथ’ के अच्छे दिन कब आएंगे!