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अब भी काम पर जा रहे हैं बच्चे

Tue, 04 Oct 2016 06:54 PM IST
उमेश चतुर्वेदी
उमेश चतुर्वेदी Updated Tue, 04 Oct 2016 06:54 PM IST
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Yet children go to work
उमेश चतुर्वेदी

शिक्षा का अधिकार कानून पारित होने के ठीक पहले हुई जनगणना के आंकड़ों ने भारतीय शिक्षा व्यवस्था के स्याह पक्ष को सामने ला दिया। 2011 की जनगणना के मुताबिक, देश में तब भी आठ करोड़ 40 लाख बच्चे ऐसे थे, जो स्कूल नहीं जा रहे थे। इनमें 78 लाख तो ऐसे थे, जिन्हें जबर्दस्ती काम पर भेजा जा रहा था। बेशक ये बच्चे काम पर जाने के लिए मजबूर किए जाते हों, पर ज्यादातर मामलों में यह मजबूरी उनके परिवार की होती है, जो रोजाना के खर्च के लिए दस-बीस रुपये जुटाने के चक्कर में अपने बच्चों की शिक्षा से ज्यादा उसकी कमाई पर जोर देते हैं।

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आमतौर पर माना जाता है कि इज्जत आदि के चक्कर में गुरबत में जी रहे लोग भी अपनी बच्चियों की तुलना में बेटों को ही काम पर भेजना ज्यादा पसंद करते हैं। जनगणना के आंकड़ों ने इस सोच को भी चौंकाया है। पढ़ने-लिखने और खेलने-कूदने की उम्र में जिन बच्चों को जबर्दस्ती काम करने को मजबूर होना पड़ता है, उनमें से 53 प्रतिशत लड़के हैं। इनसे थोड़ी ही कम संख्या यानी 47 प्रतिशत लड़कियों की है। अगर देश की काम करने वाली जमात को देखें, तो यह आंकड़ा और भी चौंकाता है। देश की कुल कामगार जमात में सिर्फ 27 प्रतिशत ही महिलाएं हैं। उनकी तुलना में स्कूल जाने की उम्र वाली बच्चियों की जिंदगी उम्रदार महिलाओं की तुलना में कहीं ज्यादा कठिन और जलालतभरी है।
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जिस समय यह आंकड़ा सामने आया, उन्हीं दिनों यह भी खबर आई कि दुनिया के दो सौ प्रतिष्ठित और बेहतरीन विश्वविद्यालयों में भारत का एक भी विश्वविद्यालय नहीं है। शीर्ष 250 विश्वविद्यालयों की सूची में बंगलूरू का भारतीय विज्ञान संस्थान है। हालांकि दुनिया के शीर्ष 980 विश्वविद्यालयों में भारत के कई आईआईटी ने स्थान बनाया है। सवाल यह है कि आजादी के करीब सात दशक में हम वैश्विक स्तर का शैक्षिक तंत्र क्यों नहीं बना पाए। बच्चों का स्कूल न जाना या जबर्दस्ती उन्हें काम पर लगाना और दुनिया के शीर्ष 200 विश्वविद्यालयों में भारत का नाम नहीं होना निश्चित तौर पर चिंतनीय है। इसकी दो प्रमुख वजहें हैं, एक तो यही कि आजादी के इतने वर्षों में हम गरीबी को दूर नहीं कर पाए हैं। संविधान ने योग्यता और समानता के सिद्धांत को स्वीकार तो किया है, लेकिन उसे मानसिक आधार हम अब तक नहीं दे पाए हैं और नियुक्तियों से लेकर शिक्षावृत्तियों तक में हमारी व्यवस्था ने योग्यता के बजाय जातिवाद, क्षेत्रवाद, संप्रदायवाद को ज्यादा तरजीह दी है।
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हम आर्थिक मजबूरियों के चलते सकल घरेलू उत्पाद का बड़ा हिस्सा शिक्षा पर खर्च नहीं कर पा रहे। ब्रिटेन अपनी जीडीपी का 5.72 फीसदी जहां शिक्षा पर खर्च करता है, वहीं अमेरिका 5.22 फीसदी तो जर्मनी जैसा देश 4.95 फीसदी खर्च करता है। जरा हम अपने खर्च पर ध्यान दें। हम लाख कोशिशों और शिक्षा का अधिकार कानून पारित करने के बावजूद जीडीपी का केवल 3.83 फीसदी हिस्सा खर्च कर रहे हैं।

इसकी जड़ हमारी शिक्षा का सरकारीकरण भी है। समाज ने शिक्षा को लेकर मानवीय और सामाजिक जिम्मेदारी का भाव त्याग दिया। पहलेे पैसे वाले लोग नि:शुल्क स्कूली शिक्षा और दवाखानों का इंतजाम करते थे। 1905 में शिक्षा के सरकारीकरण के पहले तक पूरी शैक्षिक व्यवस्था समाज के पास थी। तब शिक्षा और दवाखाने को पैसे कमाने का जरिया नहीं माना जाता था। हम अपनी ताकत का चाहें जितना प्रदर्शन कर लें, बिना सभी बच्चों को स्कूल भेजे और उच्च स्तरीय शिक्षा व्यवस्था बनाए हम वैश्विक ताकत शायद ही बन पाएं।

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