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यह दाग-दाग उजाला

Shankar Ayairशंकर अय्यर Updated Thu, 16 Jan 2020 07:24 AM IST
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प्रेमा और उसके बच्चे
प्रेमा और उसके बच्चे - फोटो : a
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यह एक ऐसी कहानी है, जो भारत को झकझोरने वाली है और देश की व्यवस्था को उसकी उदासनीता और सुस्ती से उबारने की क्षमता रखती है। इस महीने के प्रारंभ में सलेम के पास मन्नारपालयम की रहने वाली 31 वर्षीय प्रेमा, जिसने पिछले वर्ष अपने पति को खो दिया, के पास अपने तीन बच्चों को खिलाने के लिए पैसे नहीं थे। उसने रिश्तेदारों और पड़ोसियों से मदद की गुहार लगाई, पर कहीं से उसे मदद नहीं मिली। तभी वहां से गुजर रहे एक विग बनाने वाले ने बालों के बदले उसे पैसे देने की पेशकश की, तो एक पल भी सोचे बगैर प्रेमा ने अपना सिर मुंडवा लिया। इससे उसे 150 रुपये मिले। उसने बच्चों के लिए सौ रुपये में खाने का इंतजाम किया। फिर वह एक दुकान पर कीटनाशक दवा खरीदने गई। दुकानदार को उसके इरादों पर संदेह हुआ, तो उसने उसे कीटनाशक नहीं दी। इस तरह त्रासदी टल गई और बाद में नागरिक समाज ने उसे दान दिया।
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भूख और गरीबी की यह कहानी बिहार या झारखंड जैसे विफल राज्यों की नहीं, बल्कि उस तमिलनाडु की है, जो नीति आयोग के सतत विकास सूचकांक में सबसे बेहतर प्रदर्शन करने वाला राज्य है और जहां सामाजिक कार्यक्रम बेहतर ढंग से चलते हैं। अब कल्पना कीजिए कि कम विकसित और खराब ढंग से शासित बड़ी आबादी वाले राज्यों की क्या स्थिति होगी? सवाल उठता है कि अगर गरीब राज्यों में ऐसा हो, तो क्या होगा?

सैद्धांतिक रूप से सरकार के सामाजिक कार्यक्रमों यही रोकने के लिए बनाए गए हैं। सरकार केंद्र द्वारा प्रायोजित 30 योजनाएं चलाती हैं, जिसमें शीर्ष पर है राष्ट्रीय सामाजिक सहायता कार्यक्रम (एनएसएपी), जिसे अभाव एवं मौत रोकने के लिए तैयार किया गया है। एनएसएपी गरीबी रेखा से नीचे के परिवारों के लिए सामाजिक सुरक्षा कार्यक्रम है।

भारत 1.8 लाख करोड़ रुपये खर्च करके दुनिया का सबसे बड़ा खाद्य सुरक्षा कार्यक्रम चला रहा है। लोगों को रोजगार देने के लिए मनरेगा जैसा कार्यक्रम है, जिस पर इस वर्ष कुल 60,000 करोड़ रुपये खर्च किए जाएंगे। एक वर्ष में केंद्र सरकार सब्सिडी पर 3.38 लाख करोड़ रुपये खर्च करती है, जो प्रति दिन 900 करोड़ रुपये बैठता है। इन सब पर केंद्र और राज्य सरकारों ने 13.9 लाख करोड़ रुपये खर्च किए, जिनमें से 5.5 लाख करोड़ रुपये से अधिक संकट और अभाव को दूर करने के लक्ष्य से खर्च किए गए।

तर्क दिया जा सकता है कि तमिलनाडु की घटना सिर्फ एक बार की है। अफसोस की बात है कि सतत विकास लक्ष्य पर नीति आयोग द्वारा जारी ताजा आंकड़े इससे अलग नजरिया पेश नहीं करते। गरीबी सूचकांक में अखिल भारतीय औसत 54 से खिसक कर 50 पर चला गया है, जिसमें झारखंड, बिहार और उत्तर प्रदेश निचले पायदान पर हैं। भारत भी भूख सूचकांक में 48 वें से खिसककर 35वें स्थान पर पहुंच गया है। राष्ट्रीय औसत से नीचे रहने वाले राज्यों में झारखंड 22 वें, मध्य प्रदेश 24वें, बिहार 26वें, छत्तीसगढ़ 27वें और उत्तर प्रदेश 31वें स्थान पर है। बड़े राज्यों में से दस राज्यों में गरीबी का स्तर 21.9 फीसदी के राष्ट्रीय औसत से कहीं ज्यादा है और सर्वाधिक आबादी वाले राज्यों की स्थिति बदतर है। ऐसा नहीं है कि कार्यक्रमों की कोई कमी है। मसलन, ग्रामीण विकास मंत्रालय कई कार्यक्रम चला रहा है, जिसमें महात्मा गांधी राष्ट्रीय रोजगार गारंटी योजना, दीनदयाल अंत्योदय योजना-राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन, दीन दयाल उपाध्याय ग्रामीण कौशल्य योजना, प्रधानमंत्री आवास योजना-ग्रामीण, प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना, राष्ट्रीय सामाजिक सहायता कार्यक्रम और सांसद आदर्श ग्राम योजना शामिल हैं।

साफ है कि ये कार्यक्रम जरूरतमंदों की मदद करने में इसलिए विफल रहे हैं, क्योंकि योजना और क्रियान्वयन के बीच खाई है। नीति आयोग की रिपोर्ट बताती है कि रोजगार मांगने वाले 85.26 फीसदी लोगों को मनरेगा के तहत रोजगार प्रदान किया गया है, जबकि 14 फीसदी लोगों को काम नहीं मिला है और यह तर्कसंगत है। प्रधानमंत्री किसान योजना के तहत किसानों को आय सहायता का वितरण बजटीय आवंटन का मात्र आधा हुआ है, क्योंकि खराब ढंग से वर्गीकरण और राज्यों की प्रशासनिक अक्षमता इसके लिए जिम्मेदार है।

जाहिर है, गरीबी, भूख और भुखमरी की छाया है। कुपोषण लगभग हर राज्य में है। पिछले तीन वर्षों में भारत ने समेकित बाल विकास योजना के तहत 70,000 करोड़ रुपये से अधिक बाल पोषण एवं स्वास्थ्य सेवा पर खर्च किए हैं। राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन पर 92,000 करोड़ रुपये से अधिक खर्च किए हैं। यह सच है कि स्वास्थ्य पर खर्च पर्याप्त नहीं है। राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम में महिलाओं और बच्चों के पोषण संबंधी सहायता पर विशेष ध्यान दिया गया है। इसका मतलब गर्भवती महिलाओं और स्तनपान कराने वाली महिलाओं को गर्भावस्था के दौरान और बच्चे के जन्म के छह महीने बाद तक पोषक आहार की गारंटी देना है। गर्भवती महिलाएं भी छह हजार रुपये मातृत्व लाभ पाने की हकदार हैं। चौदह वर्ष तक के बच्चे निर्धारित मानकों के अनुसार पोषक आहार के हकदार हैं। क्या ये योजनाएं ऐसा परिणाम दे रही हैं?

इस सप्ताह 'द इंस्टीट्यूट फॉर हेल्थ मेट्रिक्स ऐंड इवैल्यूएशन ऑन चाइल्ड न्यूट्रिशन' की नवीनतम रिपोर्ट जारी की गई। वर्ष 2017 में दुनिया भर में 17.61 करोड़ बच्चे नाटे कद के थे, जिनमें से 5.15 करोड़ भारत में थे। इस मामले में दुनिया के पांच सबसे खराब क्षेत्रों में उत्तर प्रदेश शामिल है। दुनिया भर के 5.83 करोड़ कमजोर बच्चों में से 2.6 करोड़ भारत में थे। भारत में 40 फीसदी से ज्यादा बच्चे एनेमिक (खून की कमी वाले) पैदा होते हैं। प्रति लाख जन्म पर मातृत्व मृत्यु दर भारत में 122 है, 50 फीसदी से ज्यादा गर्भवती महिलाएं खून की कमी की शिकार हैं और अब तक 36.4 फीसदी योग्य लाभार्थियों को ही मातृत्व लाभ मिला है।

प्रेमा की कहानी हमारे सामाजिक कार्यक्रमों और राज्यों में उसकी स्थिति की समीक्षा के लिए चेतावनी की घंटी है। इरादे की पवित्रता कभी पर्याप्त नहीं होती।
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