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गहरी उमस साफ कहती है

Sat, 19 Jul 2014 08:42 PM IST
यश मालवीय
यश मालवीय Updated Sat, 19 Jul 2014 08:42 PM IST
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yash malviya poem
कोई नहीं रेत के घर में
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प्यासा तरसेगा
गहरी उमस साफ कहती है
पानी बरसेगा
गीत-घरौंदे भरी भीड़ में
आंखें खोलेंगे
चुप्पी साधे हैं जो चेहरे
जी भर बोलेंगे
भूखे बच्चों को यह मौसम
थाली परसेगा
टूट गए से सपनों की
भरपाई होगी ही
होगी नहीं जिंदगी अपनी
अब आधी तीही
हरषेंगे दालान-बरोठे
आंगन हरषेगा
बर्फीले पहाड़ पर भी
पदचिन्ह बनाएंगे
काई का अस्तित्व,
फिसलते पांव बताएंगे
खुद उधेड़बुन की आंखों को
सूरज तरसेगा

-यश मालवीय
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