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हत्तार की हत्या के बाद

Sun, 02 Oct 2016 06:40 PM IST
तस्लीमा नसरीन
तस्लीमा नसरीन Updated Sun, 02 Oct 2016 06:40 PM IST
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After Nahid Hattar killing
नाहेद हत्तार

जॉर्डन एक धर्मनिरपेक्ष देश था। लेकिन वहां भी मजहबी कट्टरता अब अचानक इतनी बढ़ गई है क‌ि सहसा बांग्लादेश का स्मरण हो आता है। जॉर्डन में हाल ही में एक मुस्लिम कट्टरवादी ने चर्चित लेखक नाहेद हत्तार की हत्या कर डाली। नाहेद का जुर्म सिर्फ इतना था क‌ि उन्होंने फेसबुक पर एक कार्टून साझा किया था। यह कार्टून किसने बनाया था, फेसबुक पर सबसे पहले इसे किसने डाला था, इस बारे में कुछ मालूम नहीं है। लेकिन इसे साझा करने के जुर्म में एक लेखक को अपनी जान गंवानी पड़ी। जबकि नाहेद ने साझा करने के तुरंत बाद न सिर्फ इसे फेसबुक से हटा लिया था,बल्कि यह कहते हुए माफी भी मांगी थी क‌ि किसी की भावना को आहत करने का उनका इरादा नहीं था। उन्होंने फेसबुक की आईडी भी मिटा दी थी। इतने सब के बाद भी उन्हें धमकियां मिलने लगी थीं। उन्होंने सरकार से अपनी सुरक्षा की मांग की थी। पर सुरक्षा देना तो दूर, सरकार के प्रवक्ता का जवाब आया था, आपने अपनी जिम्मेदारी से कार्टून शेयर किया था,इसलिए अपनी सुरक्षा की जिम्मेदारी भी खुद लीजिए।

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कार्टून में ऐसा कुछ था जरूर, जिसे लोगों ने पसंद नहीं किया। लेकिन जॉर्डन की सरकार अगर खुद आगे बढ़कर एक समुदाय विशेष की धार्मिक भावना को आहत करने के जुर्म में नाहेद सत्तार के खिलाफ मुकदमा न करती, अगर लेखक को गिरफ्तार न करती, यद‌ि नाहेद के अनुरोध पर उनकी सुरक्षा की व्यवस्था करती, तब संभवतः उन्हें मरना नहीं पड़ता।
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कार्टून लोगों को हंसाने के लिए बनाए जाते हैं। लेकिन यही कार्टून अब लोगों की मौत की वजह बन रहे हैं। डेनमार्क के कार्टूनिस्ट छिपते फिर रहे हैं, फ्रांस की कार्टून पत्रिका शार्ली हेब्दो के लगभग सभी कर्मचारियों की कट्टरवादियों ने हत्या कर दी थी। और अब जॉर्डन में कार्टून शेयर करने के जुर्म में एक लेखक को मरना पड़ा। लोग ये सब देख रहे हैं, बावजूद इसके मानो यह सोचकर खामोश हैं क‌ि जिन्हें मरना है, वे मरेंगे ही, हमारे शरीर पर कोई खरोंच भी नहीं लगा पाएगा। सच्चाई यह है क‌ि कट्टरवाद की यह बढ़ती लहर उन सबको मिटा डालेगी, जिन्हें वे अपनी कट्टर सोच के ल‌िए चुनौती समझेगी।
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नाहेद हत्तार कैथोलिक ईसाई थे, लेकिन उनकी पहचान एक धर्मनिरपेक्ष व्यक्ति की थी। हत्या के समय उनके दो बेटे और भाई उनके साथ थे। उन सबके सामने ही एक कट्टरपंथी ने उनकी हत्या कर दी। उनके भाई ने झपटते हुए खूनी को पकड़ भी लिया था, लेकिन कहते हैं, पुलिस ने उसे जाने दिया। यानी पुलिस भी चाहती थी क‌ि धा‌र्मिक आस्था को ठेस पहुंचाने वाले व्यक्ति को मार ही देना चाहिए। मुझे याद है, जून, 1994 में बांग्लादेश सरकार ने जब धा‌र्मिक आस्था को ठेस पहुंचाने के जुर्म में मेरे खिलाफ मुकदमा दायर किया था, तब मेरे हितैषियों, यहां तक क‌ि कुछ वकीलों, ने मुझे देश छोड़कर भाग जाने की सलाह दी थी। उन सबका कहना था क‌ि अगर मुझे गिरफ्तार कर लिया गया, तो पुलिस मेरी जान भी ले सकती है। कुछ लोगों की आशंका तो यह भी थी क‌ि जेल में डाल देने पर साथी कैदी भी मेरी जान ले सकते हैं।

नाहेद हत्तार के शरीर में तीन गोलियां लगी थीं। उन्हें बचाया नहीं जा सका। उनका हत्यारा जॉर्डन का ही एक जेहादी बताया जाता है। वैसे तो जॉर्डन में जेहादियों की संख्या ज्यादा नहीं थी, लेकिन‌ अब वहां करीब साढ़े छह लाख सीरियाई नागरिकों को शरण मिली है। सीरिया के मुद्दे पर जॉर्डन सरकार की भूमिका तटस्थ है। वह न तो सीरिया का पक्षधर है, न आईएस का। लेकिन बहुतों की आशंका है क‌ि जॉर्डन में आईएस की घुसपैठ अब सिर्फ समय की बात है। सीरिया और जॉर्डन एक दूसरे से सटे हुए ही तो हैं। अभी तक आईएस की घुसपैठ न होने के बावजूद जॉर्डन में उसकी कट्टरता प्रवेश कर चुकी है, यह तो नाहेद सत्तार की हत्या से स्पष्ट ही है।

फेसबुक पर विवादास्पद कार्टून शेयर करने के अपराध में नाहेद को करीब सौ धमकियां मिली थीं। इस विवाद से अपना दामन बचाने के लिए जो कुछ संभव हो सकता था, उन्होंने वह किया। नाहेद की पत्नी ने उन्हें देश छोड़कर चले जाने के लिए कहा था। लेकिन उन्होंने वह बात नहीं मानी। वह वामपंथी, मानवतावादी, सेक्यूलर लेखक थे। देश से भाग जाना उन्हें मंजूर नहीं था। लोगों को याद होगा क‌ि सीरिया के राष्ट्रपत‌ि बशर अल असद के समर्थन में लिखकर उन्हें जेल तक जाना पड़ा था।

जॉर्डन अमेरिका का मित्र देश है। देश से मजहबी आतंकवाद को खत्म करने के ल‌िए अमेरिका से उसे हर साल भारी आर्थिक मदद मिलती है। ले‌किन कट्टरवाद को आखिर वह कितना खत्म कर पाया है! मुस्लिम ब्रदरहुड नाम का जो राजनीतिक दल मिस्र में प्रतिबंध है, उसने न सिर्फ जॉर्डन के चुनाव में भाग लिया, बल्कि उसे कुछ सीटें भी मिलीं। मुस्लिम ब्रदरहुड का उत्थान भी बताता है क‌ि जॉर्डन बदल रहा है। धर्मनिरपेक्ष जॉर्डन धीरे-धीरे बांग्लादेश की ही तरह कट्टरवाद के केंद्र के रूप में उभर रहा है। हालांक‌ि दोनों में एक फर्क है। बांग्लादेश में एक के बाद एक उदारवादी की हत्या के बावजूद वहां की सरकार ने हत्यारों के खिलाफ कार्रवाई करने की कोई प्रतिबद्धता नहीं जताई। जबकि जॉर्डन की सरकार ने जेहादियों को सख्त सजा देने की बात कही है। हालांक‌ि यह देखना होगा क‌ि जॉर्डन सरकार अपना वायदा निभा पाती है या नहीं।


मेरे लिए नाहेद हत्तार बांग्लादेश में मारे गए ब्लॉगर अभिजीत राय, वाशिकुर रहमान और अनंत विजय दास जैसे हैं। जॉर्डन अगर कट्टरपंथियों का कठोरता से दमन नहीं करता, तो वहां नाहेद जैसे और भी उदारवादी लेखक-चिंतक मारे जाएंगे। वक्त रहते न संभलने का नतीजा क्या होता है, यह मेरे जैसा बांग्लादेशी हर घड़ी महसूस करता है।

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