जख्म फिर से हरे हो गए
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यह लेख शुरू करना चाहूंगी मजरूह सुल्तानपुरी के एक शेर से-हम ही हमेशा कत्ल हुए और तुमने भी देखा दूर से, लेकिन ये न समझना हमको हुआ है जान का नुकसान तुमसे ज्यादा। हाशिमपुरा कांड का फैसला पिछले सप्ताह जब करीब अट्ठाइस साल के लंबे अर्से के बाद आया, तो यह शेर मुझे इसलिए याद आया, क्योंकि इस फैसले से सबसे ज्यादा नुकसान है भारत का, देश के हर वासी का। हाशिमपुरा कांड के आरोपियों के खिलाफ अदालत में इतने सुबूत नहीं थे कि उन्हें उनके किए की सजा मिल पाती। चश्मदीद तो थे, पर वे 22 मई, 1987 की उस अंधेरी रात को पीएसी के उन जवानों का चेहरा नहीं देख पाए थे, क्योंकि उन्होंने हेलमेट पहना था।
हाशिमपुरा कांड ने तब पूरे देश को उद्वेलित कर दिया था। मैं खुद 1987 में हाशिमपुरा जाकर उन लोगों से मिली थी, जिन्हें मृत समझकर गंगनहर में फेंका गया था। लाशों के बीच जुल्फिकार नसीर नाम के एक व्यक्ति को भी फेंका गया था। याद है मुझे कि उसे दिल्ली लाया गया था एम्स में इलाज कराने। उनके जख्म थोड़े ठीक हुए, तो पत्रकारों से मिलकर उन्होंने स्पष्ट शब्दों में बताया कि किस तरह ट्रक को गंगनहर के किनारे रोकने के बाद पीएसी के जवानों ने ट्रक के अंदर ही गोलियां चलाई थीं। किस तरह फिर लाशों को नहर में फेंका गया था, किस तरह वह जख्मी हाल में नहर से निकलकर बाहर आया, उसके साथ बचने वाले तीन-चार लोग और भी थे। जुल्फिकार की बातें सुनने के बाद ही मैं चश्मदीदों से मिलने के लिए हाशिमपुरा गई थी और उनकी पूरी कहानी सुनने के बाद मैं स्तब्ध रह गई थी।
तब बहुत बुरा इसलिए भी लगा था कि वह घटना घटी थी दिल्ली में सिखों के कत्लेआम के तीन ही वर्ष बाद। वैसे तो स्वर्गीय राजीव गांधी के प्रधानमंत्री काल में हजारों की तादाद में लोग सांप्रदायिक हिंसा की विभिन्न घटनाओं में मारे गए थे, लेकिन ये दोनों घटनाएं इसलिए विशेष थीं, क्योंकि इनमें प्रशासन का दोष दंगाइयों से कहीं ज्यादा था। यानी जिनकी जिम्मेदारी थी नागरिक की रक्षा करने की, वही हैवान बन गए थे। शायद यही कारण था कि उत्तर प्रदेश की सरकारों ने हाशिमपुरा को भुला देने की पूरी कोशिश की। इस मामले की जांच की गई, लेकिन सब कुछ इतने आधे-अधूरे ढंग से हुआ कि पीड़ितों को अभी तक न्याय नहीं दिलाया जा सका है।
उत्तर प्रदेश की सरकारें अगर हाशिमपुरा कांड के दरिदों को पकड़वाना चाहतीं, तो यह काम इतना मुश्किल भी नहीं था। कानून-व्यवस्था राज्य की जिम्मेदारी होती है, लेकिन उन्होंने इस भीषण हत्याकांड के दोषियों को सजा दिलवाने के प्रति वैसी प्रतिबद्धता नहीं दिखाई, जो दिखानी चाहिए थी। उस वक्त की कांग्रेस सरकार ने अगर चाहा होता, तो अगले दिन ही मालूम हो जाता कि पीएसी के जवान उस रात कौन थे, जो ट्रक लेकर गए थे गंगनहर के किनारे। उसी समय यह पता चल जाता कि निहत्थे लोगों पर उन्होंने गोलियां किसके आदेश से चलाई थीं। पर इसके बजाय इस मामले की जांच में, और अदालत को सुबूत सौंपने में हद दर्जे की लापरवाही बरती गई। फिर मामला दिल्ली की अदालत तक पहुंचा और तारीख पर तारीख लगती गई।
हाशिमपुरा के लोगों ने हालांकि अदालत का फैसला सुनने के बाद भी हौसला नहीं खोया है। खुद प्रधानमंत्री को चाहिए कि वह हाशिमपुरा के दोषियों को सजा दिलवाने की दिशा में जरूरी सक्रियता दिखाएं। ऐसा यदि नहीं होगा, तो देश की छवि को नुकसान पहुंचेगा।